निर्बंध हुआ है हर यौवन

सजनी रजनी तम चुनर ओढ़
अभिकम्पित शुभ्र ज्योत्सना से
होली आहट सुन जाग रही
चुपके चुपके से भाग रही

स्मित अधरों संग खुले नयन
सर पर नीरज द्रुम दल खिलते
अरुणिम अम्बर रंग भरा थाल
उषा बिखेरती है गुलाल

भावी सपने बिहगों के दल
नीले अम्बर में खोल पंख
बंदी पिंजर से हरिल खोल
उन्मुक्त भावना का बहाव

धानी परिधानों से सज्जित
अवनी आँचल से कनक लुटा
सजती क्षैतिज का ले दरपन
बौराई अमवा की डालें
झूमें खाकर मदमस्त भंग
यष्टि में फैलाती सुगंध

बादल निचोड़ ले मुठ्ठी से
कर डाल जलद घन से वर्षा
अम्बर तम मुख मल दे गुलाल
अंतस में स्नेह फुहार लिये
पापों की गठरी ले समेट
मन आंधी मैला कुत्सित मन
कर डाल आज होलिका दहन
चहुँओर निमंत्रण भावों का
निर्बंध हुआ है हर यौवन

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. आशा जोगळेकर
    मार्च 21, 2008 @ 13:14:00

    बहुत ही खूबसूरत कविता ।पापों की गठरी ले समेटमन आंधी मैला कुत्सित मन कर डाल आज होलिका दहनचहुँओर निमंत्रण भावों का निर्बंध हुआ है हर यौवनहोली का मर्म समझाती हुई ये पंक्तियाँ दिल को छू जाती हैं ।

    प्रतिक्रिया

  2. मीत
    मार्च 21, 2008 @ 14:36:00

    बहुत अच्छी रचना. होली मंगलमय हो.

    प्रतिक्रिया

  3. परमजीत बाली
    मार्च 21, 2008 @ 17:26:00

    बहुत ही बेहतरीन कविता है।बहुत-बहुत बधाई।

    प्रतिक्रिया

  4. परमजीत बाली
    मार्च 21, 2008 @ 17:26:00

    बहुत ही बेहतरीन कविता है।बहुत-बहुत बधाई।

    प्रतिक्रिया

  5. Alpana Verma
    मार्च 22, 2008 @ 04:31:00

    ‘बादल निचोड़ ले मुठ्ठी सेकर डाल जलद घन से वर्षा अम्बर तम मुख मल दे गुलाल अंतस में स्नेह फुहार लिये’sundar kavita.badhayee.holi ki shubhkamnayen.

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