शब्द

शब्द लिफाफे हैं
खोल कर पढ़ो
छोडक़र नाव को,
घाट से आगे बढो,
कोष शब्दों का
पुराना है बहुत,
भावना और मनुज का
नाता पुराना है बहुत,
नाद से आकार तक,
युग यात्री हैं शब्द,
नयन और नेह की
अभिव्यक्ति हैं ये शब्द,
आज भाषा युध्द से
घायल हुये हैं शब्द,
शब्द ने जोडा सभी को
स्वयं टूटे शब्द,
भावना और भाव से
हैं दूर क्यों अब शब्द,
झाँको नयन में भावना
अब मत रहो स्तब्ध
‘कान्त’ शब्दाभाव अब तक
नये शब्दों को गढो
अर्थ समझो भावना से
शब्द लेकर मत लड़ो
हो सके तो आज से ऑंखे पढो
शब्द लिफाफे हैं खोलकर पढो,
श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’