नाच रे मन बावरे

नाच रे मन बावरे
मधुमास आया–
चहुँ दिशि चहुँ ओर है
आनन्द छाया–

सज उठी है प्रकृति बाला
फूलों के श्रृगार से
उड़ रही है फिर सुगन्धि
मदन के अहसास से
पाँव में थरकन नयन में
प्रेम का उन्माद छाया—

तितलियाँ चहुँ ओर फिर हैं
नाचती हो बावली
भँवरों की टोली दिवानी
डोलती मदहोश सी
कामनाओं का हृदय से
जैसे हो झरना बहाया—

प्रेम की ऋतु है बसंती
प्रेम की मदिरा बही
हर कली हर फूल में फिर
दिख रही आभा नई
पीहू-पीहू की पुकारें
संग अपने वायु लाया—

टूटी है फिर से समाधि
योगी रूप महादेव की
कामतीरों से हैं जागी
प्रेम की सूखी नदी
चिर सुखी चिर तृप्त हृदय में
शून्यता का भाव आया—

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. कुन्नु सिंह
    फरवरी 24, 2008 @ 07:30:00

    एक एसी कहानी जो पथर दिल को भि पिघ्ला देगी आप यहा से उस कहानी को पड सकते है http://www.kunnublog.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

  2. Rajesh
    मार्च 14, 2008 @ 09:52:00

    Kudarat ke sanidhya ka ek aur najara deekhaya hai aapne apni kavita dwara. Prem aur Shringaar ras se bhara ati sunder nirman.

    प्रतिक्रिया

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