देश मेरा जल रहा

है जमीं ये जल रही
आसमां ये जल रहा
घर पडोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल अरि
अब युद्व में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में किस कृष्ण की
हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
हर हृदय में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में है
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

माँ सरस्वती वंदना नीचे प्लेयर से क्लिक करके सुने
http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://trishakant.lifelogger.com/media/audio0/840329_zycilqsgdw_conv.flv&autoStart=false

उत्तर प्रदेश की राजधानी लख़नऊ की जड़ों में आतंकवाद की दीमक, शाबास यूपी पुलिस …

इधर पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की जड़ों में आतंकवाद की दीमक लग गयी है। पूर्वप्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के संसदीय क्षेत्र और कभी तहज़ीब और तमीज़ का पर्याय माने वाले, इस शांतिप्रिय शहर की अवधी संस्कृति को आतंकवादियों की नज़र लग चुकी है और आतंकवाद की दीमक अब लख़नऊ को चाटने लगी है। एक समय पहले आप पहले आप के नाम पर जिस तहजीब से लख़नऊ की पहचान बनी थी वही आज आतंकवादियों की शरणस्थली के रूप में सामने आता जा रहा है। आतंक के पर्याय बन चुके कई आतंकवादियों को इन दिनों इसी शहर ने अपने आगोश में पनाह दी है। वैसे इसका कारण विगत में राजनीतिकों का विशिष्ट वोट बैंक की ख़ातिर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को अपने स्वार्थ के लिए गुमराह करना ही रहा है। यह बात अब सर्व विदित है कि देश के किसी भी राज्य में आतकंवादी वारदात के बाद उसके मुख्य पात्र कई बार लख़नऊ से पकड़े गए हैं।

इस विषय में यूपी पुलिस की भूमिका एक ओर जहाँ पर इस दृष्टि से सवालों के घेरे में है कि उसकी नाक के नीचे ऐसा कैसे हो रहा है ? क्या उसकी जिम्मेदारी बस अपने राजनीतिक आकाओं की सुरक्षा ही है। लेकिन यह इस सिक्के का एक पहलू मात्र है।

प्रसन्नता का विषय यह है कि इसी पुलिस द्बारा दूसरे राज्यों की विशिष्ट टास्क फोर्स के साथ सहयोग और समन्वय से ही इन अबूबशर और शाहबाज़ जैसे दूसरे आतंकवादियों की गिरफ्तारी सम्भव हो सकी है। शाबास यूपी पुलिस … किंतु सावधान इन सबकी जड़ों को नष्ट करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

मौन

महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

तुम्हें नहीं बहला पाते हैं
रातें चन्द्रकिरण रस भीनी
ये हिमवर्षी सुन्दर दिन
अतिरंजित सपनें मानव के
क्यों ले मन के विजन डोलते
महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

अरे ! मौन ये भी अच्छा है
अंधकार कितना सच्चा है
पर इसमें भी जुगुनू जैसे
कोटि कोटि तारे प्रदीप्त हैं

अलकें पलकें निशि भर जगकर
कहती हैं क्या टिम टिम करते
महा मौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

मदमाते यौवन की पावस
कभी बनी जो मधुर विह्वला
किन्तु आज इस सूनेपन में
इस एकाकी नीरवता में
क्यों न हृदय की ग्रन्थि खोलते
महामौन क्यों नहीं बोलते
अनाहूत क्षण क्यों टटोलते

राजनीति में आतंकवादियों की घुसपैठ …. कहाँ है लालूजी, मुलायम और पासवान

पिछले दिनों अबूबशर की गिरफ्तारी के बाद आजमगढ़ में सहानुभूति के नाम पर मौलाना बुखारी सहित तमाम मुस्लिम नेताओं का जमावड़ा और शाहिद सिद्दीकी सहित कई अन्य राजनेताओं के सिमी को लेकर बयान, राजनीति में आतंकवादियों की घुसपैठ प्रर्दशित करते हैं। विगत में लालू और मुलायम के साथ पासवान द्बारा सिमी को क्लीनचिट देने जैसे बयानों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। इसी के साथ कश्मीर में हुर्रियत के पाकिस्तान परस्त बयान और युद्धविराम रेखा के उल्लंघन के लिए प्रतिदिन सेना के ऊपर दबाब बढ़ाने के सभी घटनाक्रम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह सब देश को आतंक की ज्वाला में झोंक देने का आई एस आई अथवा तालिबान का षडयंत्र मात्र नहीं है। इसे इसे गंभीरता से लेने की अबिलम्ब आवश्यकता है।

