मैं ठहरा गंवार… क्या जानूँ … [ कविता ] श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

गाँव की
कच्ची पगडंडी ..
हरी दूब से निकल कर
हरियाली निगलते
कंकरीट के जंगलों में
महानगर की ….
ऊँची अट्टालिकाओं में
अक्सर खो जाता हूँ
घबरा जाता हूँ
राजपथ पर कई बार
युवकों की ‘धूम’
और वाहनों की ..
तेज रफ्तार देखकर
मै ठहरा गँवार
मैं क्या जानूँ …

विकास की आँधी …
और सभ्यता का पहिया
गुजरता है जब भी
मेरे ‘नन्दगाँव’ से
कर जाता है छलनी
अक्सर कई सीने …
सफेद साड़ी में लिपटी भौजाई
… और बिलखती बहना
क्यों नज़रें चुराने लगती हैं
जब कहीं सुनती हैं
‘नेताजी की जय’
का ‘समवेत स्वर’
मै ठहरा गँवार
मैं क्या जानूँ …

कीचड में गुजरता है बचपन
धूल से सने चिथड़े में जवानी
सूरज डूबते ही घुप अंधेरे …..
और वहशी दरिंदों से
अकेले जूझती सुखिया
क्यों ‘सैफई’ हो जाता है
एक गाँव फ़िर भी
रातों रात अचानक ….
मैं ठहरा गंवार
मैं क्या जानूं

हो जाती है बहुधा
भावना के तारों से जुड़े
प्रवासी लोगों के साथ छेड़छाड़
और विदेशियों के साथ ….
हाहाकार ….. !!!
क्यों हो जाता है
उसके बाद और घना
कुछ के ‘पालितों’ का
सुरक्षा घेरा …
जनता के पैसों से
मैं ठहरा गंवार
मैं क्या जानूं

आजकल राम ….
प्रायः निकल जाते हैं
स्वर्ण मृग की तलाश में
लक्ष्मण को ….
राजनीति का कुछ भी पता नहीं
रावण वोट माँगते हुए
अक्सर सीता की कुटिया में
क्यों ठहरता है अब
मैं ठहरा गँवार
मैं क्या जानूँ …
सुलग रहा हूँ शायद
विस्फोट होने तक
सावधान … !
क्योंकि मैं सब जानूँ …

सूनी राहें सूना है मन [कविता] अमिता ‘नीर’

सूनी राहें सूना है मन

वाट निहारूं किसकी

आकुलता बढ़ती जाती है

चैन नहीं है पल की

 

 सुख बयार सिहरन सी लगती

घना अँधेरा छाया

क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी

सब धीरज चुक आया

 

पथ कंटकाकीर्ण हुआ है

आतप फिर आ घेरे

जीवन क्षण भंगुर लगता है

व्याकुल नैना मेरे

 

निशि दिन नभ तकते मेघों हित

चातक और पपीहा

निर्झर बहते मेरे नैना

करते पी हा पी हा

 

कहाँ छिपे घनश्याम राधिका

तुझको तेरी पुकारे

शीश धरूँ चरणों पर मोहन

अब तो कंठ लगा रे

 

ह्रदय बहुत आकुल है मितवा

मुरली मधुर सूना दे

ओ मेरे जीवन प्रिय कृष्णा

आतप दूर भगा दे

 

तरसे तेरी चकोरी चंदा

ये संताप मिटा दे

जीवन राग सुनूँ मधुवन में

निर्झर जीवन रस बरसा दे

 

मन मेरा चहूंओर भटकता

अब तो दरश दिखा दे

विरह कठिन अंतस के दीपक

ह्रदय प्रकाशित कर दे

मैं कड़ुआ हो गया हूँ .. [आलेख] दर्शन – शिवेंद्र मिश्र

(हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर, की बात कहते कहते… और बस…! मेरा मन कसैला होने लगता है….दर्शन)

 इस विशाल विश्व के असीम कोलाहलमय एकांत में बैठे हुए मित्रों से लेकर जनसंकुलता से रहित एकांत में बैठे हुए अत्मकोलाहल से व्यथित मित्रों… मैं आप सबको अपने साथ इस चिंतन में सहभाग करने को आमंत्रित करता हूँ. आप सभी को…. लिंगभेद के बिना.

