नाच रे मन बावरे

नाच रे मन बावरे
मधुमास आया–
चहुँ दिशि चहुँ ओर है
आनन्द छाया–

सज उठी है प्रकृति बाला
फूलों के श्रृगार से
उड़ रही है फिर सुगन्धि
मदन के अहसास से
पाँव में थरकन नयन में
प्रेम का उन्माद छाया—

तितलियाँ चहुँ ओर फिर हैं
नाचती हो बावली
भँवरों की टोली दिवानी
डोलती मदहोश सी
कामनाओं का हृदय से
जैसे हो झरना बहाया—

प्रेम की ऋतु है बसंती
प्रेम की मदिरा बही
हर कली हर फूल में फिर
दिख रही आभा नई
पीहू-पीहू की पुकारें
संग अपने वायु लाया—

टूटी है फिर से समाधि
योगी रूप महादेव की
कामतीरों से हैं जागी
प्रेम की सूखी नदी
चिर सुखी चिर तृप्त हृदय में
शून्यता का भाव आया—

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गीत गुनगुना मन


मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

माना लहरें भंवर भयंकर
धीरज नैया डोले
आशा की पतवार उठा ले
माझी साहस कर ले
वैचारिक झंझावातों से
हार न बैठो मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

थक कर चकनाचूर है फिर भी
बैठ न आंखे मीचे
अविचल नियम प्रकृति का निशि दिन
चलते आगे पीछे
कहीं ‘नित्य’ का रथ रूकता है
सोच विहंस मेरे मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

तारे घटा टोप में डूबे
‘शशि’ मेघों ने घेरा
घनीभूत नैराश्य हो चला
मन में डाले डेरा
‘पौरूष’ को ललकार ‘कान्त’ कर
नभ से प्रकट ‘तडित’ मन
कठिन तमस निश्चय जायेगा
गीत गुनगुना मन

मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

पुरू

घना है कुहासा
भोर है कि साँझ
डूब गया है
सब कुछ इस तरह
तमस के जाले से
छूटने को मारे हैं
जितने हाथ पाँव
और फंस गया हूँ
बुरी तरह…
वक्त का मकड़ा
घूरता है हर पल
अपना दंश मुझमें
धंसाने से पहले
याद है मुझे
‘’पुरू’ हूँ
किन्तु ‘पौरूष’
खो गया है
भटक रहा हूँ
युगों से
तलाश में …
उस शमी वृक्ष की
टांगा था मैनें
जिस पर कभी गाँडीव
अज्ञातवास की वेदना
अंधकार में अदृश्य घाव
डूबी नही है
चाह अब तक
एक नये सूरज की
उबारो …उबारो
तो मुझे
ओ ! मेरी
‘सोयी हुयी चेतना’
इस अन्धकार से
चीखता रहूँगा मैं
निस्तेज होने तक
शायद इसी आशा में
कि आओगे एक दिन
‘तुम’जो बिछड़ ग़ये थे मुझसे
अतीत के अनजाने मोड़ पर