कितने शर्म की बात है कि जब राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में देश का प्रत्येक जागरूक नागरिक आतंकवाद और जम्मू कश्मीर को लेकर चिंतित है, सेना को बार्डर पर आतंकवादियों की घुसपैठ रोकने के लिए अभी अभी कर्नल सहित तीन जवानों की शहादत देनी पड़ी है। ऐसे में माननीया महबूबा मुफ्ती टीवी चैनेल पर बड़े फख्र के साथ बयान देती हैं कि कश्मीर में सी आर पी एफ हमारे आगे हाथजोड़ कर कहती है कि आप एक घंटा दे दीजिये, हम बंकर खाली करते हैं और फिर लोग (कौन .. ? पी डी पी / हुर्रियत ? ) बंकर में आग लगा देते हैं।

यह सारी घटनायें हमारी सेना और अर्द्धसैनिक बलों के मनोबल को अपूरणीय क्षति पहुंचा रही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि हमारे लालूजी, मुलायम सिंह यादव और पासवान जी कहाँ हैं? कहाँ है उनकी वह तत्परता ….. जो उन्होंने सिमी के पक्ष में बयान देने के लिये दिखायी थी। बड़े शर्म की बात है कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए सिमी जैसे आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त देशद्रोही संगठन को बचाने के लिए ऐसे लोग आगे आने लगे हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है।

उधर कश्मीर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दोनों तरफ से घेरा जा रहा है। पकिस्तान की तरफ से आने वाले आतंकवादियों की एक बड़ी संख्या घुसपैठ करने के प्रयास में एक तरफ सेना से भिड़ी हुयी है वहीं पर अर्द्धसैनिक बलों को हाथ बांधकर कश्मीरी लोगो की आड़ में हुर्रियत की अलगाववादी भीड़ के सामने खड़ा कर दिया गया है। किस उत्साह के साथ और किसके भरोसे सेना लड़ रही है यह निष्कर्ष स्वयं ही लगाया जा सकता है। एक सैनिक अपना घर बार छोड़कर मोर्चे पर इस विश्वास के साथ डटा रहता है कि वह अपने देशवासियों लिये अपनी जान दांव पर लगा रहा है। किंतु जब उसी सेना के पीछे से भी हल्ला बोला जा रहा है तो … सेना का मनोबल क्या रह जायेगा… यह सोचा जा सकता है। क्या यह पीठ में छुरा भोंकने जैसी बात नहीं है? कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर में हुर्रियत द्बारा आर्थिक नाकेबंदी का झूठा प्रचार लोगों को बरगलाने के अलावा क्या है। जब सेना अपनी शहादत देते हुए बार्डर पर आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए प्रयास कर रही हो ऐसे में करते हुए काश्मीर की मासूम अवाम को बरगलाकर युद्धविराम रेखा को पार करके सेना को चुनौती देना क्या देशद्रोह नहीं है ? हुर्रियत के नेता पकिस्तान चलो के नाम पर सूफी संतों की शांतिप्रिय धरती कश्मीर में पाकिस्तान के हाथ में खेलते हुये तालिबानी मानसिकता के पोषक बनते जा रहे हैं।

देश में यह सारा संकट तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिकों ने ही उत्पन्न किया है। लालू का भ्रष्टाचार, मुलायम द्बारा मुस्लिम वोट के लिये सिमी को संरक्षण, पासवान की मौकापरस्त राजनीति अथवा शिबूसोरेन को मुख्यमंत्री पद का उपहार। देश का आम आदमी जब तक जाति, धर्म, संप्रदाय अथवा अन्य स्वार्थों से ऊपर उठकर इन मशरूम की तरह उगे नेताओं को सबक सिखाने के लिए आगे नहीं आयेगा, इस राष्ट्र में शान्ति नहीं हो सकेगी। सारा देश आर्थिक प्रगति के बाद भी मुठ्ठी भर लोगों के हाथों में कैद हो गया है। यह देश हम सब का है किसी भी हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई अथवा किसी एक अकेले समुदाय का नहीं है। आतंकवादियों का विष्फोट किसी समुदाय विशेष की जान नहीं लेता है वह हमारे राष्ट्र के नागरिक की जान लेता है। पानी अब नाक से ऊपर आ चुका है कृपया जागें …. और सही ग़लत के बीच फैसला करें

सिमी का नाम लेकर लालू और मुलायम की राजनीति

अब जबकि पिछले दिनो अहमदाबाद सहित देश के कई राज्यों में हुयी आतंकवादी घटनाओं में अबूबशर सहित सिमी के अन्य कार्यकर्ताओं का हाथ शामिल होने की बात सामने आ चुकी है तो सिमी के पक्ष में खुलकर सामने आये मुलायम सिंह और लालू जी से उनाके पक्ष में बयान देने के मामले की जांच भी अवश्य की जानी चाहिये. सारे राष्ट्र को इस प्रकरण में प्रधान मन्त्री से यह जानने का अधिकार है कि राष्ट्रीय जाँच एजेन्सियों तथा केन्द्रीय गृह मन्त्री अथवा रेलमंत्री दोनो में से कौन झूठ बोल रहा है. इतना ही नहीं प्रधान मंत्री जी को लालू जी से केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की सामूहिक भावना के विरुद्ध जाकर बयान देने के लिये इस्तीफा भी लेना चहिये.
अब समय आ गया है कि देश की नयी पीढ़ी सिमी का नाम लेकर राजनीति करने वाले लालू और मुलायम जी जैसे नेताओं से जितनी जल्दी तोबा कर ले उतना ही भविष्य के लिए अच्छा होगा.

