ओ भारती फिर जाग रे !

वक्त करवट ले रहा है

सलवटों को तुम न देखो

हाथ या माथे खिचीं जो

वो लकीरें तुम न देखो

 

आज पौरूष फिर पुरू का

समय ने ललकार डाला

युग पुरूष ने स्वयं आकर

गाण्डीव फिर तम से निकाला

 

अधर पर पाञ्चजन्य रखकर

लो कृष्ण अब फिर से पुकारे

दुरभिसंधि…. व्यूह युग का

द्रौपदेय को फिर से पुकारे

अभिषेक है रण बांकुरे

ओ भारती फिर जाग रे

 

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. जीवन सफ़र
    दिसम्बर 03, 2008 @ 14:04:00

    सच्चा आह्ववान!आज जागने की ही अहम आवश्यकता है!

    प्रतिक्रिया

  2. makrand
    दिसम्बर 03, 2008 @ 15:06:00

    aap ka lekahan saskat heregards

    प्रतिक्रिया

  3. मोहन वशिष्‍ठ
    दिसम्बर 03, 2008 @ 15:46:00

    कांत साहब दिल गद गद कर दिया साभार

    प्रतिक्रिया

  4. विक्षुब्ध
    दिसम्बर 03, 2008 @ 16:20:00

    ना असमर्थताओं सेना संभावनाओं सेहम घिरे हैंअपनी ही मान्यताओं से …!!ओढी है चादर ऐसीकि छोटी होतो काट लेंहाथ पैर सर गला अपना( बाहिर न निकलना चाहिए )सिकुडन साँस लेने देगीमगर कब तक ?हर कण आज विस्तार चाहता है…पनपता है हर बीज विस्तृत हो पेड़ बनता हैहम क्या उठेंगेधूल धूसरित सेन अस्तित्व का वास्ताना ही विस्तार का बोधजो कहा गया मान लोजो सुन लियापत्थर पर लकीर हैफ़िर कहाँ बचती हैं कुछ कहने सुनने कि परिधियाँसब कुछ होता रहा हैसब कहींबाहिर भी और दूर कहीं अपने अन्दर भीजीवन ना यात्रा है ना ही यातनामहज कुछ मान्यताओं कि सील बंद पिटारी हैकैसे जीत सकेंगे अब , जब ख़ुद ही बाज़ी हारी है जागो …..जागो मेरे मन अचेतन जागो !!

    प्रतिक्रिया

  5. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    दिसम्बर 04, 2008 @ 03:14:00

    कविता बहुत सुंदर हैं पर पौराणिक वीरों को वर्तमान में तलाशना एक मृगमरीचिका ही होगी।

    प्रतिक्रिया

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