गीत गुनगुना मन


मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

माना लहरें भंवर भयंकर
धीरज नैया डोले
आशा की पतवार उठा ले
माझी साहस कर ले
वैचारिक झंझावातों से
हार न बैठो मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

थक कर चकनाचूर है फिर भी
बैठ न आंखे मीचे
अविचल नियम प्रकृति का निशि दिन
चलते आगे पीछे
कहीं ‘नित्य’ का रथ रूकता है
सोच विहंस मेरे मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

तारे घटा टोप में डूबे
‘शशि’ मेघों ने घेरा
घनीभूत नैराश्य हो चला
मन में डाले डेरा
‘पौरूष’ को ललकार ‘कान्त’ कर
नभ से प्रकट ‘तडित’ मन
कठिन तमस निश्चय जायेगा
गीत गुनगुना मन

मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. shobha
    जुलाई 29, 2007 @ 12:45:00

    श्रीकान्त जीआपकी कविताएँ पढ़ी । बहुत सुन्दर लिखते हैं आप । बहुत- बहुत बधाई ।सस्नेह

    प्रतिक्रिया

  2. shobha
    अगस्त 15, 2007 @ 11:41:00

    आदरणीय मिश्र जीबहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है मन के भावों की । आपकी सोच बहुत ही सकारात्मक है ।निराशा के समय में यदि स्वयं को संभाल लिया जाए तो जीवन आसान हो जाता है ।बहुत ही सुलझी हुई विचार धारा के स्वामी हैं आप । ऐसा लेखन सभी के लिएप्रेरणा बन जाता है । बहुत- बहुत बधाई । यही सोच बनाए रखें । शुभकामनाओं सहित

    प्रतिक्रिया

  3. रंजू
    नवम्बर 05, 2007 @ 14:33:00

    मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिशक्यों चुप बैठा मनकठिन तमस भी कट जायेगागीत गुनगुना मनबहुत खूब लिखा है आपने

    प्रतिक्रिया

  4. सजीव सारथी
    फरवरी 12, 2008 @ 06:50:00

    सुंदर

    प्रतिक्रिया

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