ब्राह्मणों की बौद्धिक पराजय और वेंटिलेटर पर जिन्दा हिन्दू समाज [आलेख] शिवेंद्र कुमार मिश्र

[वसन्तपंचमी से हिन्दू समाज में……..क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुपहिन्दू तालिबानी‘ तो पैदा नहीं कर रहेजो समाज निरन्तर आत्ममंथन और चिन्तन नहीं करता वह समाज वेन्टीलेटर‘ पर जिन्दा रहता है और एक जीवित समाज के सभी लक्षण खो देता हैतो यह सोचना भी प्रासंगिक होगा कि क्या हम जीवित समाज कहलाने के लायक हैं या नहीं.]

.       आइये स्वागत करें ऋतुराज बसन्त का बसन्त का आगमन ऋतु परिवर्तन का कारक तो है ही इसके साथ ही मन के भाव परिवर्तन का कारक भी है. बसन्त के आगमन के साथ ही खेतों में पीली चूनर ओढ़े प्रकृति नायिका यौवन श्रृंगार कर नाचने लगती है. वृक्षों पर नए नए पत्ते आ जाते हैं मानों जवान होते युवक के चेहरे पर मूछें निकलने लगी हों. हर ओर छा जाती है मादकतामचलने लगता है मनमयूरसंगिनी संग नत्य को….. और नायिकाएं मनभावन पिया की बाहों में मचलने को पागल होने लगती हैं.  क्या सुखद आश्चर्य है कि पाश्चात्यों का वेलेन्टाइन डेभी इसी समय पर पड़ता है.

 प्रश्न  यह भी है कि क्या व्यक्ति की निजता का कोई मूल्य हिन्दू समाज ओर राज्यके लिए है?  उसका कोई मूल्य है?  क्या हमारा संविधान जो व्यक्ति की स्वंतत्रता का उदघोष करता है उसके सरंक्षक अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान हैं? हिन्दू समाज के मनीषियों को यह भी तय करना होगा कि युवा स्त्री को वरचयन काअधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं. क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुप हिन्दू तालिबानीतो पैदा नहीं कर रहे.

वसंतोत्सव के दो रुप भारतीय हिन्दू समाज में प्रचलित हुए. एक वह रूप जो हमारे ब्राह्मणवादी  समाज होने की आलोचना से जुड़ा है. अर्थात अधिक नैतिक और अधिक कर्मकाण्डी होना. वसंतोत्सव में इसका रूप देवी सरस्वती के पूजन से जुड़ा है. माघशुक्ल पंचमी अर्थात बसन्तपंचमी, सरस्वती पूजन और उपनयन संस्कार के लिए शुभ मान जात है। वसन्तेब्राम्हणमुपनयेतयह तथाकथित अतिशय नैतिकतावादी आचरण मानवीय स्वाभाविकता, उसकी उत्सवप्रियता शरीर की स्वाभाविक भूखआहारनिद्राभयमैथुनानिआदि के मूल्य पर समाज को परोसा जाने लगा. इसने न केवल व्यक्ति की निजता का हरण कर लिया अपितु समाज की स्वाभाविक गति पर भी विराम लगा दिया जो आज तक बाधा का काम कर रहा है.  संभवत: समाज को अतिशय नैतिक और कर्मकाण्डी बनाने का दिशाबोध ब्राम्हणों के अपने बौद्धिक पतन और आत्मसम्मान खो जाने के मनोभय से उत्पन्न हुआ होगा. कहना कठिन है कि यह हीनग्रन्थि किस समय से ब्राम्हण वर्ग में उत्पन्न हुई होगी.  यद्यपि यह ऐतिहासिक शोध का बिषय है तथापि संभव है यह 600 ईषा पूर्व में समाज में जो उथल पुथल हो रही थी. जिसमें महात्मा बुद्ध और महावीर जैन जैसे समाज सुधारक दार्शनिकों ने अपना योगदान दिया और समाज में ठहराव और विभ्रम की स्थिति को दूर करने का प्रयत्न किया. उस समय की स्थितियों मे संभव है ब्राहमणों ने अपनी आत्मरक्षा के लिए कर्मकाण्ड को अधिक प्रेरित किया होगा और जैनियों तथा बौद्धों से तुलना करते हुए समाज को अधिकाधिक नैतिकता की ओर झोंकना प्रारम्भ कर दिया होगा. इसकी पुष्टि पातंजलिकृत संस्कृत व्याकरण ग्रंथ महाभाष्यमें मूर्तिऔर मूर्तिकारशब्दों के प्रयोग से होती है. पतंजलि को पुष्यमित्र सुंग का समकालिक माना जाता हैं. पुष्यमित्र का काल 100 बी सी मान्य है। भारतीय हिन्दू समाज में यदि मन्दिर निर्माण कला को तिथिबद्ध किया जाए तो गुप्तकाल से यह कुशलता समाज मे और प्रतिष्ठा पाने लगी. इतिहास में गुप्त शासकों का काल 319 बी सी 585 बी सी माना जाता है। जाता है. 11वीं और 12वीं सदी मूर्ति और मन्दिर निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. उत्तरप्रदेश के जनपद कानपुर के निकट भीतर गांव नामक स्थान पर स्थित मन्दिर गुप्तकालीन माना जाता है. यह मन्दिर हमारी मन्दिर निर्माण कला का प्रारम्भिक नमूना माना जा सकता है.

