राजनीति में आतंकवादियों की घुसपैठ …. कहाँ है लालूजी, मुलायम और पासवान

पिछले दिनों अबूबशर की गिरफ्तारी के बाद आजमगढ़ में सहानुभूति के नाम पर मौलाना बुखारी सहित तमाम मुस्लिम नेताओं का जमावड़ा और शाहिद सिद्दीकी सहित कई अन्य राजनेताओं के सिमी को लेकर बयान, राजनीति में आतंकवादियों की घुसपैठ प्रर्दशित करते हैं। विगत में लालू और मुलायम के साथ पासवान द्बारा सिमी को क्लीनचिट देने जैसे बयानों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। इसी के साथ कश्मीर में हुर्रियत के पाकिस्तान परस्त बयान और युद्धविराम रेखा के उल्लंघन के लिए प्रतिदिन सेना के ऊपर दबाब बढ़ाने के सभी घटनाक्रम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह सब देश को आतंक की ज्वाला में झोंक देने का आई एस आई अथवा तालिबान का षडयंत्र मात्र नहीं है। इसे इसे गंभीरता से लेने की अबिलम्ब आवश्यकता है।

कितने शर्म की बात है कि जब राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में देश का प्रत्येक जागरूक नागरिक आतंकवाद और जम्मू कश्मीर को लेकर चिंतित है, सेना को बार्डर पर आतंकवादियों की घुसपैठ रोकने के लिए अभी अभी कर्नल सहित तीन जवानों की शहादत देनी पड़ी है। ऐसे में माननीया महबूबा मुफ्ती टीवी चैनेल पर बड़े फख्र के साथ बयान देती हैं कि कश्मीर में सी आर पी एफ हमारे आगे हाथजोड़ कर कहती है कि आप एक घंटा दे दीजिये, हम बंकर खाली करते हैं और फिर लोग (कौन .. ? पी डी पी / हुर्रियत ? ) बंकर में आग लगा देते हैं।

यह सारी घटनायें हमारी सेना और अर्द्धसैनिक बलों के मनोबल को अपूरणीय क्षति पहुंचा रही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि हमारे लालूजी, मुलायम सिंह यादव और पासवान जी कहाँ हैं? कहाँ है उनकी वह तत्परता ….. जो उन्होंने सिमी के पक्ष में बयान देने के लिये दिखायी थी। बड़े शर्म की बात है कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए सिमी जैसे आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त देशद्रोही संगठन को बचाने के लिए ऐसे लोग आगे आने लगे हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है।

उधर कश्मीर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दोनों तरफ से घेरा जा रहा है। पकिस्तान की तरफ से आने वाले आतंकवादियों की एक बड़ी संख्या घुसपैठ करने के प्रयास में एक तरफ सेना से भिड़ी हुयी है वहीं पर अर्द्धसैनिक बलों को हाथ बांधकर कश्मीरी लोगो की आड़ में हुर्रियत की अलगाववादी भीड़ के सामने खड़ा कर दिया गया है। किस उत्साह के साथ और किसके भरोसे सेना लड़ रही है यह निष्कर्ष स्वयं ही लगाया जा सकता है। एक सैनिक अपना घर बार छोड़कर मोर्चे पर इस विश्वास के साथ डटा रहता है कि वह अपने देशवासियों लिये अपनी जान दांव पर लगा रहा है। किंतु जब उसी सेना के पीछे से भी हल्ला बोला जा रहा है तो … सेना का मनोबल क्या रह जायेगा… यह सोचा जा सकता है। क्या यह पीठ में छुरा भोंकने जैसी बात नहीं है? कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर में हुर्रियत द्बारा आर्थिक नाकेबंदी का झूठा प्रचार लोगों को बरगलाने के अलावा क्या है। जब सेना अपनी शहादत देते हुए बार्डर पर आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए प्रयास कर रही हो ऐसे में करते हुए काश्मीर की मासूम अवाम को बरगलाकर युद्धविराम रेखा को पार करके सेना को चुनौती देना क्या देशद्रोह नहीं है ? हुर्रियत के नेता पकिस्तान चलो के नाम पर सूफी संतों की शांतिप्रिय धरती कश्मीर में पाकिस्तान के हाथ में खेलते हुये तालिबानी मानसिकता के पोषक बनते जा रहे हैं।

देश में यह सारा संकट तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिकों ने ही उत्पन्न किया है। लालू का भ्रष्टाचार, मुलायम द्बारा मुस्लिम वोट के लिये सिमी को संरक्षण, पासवान की मौकापरस्त राजनीति अथवा शिबूसोरेन को मुख्यमंत्री पद का उपहार। देश का आम आदमी जब तक जाति, धर्म, संप्रदाय अथवा अन्य स्वार्थों से ऊपर उठकर इन मशरूम की तरह उगे नेताओं को सबक सिखाने के लिए आगे नहीं आयेगा, इस राष्ट्र में शान्ति नहीं हो सकेगी। सारा देश आर्थिक प्रगति के बाद भी मुठ्ठी भर लोगों के हाथों में कैद हो गया है। यह देश हम सब का है किसी भी हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई अथवा किसी एक अकेले समुदाय का नहीं है। आतंकवादियों का विष्फोट किसी समुदाय विशेष की जान नहीं लेता है वह हमारे राष्ट्र के नागरिक की जान लेता है। पानी अब नाक से ऊपर आ चुका है कृपया जागें …. और सही ग़लत के बीच फैसला करें

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Anonymous
    अगस्त 24, 2008 @ 17:17:00

    हमारे नेता ही इस देश के दुश्मन बने हुए हैं तो पडो़सी को क्यों गाली दें। जो लठ को कभी तेल पिलाने को कहा था आज उसी लाठी से इन नेताओं पर वार करके ही देश बचाया जा सकता है।

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  2. संजय बेंगाणी
    अगस्त 25, 2008 @ 05:49:00

    समझ में नहीं आता सेना किसके लिए और क्यों लड़ रही है? भारी हताशा के क्षण है.

    प्रतिक्रिया

  3. Suresh Chiplunkar
    अगस्त 25, 2008 @ 11:28:00

    आप तो बस “सेकुलरिज़्म” की जय बोलिये और खुश रहिये, काहे इन सब चक्करों में पड़ते हैं “महारानी” हैं ना सब देखने के लिये…

    प्रतिक्रिया

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