सूनी राहें सूना है मन [कविता] अमिता ‘नीर’

सूनी राहें सूना है मन

वाट निहारूं किसकी

आकुलता बढ़ती जाती है

चैन नहीं है पल की

 

 सुख बयार सिहरन सी लगती

घना अँधेरा छाया

क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी

सब धीरज चुक आया

 

पथ कंटकाकीर्ण हुआ है

आतप फिर आ घेरे

जीवन क्षण भंगुर लगता है

व्याकुल नैना मेरे

 

निशि दिन नभ तकते मेघों हित

चातक और पपीहा

निर्झर बहते मेरे नैना

करते पी हा पी हा

 

कहाँ छिपे घनश्याम राधिका

तुझको तेरी पुकारे

शीश धरूँ चरणों पर मोहन

अब तो कंठ लगा रे

 

ह्रदय बहुत आकुल है मितवा

मुरली मधुर सूना दे

ओ मेरे जीवन प्रिय कृष्णा

आतप दूर भगा दे

 

तरसे तेरी चकोरी चंदा

ये संताप मिटा दे

जीवन राग सुनूँ मधुवन में

निर्झर जीवन रस बरसा दे

 

मन मेरा चहूंओर भटकता

अब तो दरश दिखा दे

विरह कठिन अंतस के दीपक

ह्रदय प्रकाशित कर दे

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. समयचक्र - महेद्र मिश्रा
    जनवरी 14, 2009 @ 15:29:00

    सूनी राहें सूना है मन वाट निहारूं किसकी आकुलता बढ़ती जाती है चैन नहीं है पल की..बढ़िया अभिव्यक्तिपूर्ण रचना ,,,

    प्रतिक्रिया

  2. रंजना
    जनवरी 15, 2009 @ 10:18:00

    वाह ! अतिसुंदर भावपूर्ण प्रवाहमयी इस रचना हेतु आभार……….ऐसे ही लिखते रहें…..शुभकामनाये.

    प्रतिक्रिया

  3. शोभा
    जनवरी 15, 2009 @ 16:27:00

    मन मेरा चहूंओर भटकता अब तो दरश दिखा दे विरह कठिन अंतस के दीपक ह्रदय प्रकाशित कर देबहुत सुन्दर और प्रभावशाली लिखा है। दिल की गहराई से जब लिखो, तब ऐसा ही सुन्दर काव्य बनता है। इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

    प्रतिक्रिया

  4. ताशु
    जनवरी 17, 2009 @ 15:33:00

    …….सुख बयार सिहरन सी लगतीघना अँधेरा छायाक्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ीसब धीरज चुक आया……..सुंदर प्रयोग आगामी रचनाओं के लिए शुभकामना

    प्रतिक्रिया

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