अधिक विषयान्तर में न जाकर यह कहना चाहूँगा कि ईषा पूर्व प्रथम सदी ने ब्राह्मणों के बौद्दिक पलायन के कारण मूर्ति पूजा के बीज डाले जो १२वीं सदी तक वटवृक्ष बन गए. हिन्दी भक्तिकाल का युग अर्थात 16वीं 17वीं सदी ने मन्दिरों की मूर्तियों को विघ्नविनाशक मंगलकारक मोक्षप्रदायक सर्वमंगलमांगल्येबना दिया.  धीरे धीरे यह गुण पशु पक्षियों पर्वतों नदियों यहॉ तक कि यह सरलीकरण त्योहारों कथाओं व्रतों उपवासों कहॉ तक कहूँहरि अनन्त हरि कथा अनन्ताकी भॉति सर्वत्र व्याप्त हो गया। ब्राह्मणों की बौद्धिक पराजय ने हिन्दू समाज को धर्मभीरु कायर नपुंसक बना दिया। गोस्वामी तुलसीदास के राम और उनकी रामकथा ने समाज को अतिशय नैतिक बनने का दिशा बोध दिया जो व्यवहार शून्य और एक हद तक असामाजिक था. कृष्ण भक्तों और उनके आन्दोलन ने समाज का धार्मिक कार्य नाचने गाने तक सीमित कर दिया. हिन्दू समाज महान नैतिक किन्तु व्यवहारिक और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत दिशाबोध से वचिंत कर दिया गया. जब समाज इतने भयंकर उथल पुथलसे गुजर रहा था और गुजर रहा है तो भला बसन्त और उसके आगमन पर मनाए जाने बाले उत्सवों की क्या बिसात जो इससे बच जाते. अस्तु! वसंतोत्सव का कामोद्दीपक और रागोद्दीपक उत्सव भी ब्राह्मणों की कर्मकाण्डी नजरों की भेंट चढ़ गया.  अब वसंतोत्सव मात्र पाटी पूजन उपनयन संस्कार शिक्षा प्रारम्भ करने की तिथि मात्र बन कर रह गया.

मनुष्य सदा से उत्सवधर्मी रहा है.. स्त्री पुरुषों का साथ साथ उठना बैठना नाचना गाना यह स्भाविकता है. आकर्षण प्रकृति का धर्म है. हमारे वैदिक ऋषियों ने इसे पहचाना भी और इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को व्यक्ति और समाज दोनो के ही हित में मूल्यांकित किया. डॉ राधाकुमुद मुखर्जी ने अपनी पुस्तक हिन्दू सभ्यता मेंबताया है कि ऋग्वैदिक काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों ही झांझ मजीरों और अन्य वाद्यों के साथ नृत्य में साथ साथ भाग लेते थे आघाटि10/146/2′. वात्सायन ने कामसूत्र में घटानिबन्धानिशब्द का प्रयोग किया है ब्याख्याकारों ने जिसका अर्थ विभिन्न उत्सवों में देवस्थान पर जाकर सामूहिक नृत्य गान आदि के आयोजन में भाग लेना माना है. कामसूत्र में जिन उत्सवों की चर्चा की गयी है उनमें वसंतोत्सव भी शामिल है. यक्षरात्रि: कौमुदी जागर: सुवसन्तक:। वात्सायन वसन्त्ऋतु के उत्सव पर स्त्री पुरुषों द्बारा सामूहिक रुप से खेले जाने वाले खेलों का भी उल्लेख करतै हैं। सहकारभज्जिंका अष्यूषखादिका बिसखादिका नवपात्रिका उदकक्ष्वेडिका पांचालानुयानम एकषाल्मली कदम्बयुध्दानि तास्ताश्च माहिमान्यो देश्याश्च क्रीडाजनेभ्यो विशिष्टमाचारेयु: इति संभूयक्रीडा।