सोचता हूँ तो लगता है कि मैं आज बहुत कड़ुआ हो गया हूँ…. कसैला. मैं के भीतर का स्वाद.. वह अमृत जाने कहाँ लुप्त हो गया है. यह अमृत गया कहाँ ? सोचना होगा यह अमृत आया कहाँ से था ? जहाँ से भी आया था पर यह तो निश्चित है कि वह उत्स सूख रहा है. एक यह तो सूखना उम्र के पड़ावों के साथ स्वाभाविक है. और इस पर भी इसके राहगीरों और साथियों के द्वारा लगातार फेंकें जा रहे नासमझी भरे पत्थर इस उत्स के सूखने की अवधि को तेजी से और कम करते जा रहे है.

आप भी ऐसा ही सोचते हैं क्या ? …. नहीं….. ! आप ऐसा नहीं सोचते, क्यों ? एक सीधा सवाल पूछता हूँ कि क्या आप उम्र के उस पड़ाव पर नहीं आए अथवा आपके सारे लोग सच्चे ईसाई हो गए हैं और आप भी. क्या कहा कुछ भी कड़ुआ नहीं है. मुझे लगता हैं आप झूठ बोल रहे हैं. 

एक शब्द है सुख . पाश्चात्य विचारकों *मिल और बेन्थम ने इस सुखवाद पर विस्तार से प्रकाश डाला है. अन्य पाश्चात्य विचारकों ने इस चर्चा को आगे बढ़ाया और इसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की. पाश्चात्य जगत और उनसे प्रभावित शेष विश्व के लोगो ने व उनकी सरकारों, मीडिया, बौद्धिकों, वैज्ञानिकों और मनीषियों ने इसको इसके सर्वांगीण विस्तार सहित अपनाया . *(Maximaum happiness of maximum people )

 भारतीय मनीषा ने शब्द खोजा, आनंद.  आनंद का उसी तरह कोई विरोधी शब्द नहीं है जैसे सुख का दुःख. आनंद परमशक्तिवान परमात्मा के भाव का आत्मानुभव है . परमात्मा की प्राप्ति के अनेकानेक पंथो में भक्तिमार्ग, कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग, निष्काम कर्मयोग, आदि… किंतु यह मार्ग अहम का पूर्णतया समर्पण और उस परमशक्ति के प्रति एकभाव के होने से ही संभव है. भारतीय मनीषा ने इसे खोजा भी, और स्थापित भी किया. किंतु यह तो सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य था, सर्वजनोपयोगी नहीं. आनंद आदर्श था और सुख वास्तविकता. इसलिए भारतीय धर्मगुरु, धर्मवेत्ता, सन्यासी जनता को आनंद के मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा देते रहे और स्वयं के लिए सुख के साधन कार, कोठी, बंगले, भव्य पंचसितारा आश्रम, सुंदर – सुंदर देशी विदेशी षोडशी शिष्यायें जुटाते रहे. समान्य जनता के घर आनंद के मार्ग पर बढ़ते हुए सुखों से वंचित रहे, जबकि आनंद का उपदेश देने वाले साधुओं के पास सुखों का अम्बार लगता गया. भारतीय राजनेता, विचारक, वैज्ञानिक आनंद और सुख, आध्यात्मिकता और भौतिकता के मध्य समाज को द्वंद में उलझाये रहे.

 हमें जीने को एक धरातल चाहिए और आगे बढ़ने को आसमान. आनंद आसमान है और सुख यथार्थ. सुख जीवन का हर भोग है जो क्षणिक तो है किंतु भरपूर मजा देता है. इस क्षणिकता को हम साधन के परिवर्तन से पाटने की कोशिश करते हैं. अगर I-10 कार से मन भर जाए तो हम स्कॉर्पियो खरीद लेते हैं, घर को बंगले में बदल लेते है, यह भोगवाद तो है पर वास्तविकता है, यथार्थ है. जो साईकिल नहीं खरीद सकता वह हवाईजहाज का सफर कैसे कर सकता है. भारतीय मनीषियों ने इस चिंतन को ही अभिव्यक्त किया. आनंद के मार्ग के हर पथिक ने सांसारिक सुखो के पार जाकर स्वयं को खरा किया. सांसारिक सुखो के पार जाने का अभिप्राय पाले से अलग खड़ा होना नही है अपितु भौतिक सुखो को भोगते हुए उसकी निस्सारता का आत्मानुभव किया जाए और आनंद के पथ का पथिक बन जाए. यही आनंद है. यही गीता का आमजन के लिए कर्मयोग है शायद इन्ही अनुभवों को **ओशो रजनीश ने सेक्स को लेकर व्यक्त किया है. जब वह कहते है कि सेक्स हमारे शरीर में न रहकर अधिकांशतः हमारे दिमाग में रहता है. मुझे लगता है यह बात हमारे भारतीय हिंदू समाज पर पूर्णतया लागू होती है. हम सेक्स को नहीं भोगते अपितु सेक्स चिंतन, सेक्स दर्शन, सेक्स मनन, एवं सेक्स उक्तियों को भोगते हैं. यह स्थिति क्या है. **(काम कृत्य भी मानसिक कृत्य बन गया है काम मन में चलता रहता है और तुम उसके विषय में सीचते रहते हो) 

