मैं कड़ुआ हो गया हूँ .. [आलेख] दर्शन – शिवेंद्र मिश्र

(हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर, की बात कहते कहते… और बस…! मेरा मन कसैला होने लगता है….दर्शन)

 इस विशाल विश्व के असीम कोलाहलमय एकांत में बैठे हुए मित्रों से लेकर जनसंकुलता से रहित एकांत में बैठे हुए अत्मकोलाहल से व्यथित मित्रों… मैं आप सबको अपने साथ इस चिंतन में सहभाग करने को आमंत्रित करता हूँ. आप सभी को…. लिंगभेद के बिना.

सोचता हूँ तो लगता है कि मैं आज बहुत कड़ुआ हो गया हूँ…. कसैला. मैं के भीतर का स्वाद.. वह अमृत जाने कहाँ लुप्त हो गया है. यह अमृत गया कहाँ ? सोचना होगा यह अमृत आया कहाँ से था ? जहाँ से भी आया था पर यह तो निश्चित है कि वह उत्स सूख रहा है. एक यह तो सूखना उम्र के पड़ावों के साथ स्वाभाविक है. और इस पर भी इसके राहगीरों और साथियों के द्वारा लगातार फेंकें जा रहे नासमझी भरे पत्थर इस उत्स के सूखने की अवधि को तेजी से और कम करते जा रहे है.

आप भी ऐसा ही सोचते हैं क्या ? …. नहीं….. ! आप ऐसा नहीं सोचते, क्यों ? एक सीधा सवाल पूछता हूँ कि क्या आप उम्र के उस पड़ाव पर नहीं आए अथवा आपके सारे लोग सच्चे ईसाई हो गए हैं और आप भी. क्या कहा कुछ भी कड़ुआ नहीं है. मुझे लगता हैं आप झूठ बोल रहे हैं. 

एक शब्द है सुख . पाश्चात्य विचारकों *मिल और बेन्थम ने इस सुखवाद पर विस्तार से प्रकाश डाला है. अन्य पाश्चात्य विचारकों ने इस चर्चा को आगे बढ़ाया और इसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की. पाश्चात्य जगत और उनसे प्रभावित शेष विश्व के लोगो ने व उनकी सरकारों, मीडिया, बौद्धिकों, वैज्ञानिकों और मनीषियों ने इसको इसके सर्वांगीण विस्तार सहित अपनाया . *(Maximaum happiness of maximum people )

 भारतीय मनीषा ने शब्द खोजा, आनंद.  आनंद का उसी तरह कोई विरोधी शब्द नहीं है जैसे सुख का दुःख. आनंद परमशक्तिवान परमात्मा के भाव का आत्मानुभव है . परमात्मा की प्राप्ति के अनेकानेक पंथो में भक्तिमार्ग, कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग, निष्काम कर्मयोग, आदि… किंतु यह मार्ग अहम का पूर्णतया समर्पण और उस परमशक्ति के प्रति एकभाव के होने से ही संभव है. भारतीय मनीषा ने इसे खोजा भी, और स्थापित भी किया. किंतु यह तो सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य था, सर्वजनोपयोगी नहीं. आनंद आदर्श था और सुख वास्तविकता. इसलिए भारतीय धर्मगुरु, धर्मवेत्ता, सन्यासी जनता को आनंद के मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा देते रहे और स्वयं के लिए सुख के साधन कार, कोठी, बंगले, भव्य पंचसितारा आश्रम, सुंदर – सुंदर देशी विदेशी षोडशी शिष्यायें जुटाते रहे. समान्य जनता के घर आनंद के मार्ग पर बढ़ते हुए सुखों से वंचित रहे, जबकि आनंद का उपदेश देने वाले साधुओं के पास सुखों का अम्बार लगता गया. भारतीय राजनेता, विचारक, वैज्ञानिक आनंद और सुख, आध्यात्मिकता और भौतिकता के मध्य समाज को द्वंद में उलझाये रहे.