ये कैसी आजादी की ६१वीं सालगिरह है … ?

ये कैसी आजादी की ६१वीं सालगिरह है पिछले कई दिनों से अभिनव बिंद्रा की स्वर्णिम सफलता के खुमार में डूबा हुआ मन सवेरे प्रधानमन्त्री के द्वारा लालकिले पर तिरंगे के ध्वजारोहण के बाद ही फीका पड़ गया. राष्टट्रीय गौरव एवं अस्मिता के के इस स्वर्णिम दिवस पर मात्र ६० वर्षों में ही राजनेताओं ने हमारे अमर शहीदों के साथ साथ राष्ट्रपिता बापू का नाम भी भुला दिया।

श्रीनगर में तिरंगे को जलाती हुयी भीड़ के दृश्यों ने यह सोचने पर विवश कर दिया कि विगत ६० वर्षों में हमने विशेष दर्जा देकर भी घाटी में अपने देश के समस्त स्रोतों से किन लोगों को पाला पोषा है, अपने खून पसीने से सींचा है। क्या हम गौरवशाली सूफी संस्कृति और सही तहजीब का दंभ भरने वाले कश्मीरियत के सही अवाम का पोषण कर रहे हैं अथवा उनके नाम पर बस सत्ता लोलुप कुछ ऐसे हाथों को पोषित करते रहे हैं जो देश के साथ साथ सारी मानवता को आजादी और जिहाद के नाम पर अंधेरी सुरंग में धकेलते जा रहे हैं।

एक और ह्रदय विदारक घटना उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से है. जहाँ पर पुलिस द्वारा एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की लाठिओं द्वारा सरे आम पिटाई का है. क्या आजाद भारत में पुलिस का यह बर्बरता पूर्ण आचरण आजादी का प्रतीक है. शर्मनाक है यह सब. ऐसे दृश्यों को देखकर आजादी के जश्न का सारा खुमार उतर कर मन में एक अवसाद ही उत्पन्न होता है. मानवीय संवेदना को तार तार करने वाले दृश्यों का अवलोकन करने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस के उन कर्मचारियों के बारे में क्या विचार व्यक्त किया जा सकता है … ?

यह कैसी आजादी …… ? किसके लिए आजादी ….. ? खेल जैसे पवित्र विषयों में भी राजनीति घुसा देने वाले लोगों के लिए…. मोनिका देवी के साथ होने वाली घटना के रूप में या फ़िर भ्रष्टाचार के नए नए तरीके ईजाद करने वाले लोगों के लिए आजादी …?

यद्यपि यह सारे सवाल मन में हैं फ़िर भी मैं आशान्वित हूँ कि संभवतः नयी पीढी अब बहुत कुछ समझाने लगी है. इसी के साथ एक आशा से भारी सोच लेकर अगली सुबह का इन्तजार कर रहा हूँ ….

बारूद के ढेर पर बैठने वालो

सुनो… सुनो…
जरा ध्यान से सुनो !
ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो
काल के क्रूर हाथों को झुका नहीं सकोगे
अपनी गरजती हुयी बन्दूकों से
ये जो धुँआ फैलाया है तुमने आतंक से
नियति की द्रष्टि से छिप नहीं पाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन…

सुनो… सुनो
जरा ध्यान से
ओ सपोले पालने वालो
पिलाते हुये दूध डसे जायेंगें तुम्हारे हाथ
काल के यम पाश में कोई स्वार्थ होता
पीड़ा की कोई जाति नहीं होती
हिंसा के बीज का कोई धर्म नहीं होता
उसी पीड़ा से छतपटाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन

सुनो… सुनो
जरा कान खोलकर सुनो
ओ निर्दोषों को चिता पर चढ़ाने वालो
अंगारे होंगे तुम्हारी चिता में भी
और ऑंसू भी नहीं मिल सकेगा एक
ठण्डा करने तुम्हें …
नश्वर शरीर के सुख की चाह में
शरीरो को नश्वर करने का खिलवाड़
करते रहोगे कब तक
हो चुका है बहुत बन्द भी करो अब
अन्यथा …..
हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्य
लेगा निगल तुम्हें भी एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.

Previous Older Entries