होली के रंग

होली के रंग
और तुम्हारी याद
दोनो साथ-साथ
आ गए….
खिले हुए फूल
और…
बरसते हुए रंग
कसक सी….
जगा गए
आती है जब भी
टेसू की गन्ध
दिल की कली
मुरझा सी जाती है
रंगों में डूब जाने की
चाहत….
बलवती हो जाती है
चेतना बावली होकर
पुकार लगाती है
और शून्य में टकराकर
पगली सी लौट आती है
फाग में झूमती
मस्तों की टोली में
बेबाक….
तुम्हें खोजने लगती हूँ
और आँखें….
अकारण ही बरस जाती हैं
होली की गुजिया
और गुलाल के रंग
बहुत फीके से लगते हैं
कानों में तुम्हारी हँसी
आज भी गूँजती है
आँखें…..
तुम्हे देख नहीं पाती
पर आस है कि
मरती ही नहीं
कानों में….
तुम्हारे आश्वासन
गूँजने लगते हैं
और…..
रंगों को हाथ में लिए
दौड़ पड़ती हूँ
दिमाग पर…
दिल की विजय
यकीन दिलाती है
तुम जरूर आओगे
और मुझे…..
फिर से
अपने रंग दे जाओगे

रंगों की फुहार

रंगों की फुहार
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बहे बसंती बयार ,आया होली का त्यौहार,
हरसू छाई बहार ,उडे रंगों की पतंग.

गौरी करके सिंगार ,मांगे प्रीतम का प्यार,
कोई करे मनुहार ,और कोई करे तंग.

पिचकारी की कतार, हुई रंगों की बोछार,
नाचे गाएं बार बार,बाजे ढोल और मृदंग.

गावे कवित्त और फाग,बस चढ़ रहा खुमार,
गले भंग लो उतार,थोड़ा कर लो हुडदंग!

भीजे रंगों में तन, मन में प्रेम की फुहार,
करो सब को शुमार,रंगो होली के रंग.

-अल्पना वर्मा

निर्बंध हुआ है हर यौवन

सजनी रजनी तम चुनर ओढ़
अभिकम्पित शुभ्र ज्योत्सना से
होली आहट सुन जाग रही
चुपके चुपके से भाग रही

स्मित अधरों संग खुले नयन
सर पर नीरज द्रुम दल खिलते
अरुणिम अम्बर रंग भरा थाल
उषा बिखेरती है गुलाल

भावी सपने बिहगों के दल
नीले अम्बर में खोल पंख
बंदी पिंजर से हरिल खोल
उन्मुक्त भावना का बहाव

धानी परिधानों से सज्जित
अवनी आँचल से कनक लुटा
सजती क्षैतिज का ले दरपन
बौराई अमवा की डालें
झूमें खाकर मदमस्त भंग
यष्टि में फैलाती सुगंध

बादल निचोड़ ले मुठ्ठी से
कर डाल जलद घन से वर्षा
अम्बर तम मुख मल दे गुलाल
अंतस में स्नेह फुहार लिये
पापों की गठरी ले समेट
मन आंधी मैला कुत्सित मन
कर डाल आज होलिका दहन
चहुँओर निमंत्रण भावों का
निर्बंध हुआ है हर यौवन

माँ …!तू वापस आजा

ओ माँ ..!
कहाँ हो तुम
डब-डब…
गूँजती है आवाज़
मेरे कानों में
तैरता हूँ मैं
मछली की तरह
बँधा हुआ रज्जु से

धक्-धक् …
सुनता हूँ
अमृत पीता..
तुम्हारे आँचल में
और सींचता हुआ
स्वयं को

टुक्-टुक् …
निहारते हैं
मेरे नयन
बलिहारी
मेरी हर मुस्कान पर
तेरा चेहरा

माँ …
तुम्हे डर नहीं लगा
अँधेरों से कभी
क्योकि …ये तेरी
बिटिया है.. बहना है
अपने घर ..गाँव.. देश
और परिवेश का गहना है

तू है ना .. !!
इन सब का पहरेदार
पार्वती का गणेश

तुम यही सिखाती थी ना?
सारे बेटों को माँ

वृद्ध डंडा टेकते
वो बाबा…
बूढ़ी दादी की लाचारी
और वो अंधा भिखारी
अरे ! उस जानवर को
डंडा मत मारना
उसके पेट में बच्चे हैं
वो माँ है.. मेरी तरह
इनकी रक्षा करते हैं
सीख देती …
मुझे सब याद है माँ

पर ये मेरे नन्हें ..
मेरे छोटे ..सब भटक गए हैं
देख….
ये सबको कब से छेड़ रहे हैं
और नसों में मेरी …
बिजली दौड़ रही है

तू कहीं खो गई है शायद
किसी ब्यूटी पार्लर में..
या फिर ….
पश्चिमी आधुनिकता की
अंधी चकाचौध में
तू वापस आजा माँ