रंगों की फुहार

रंगों की फुहार
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बहे बसंती बयार ,आया होली का त्यौहार,
हरसू छाई बहार ,उडे रंगों की पतंग.

गौरी करके सिंगार ,मांगे प्रीतम का प्यार,
कोई करे मनुहार ,और कोई करे तंग.

पिचकारी की कतार, हुई रंगों की बोछार,
नाचे गाएं बार बार,बाजे ढोल और मृदंग.

गावे कवित्त और फाग,बस चढ़ रहा खुमार,
गले भंग लो उतार,थोड़ा कर लो हुडदंग!

भीजे रंगों में तन, मन में प्रेम की फुहार,
करो सब को शुमार,रंगो होली के रंग.

-अल्पना वर्मा

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. शोभा
    मार्च 20, 2008 @ 17:00:00

    अल्पना जीआनन्द आगया कविता पढ़कर। ईसा लग रहा है कि हाथ में पिचकारी लेकर कोई आगया। रंगों की फुहार बहुत सुहावनी हैं। कविता में एक ताज़गी और मधुरता है-गावे कवित्त और फाग,बस चढ़ रहा खुमार,गले भंग लो उतार,थोड़ा कर लो हुडदंग!भीजे रंगों में तन, मन में प्रेम की फुहार, करो सब को शुमार,रंगो होली के रंग.होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ

    प्रतिक्रिया

  2. श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
    मार्च 22, 2008 @ 05:39:00

    अल्पना जी !बहे बसंती बयार ,आया होली का त्यौहार,…….गौरी करके सिंगार ,मांगे प्रीतम का प्यार,कोई करे मनुहार ,और कोई करे तंग………भीजे रंगों में तन, मन में प्रेम की फुहार, करो सब को शुमार,रंगो होली के रंग.होली के सभी पारम्परिक मनभावन रंगों को समेटे हुये आज होली के ही दिन इस रचना को पढ़ना अपने आप में एक उल्लाषपूर्ण अनुभव है. आपको होली की अनेकानेक शुभकामनायें

    प्रतिक्रिया

  3. neeraj tripathi
    मार्च 24, 2008 @ 18:25:00

    achhi lagi aapki kavita..

    प्रतिक्रिया

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