श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:-

 ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषुपजायते ।

संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 62

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति 63” 

 ( श्री0 0 गी0 अध्याय 2)

  अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरूष का इन विषयों में संग बढ़ता जाता है. फिर इस संग से काम उत्पन्न होता है. काम की प्राप्ति में विघ्न होने से क्रोध उत्पन्न होता है. क्रोध से सम्मोह अर्थात अविवेक उत्पन्न होता है. अविवेक से स्मृतिभ्रम और स्मृतिभ्रम से बुद्धिनाश होता है और बुद्धि के नाश से व्यक्ति नष्ट हो जाता है.

 मैं गीता का कोई उपदेशक विद्वान तो नहीं किंतु एक सामान्य व्यक्ति के रूप में उक्त श्लोकों पर मनन करें तो निश्चित रूप से हमारा हिंदू समाज उपरोक्त उक्ति के प्रभाव से पूर्णतया ग्रसित है. मेरा मानना है कि यदि व्यक्ति के स्थान पर समाजों, संस्कृतियों और राष्ट्रों के विषय में मूल्यांकन करें तो इस्लाम और इस्लामिक राष्ट्र तथा हिंदू समाज कम से कम ये दो संस्कृतियां है जो ध्यायतो विषयान्पुंस: से ग्रसित है और इसके प्रभाव को भी भोग रहे है. समाज के धर्मनेता, समाजसुधारक, परिवार के मुखिया, शिक्षालयों के तथाकथित वेतनभोगी गुरुजन कोई भी तो सुख और आनंद के दोराहे से… एकरास्ते होकर नहीं ले जाता. बस…! यह सोचकर और देखकर मेरा मन कड़ुआ हो जाता है कि हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर, की बात कहते कहते… और बस…! मेरा मन कसैला होने लगता है….

 24 – आशुतोष सिटी बरेली (उ. प्र.)

प्रतीक्षा में किस कृष्ण की…. हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

है जमीं ये जल रही
आसमां ये जल रहा
घर पडोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल अरि
अब युद्व में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में किस कृष्ण की
हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
हर हृदय में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में है
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

अन्याय से… आतंक से … अब पार कर दो

‘युग पुरूष’ ….
तातश्री !
भीष्म पितामह …!!
यही नाम …
मान देकर ,
बंदी बना दिया
युग ने….

कालजयी अपराजेय..
ब्रह्मचारी …. अक्षुणयुवा …
पिता … पितामह …
सिहासन रक्षक
जीवन के पथ पर …
कंटकों से बेखबर …
निडर ..
किन्तु… फांसा गया
बस कुटिलता की चाल से
बस…..

ढूँढता मैं ,
हा ! हा .. !! हतभागी
वेदना से पूर्ण
अंग अंग छिद्रित
पुकारता हूँ ..
चिरंतन प्रिय अर्जुन

याचन…
तीक्ष्ण शर संधान की ..
अभिशप्त ..
‘इच्छामृत्युवर’ से
विवश हूँ देखनेनिर्निमेष…
‘युग महाभारत’ …
हठज्वाल से ..
धधकती मानवता की
त्राहि त्राहि ..पुकार
गंगेऽ….. गंगेऽऽ ….
माँ लो मुझे
आगोश अपने में
छिपा लो शिशु सा
शरण दो …

अतुल सी जलराशि कुंतल में
स्नेह दो
माँ आज फ़िर से
उद्धार कर दो
धर्म की केंचुल लपेटे
इस अधर्मित राह से

अन्याय से… आतंक से
‘युग पुरूष’ को
अब पार कर दो

शुभकामनायें नव वर्ष की


जीवन की आप धापी में 
भूले विसरे गीत… बधाई
नित नूतन अभिनव गीतों के
बोल बनें अनमोल बधाई

शुभकामनायें नववर्ष की