प्रतीक्षा में किस कृष्ण की…. हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

है जमीं ये जल रही
आसमां ये जल रहा
घर पडोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आज अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल अरि
अब युद्व में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में किस कृष्ण की
हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

अरि हमें ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
हर हृदय में उबल रहा
शीष लेकर हाथ में है
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
घर पड़ोसी का नहीं ये
देश मेरा जल रहा

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9 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Anonymous
    जनवरी 02, 2009 @ 09:45:00

    श्रीकांत जी आजकल के हालातो पर आप काफी अच्छा लिखते है देश को आप जैसे लेखको की जरुरत है जागने के लिएज्योति

    प्रतिक्रिया

  2. Umed
    जनवरी 02, 2009 @ 11:08:00

    जल रहा है देश, हम चुप-चाप देखें.कोसते रहते हैं अपने भाग्य-लेखे.उठ खङे हों, शस्त्र-कर ले, भाग जायेदुष्ट-दुश्मन-पीठ, ससौभाग्य देखें.

    प्रतिक्रिया

  3. रंजना
    जनवरी 02, 2009 @ 13:16:00

    अत्यन्त सुंदर यथार्थपरक और सार्थक इस रचना हेतु आपका आभार और साधुवाद.

    प्रतिक्रिया

  4. dr. ashok priyaranjan
    जनवरी 02, 2009 @ 20:37:00

    बहुत संुदर भाव को शब्दबद्ध किया है । प्रभावशाली साथॆक अभिव्य्क्ति ।नववषॆ में आपकी लेखनी का प्रकाश समस्त भूमंडल को आलोकित करे । इसी भावना के साथ नववषॆ की बधाई ।मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-आत्मविश्वास से जीतें जिंदगी की जंग-समय हो तो इसे पढें और कमेंट भी दें-http://www.ashokvichar.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

  5. Suresh Chandra Gupta
    जनवरी 03, 2009 @ 07:23:00

    @घर पड़ोसी का नहीं ये देश मेरा जल रहा.बहुत सुंदर.

    प्रतिक्रिया

  6. शोभा
    जनवरी 03, 2009 @ 11:01:00

    आपने सच कहा है. देश की दशा ऐसी ही है.

    प्रतिक्रिया

  7. anuradha srivastav
    जनवरी 08, 2009 @ 07:01:00

    यथार्थवादी और चिन्तन को प्रेरित करती सशक्त रचना………..

    प्रतिक्रिया

  8. अवनीश एस तिवारी
    जनवरी 08, 2009 @ 14:00:00

    वास्तव में आप की चिंता जायज है |समर्थन है |अवनीश तिवारी

    प्रतिक्रिया

  9. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन
    जनवरी 09, 2009 @ 00:58:00

    आज के यथार्थ का चित्रण करती हुई आपकी यह रचना दिल को छू गयी, बधाई!

    प्रतिक्रिया

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