एक अस्तित्व जाने कहाँ खो गया? खोज रही हूँ….. आपकी लघुकथा में बहुत सारी कथाएँ और प्रश्न हैं

“…… बेटी, बहिन, पत्नि, माँ, विधवा, सधवा — सारी संज्ञाएँ मेरी ही तो थीं। क्या मैं भी थी वहाँ? मेरा भी था एक अस्तित्व। जाने कहाँ खो गया? खोज रही हूँ।

कोई है, जो मिला सकता है मुझे मेरे अस्तित्व से ????? –
साहित्यशिल्पी पर -गीता पंडित (शमा) मेरे अस्तित्व से [लघु लथा]

हे बेटी ! हे बहना ! और जगदात्री माँ ….. !
तुम्हे तुम्हारे अस्तित्व के दर्शन कौन करा सकता है .. !!!! ????

एक पुरूष ……. नगण्य …… जो चलना ही तुम्हारी गोद से सीखता है …
……..

….वर्षों से इसी प्रश्न का ह्रदय की अंतरतम भावनाओं के साथ उत्तर ढूँढते हुए, सर्व आयुवर्ग की कक्षाओं में कई बार इसी बात पर चर्चा करता हूँ. अपनी बेटियों को इसी प्रश्न से ऊपर उठाने के प्रयास में लगा भी हूँ. किंतु ……. क्या आप सब भी तैयार हैं …? इस प्रश्न को प्रस्तुत करते हुए मैं टिप्पणी की सीमा से परिचित हूँ. आपकी कथा लघुकथा नहीं है, कथा में बहुत सारी कथाएँ और प्रश्न हैं. जिन्हें हम सब मिल कर ढूढेंगे तो उत्तर भी मिलेंगे. उन उत्तरों की आहट भी निकट भविष्य में देख सुन रहा हूँ ….. विचारों का विस्तार तो संभवतः किसी रचना को लेकर ही आमुख हो सकूं .

तब तक बस निवेदन ही कर रहा हूँ सम्पूर्ण नारी समाज से ……

हे माँ …! हे बेटी….! हे बहना…..! तुम्हारे गर्भ से उत्पत्ति है सम्पूर्ण स्रष्टि की ….. बहुत सारे जटिल कारकों की परिणति है एक बेटे और बेटी के जन्म पर होने वाला भेदभाव जो प्रायः घर ….. परिवार से आरम्भ होता है. जिस दिन यह मिट जायेगा, आपको आपका अस्तित्व मिल जायेगा.

मार्मिक लघुकथा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. manvinder bhimber
    अक्टूबर 18, 2008 @ 10:37:00

    हे माँ …! हे बेटी….! हे बहना…..! तुम्हारे गर्भ से उत्पत्ति है सम्पूर्ण स्रष्टि की ….. बहुत सारे जटिल कारकों की परिणति है एक बेटे और बेटी के जन्म पर होने वाला भेदभाव जो प्रायः घर ….. परिवार से आरम्भ होता है. जिस दिन यह मिट जायेगा, आपको आपका अस्तित्व मिल जायेगा.sunder sandesh hai apki soch mai

    प्रतिक्रिया

  2. Rachna Singh
    अक्टूबर 18, 2008 @ 10:53:00

    एक बेटे और बेटी के जन्म पर होने वाला भेदभाव जो प्रायः घर ….. परिवार से आरम्भ होता है. जिस दिन यह मिट जायेगा, आपको आपका अस्तित्व मिल जायेगा.is aur kiyae jaaney vaaley prayaas naganay haen phir bhi aap ki soch achhi haen badhaai aap ko

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  3. Anonymous
    नवम्बर 09, 2009 @ 11:12:45

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