 हमें जीने को एक धरातल चाहिए और आगे बढ़ने को आसमान. आनंद आसमान है और सुख यथार्थ. सुख जीवन का हर भोग है जो क्षणिक तो है किंतु भरपूर मजा देता है. इस क्षणिकता को हम साधन के परिवर्तन से पाटने की कोशिश करते हैं. अगर I-10 कार से मन भर जाए तो हम स्कॉर्पियो खरीद लेते हैं, घर को बंगले में बदल लेते है, यह भोगवाद तो है पर वास्तविकता है, यथार्थ है. जो साईकिल नहीं खरीद सकता वह हवाईजहाज का सफर कैसे कर सकता है. भारतीय मनीषियों ने इस चिंतन को ही अभिव्यक्त किया. आनंद के मार्ग के हर पथिक ने सांसारिक सुखो के पार जाकर स्वयं को खरा किया. सांसारिक सुखो के पार जाने का अभिप्राय पाले से अलग खड़ा होना नही है अपितु भौतिक सुखो को भोगते हुए उसकी निस्सारता का आत्मानुभव किया जाए और आनंद के पथ का पथिक बन जाए. यही आनंद है. यही गीता का आमजन के लिए कर्मयोग है शायद इन्ही अनुभवों को **ओशो रजनीश ने सेक्स को लेकर व्यक्त किया है. जब वह कहते है कि सेक्स हमारे शरीर में न रहकर अधिकांशतः हमारे दिमाग में रहता है. मुझे लगता है यह बात हमारे भारतीय हिंदू समाज पर पूर्णतया लागू होती है. हम सेक्स को नहीं भोगते अपितु सेक्स चिंतन, सेक्स दर्शन, सेक्स मनन, एवं सेक्स उक्तियों को भोगते हैं. यह स्थिति क्या है. **(काम कृत्य भी मानसिक कृत्य बन गया है काम मन में चलता रहता है और तुम उसके विषय में सीचते रहते हो) 

श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:-

 ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषुपजायते ।

संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 62

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति 63” 

 ( श्री0 0 गी0 अध्याय 2)

  अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरूष का इन विषयों में संग बढ़ता जाता है. फिर इस संग से काम उत्पन्न होता है. काम की प्राप्ति में विघ्न होने से क्रोध उत्पन्न होता है. क्रोध से सम्मोह अर्थात अविवेक उत्पन्न होता है. अविवेक से स्मृतिभ्रम और स्मृतिभ्रम से बुद्धिनाश होता है और बुद्धि के नाश से व्यक्ति नष्ट हो जाता है.

 मैं गीता का कोई उपदेशक विद्वान तो नहीं किंतु एक सामान्य व्यक्ति के रूप में उक्त श्लोकों पर मनन करें तो निश्चित रूप से हमारा हिंदू समाज उपरोक्त उक्ति के प्रभाव से पूर्णतया ग्रसित है. मेरा मानना है कि यदि व्यक्ति के स्थान पर समाजों, संस्कृतियों और राष्ट्रों के विषय में मूल्यांकन करें तो इस्लाम और इस्लामिक राष्ट्र तथा हिंदू समाज कम से कम ये दो संस्कृतियां है जो ध्यायतो विषयान्पुंस: से ग्रसित है और इसके प्रभाव को भी भोग रहे है. समाज के धर्मनेता, समाजसुधारक, परिवार के मुखिया, शिक्षालयों के तथाकथित वेतनभोगी गुरुजन कोई भी तो सुख और आनंद के दोराहे से… एकरास्ते होकर नहीं ले जाता. बस…! यह सोचकर और देखकर मेरा मन कड़ुआ हो जाता है कि हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर, की बात कहते कहते… और बस…! मेरा मन कसैला होने लगता है….

 24 – आशुतोष सिटी बरेली (उ. प्र.)

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. आलोक
    जनवरी 11, 2009 @ 14:07:00

    प्रेरक लेख। धन्यवाद।

    प्रतिक्रिया

  2. nesh
    जनवरी 11, 2009 @ 16:32:00

    bhaut achha hindu samaj ko jarurt hai en baato ki

    प्रतिक्रिया

  3. रंजना [रंजू भाटिया]
    जनवरी 14, 2009 @ 13:40:00

    बहुत कुछ कह गया यह लेख ..इन बातो को याद रखना अब हर किसी के लिए जरुरी है ..अच्छा प्रेरक लिखा है आपने

    प्रतिक्रिया

  4. श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
    जनवरी 20, 2009 @ 12:47:00

    हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर, की बात कहते कहते… और बस…! मेरा मन कसैला होने लगता है… शिवेंद्र जी आपने शब्दों में हिंदू समाज के सन्मुख व्याप्त त्रासदी पर बहुत ही यथार्थ परक लेख लिखा है ……

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