देश मेरा जल रहा

है जमीं ये जल रही
आसमां ये जल रहा
घर पडोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल अरि
अब युद्व में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में किस कृष्ण की
हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
हर हृदय में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में है
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

माँ सरस्वती वंदना नीचे प्लेयर से क्लिक करके सुने
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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Parul
    सितम्बर 14, 2008 @ 08:06:00

    घर पड़ोसी का नहीं येदेश मेरा जल रहा sahi kahaa aapney…!!na jaaney kab khatam hogi ye leela

    प्रतिक्रिया

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