इन उदाहरणों का उद्देश्य तथ्यपूर्ण ढंग से यह सिद्ध करना है कि भारत और हिन्दू समाज में स्त्री पुरुषों के साथ साथ संव्यवहार करने की परम्परा वेदकाल तक प्राचीन है. यह तो स्वत: स्पष्ट ही है कि ऐसे आयोजनों में युवा स्त्री और पुरुष ही अधिकाधिक संख्या में भाग लेते थे. आज भी ऐसे आयोजनों में युवक युवतियों की संख्या ही ज्यादा रहती है. वेलेन्टाइन डेके प्रेमयुगल और होली की मस्ती में किसी कामिनी के गोरे गालों पर रंग लगाने को आतुर युवक की व्याकुलता सब कुछ बयॉ कर देती है. होली की मस्ती में ऐसी कौन युवती होगी जो अपने प्रियतम की बाहो में सिमटकर होली के रंगों में सराबोर न होना चाहे।ऐसा कौन प्रौढ और वृद्ध होता है जो होली में बहकना नही चाहता. लोकगीत सबके मस्त हो जाने के भाव से भरे हैं होली में बाबा देवर लागें होली में‘ . आश्चर्य है कि ऐसी रंग भरी मस्ती भरी संस्कृति के तथाकथित आधुनिक रक्षक वेलेन्टाइन जोडों को अपमानित करके संस्कृतिरक्षा का गौरव अनुभव करते हैं और इन संस्कृतिपशुओं को मानवों के संसार से डंडे मारकर खदेड़ने वाला कोई नहीं

एक अन्तिम तथ्य और प्रस्तुत करते हुए मैं अपनी बात समाप्ति की ओर ले जाउंगा. ऋतुराज वसन्त के आगमन का प्रथम दिवस वसन्तपंचमी है और होलिकोत्सव का प्रारम्भ भी वसन्तपंचमी से ही होता है. इस दिन प्रथम बार गुलाल उड़ाई जाती है जिसका अन्त फाल्गुनपूर्णिमा को होता है. रास के रचैया भगवान श्री कृष्ण हालिकोत्सव के अधिदेवता हैं चरकसंहिता में लिखा है कि वसन्तऋतु में स्त्री रमण तथा वनविहार करना चाहिए.कामदेव वसन्त के अनन्य सहचर हैं. अतएव कामदेव और देवी रति की पूजा भी इस तिथि को की जाती है. वसन्तपंचमी से हिन्दू समाज में विवाह कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाते हैं जो होलिकोत्सव के आठ दिन पूर्व होलिकाष्टकतक निरन्तर चलते रहते हैं. लगनका यह सिलसिला होली के पश्चात नवदुर्गा से ही प्रारम्भ होता है. मुझे समझ में नहीं आता कि प्रेम, काम, राग, आकर्षण एवं स्त्री पुरुष के सम्मिलन की इतनी सशक्त वैज्ञानिक और दृढ सांस्कृतिक परम्परा होते हुए भी कोई जीवित समाज कतिपय हुड़दंगियों और उदण्ड सैनिकों को यह तय करने का अधिकार कैसे दे सकता है कि किस युवा स्त्री को किस पुरुष के साथ संबन्ध रखना चाहिए. किसकोकिसके साथ घूमना चाहिए. प्रश्न यह भी है कि क्या व्यक्ति की निजता का कोई मूल्य हिन्दू समाज ओर राज्यके लिए है?  उसका कोई  मूल्य है?  क्या हमारा संविधान जो व्यक्ति की स्वंतत्रता का उदघोष करता है उसके सरंक्षक अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान हैं? हिन्दू समाज के मनीषियों को यह भी तय करना होगा कि युवा स्त्री को वरचयन काअधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं. क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुप हिन्दू तालिबानीतो पैदा नहीं कर रहे. जो समाज निरन्तर आत्ममंथन और चिन्तन नहीं करता वह समाज वेन्टीलेटरपर जिन्दा रहता है और एक जीवित समाज के सभी लक्षण खो देता है. तो यह सोचना भी प्रासंगिक होगा कि क्या हम जीवित समाज कहलाने के लायक हैं या नहीं.

इति समाप्तम्

शिवेंद्र कुमार मिश्र

आशुतोष सिटी,

बरेली ( उ. प्र.)

 

मुक्तिद्वार की सीढियां …[कहानी] श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

“हेलो “


” हेलो… आज इतने दिनों बाद “

” हाँ आज तुम्हारा स्मरण बहुत आवेग के साथ कर रहा था “

” सच पूछो तो मैं भी कल से ….”
” क्लासेस …? डिस्टर्ब तो नहीं ….. “

” नहीं .. नहीं … अभी फ्री हूँ. स्टूडेंट्स एनुअल फंक्शन की रिहर्सल में बिजी हैं . इतने दिनों बाद कम से कम आधा घंटा तो हम बात कर ही सकते हैं. वैसे भी तुम बात करने में बहुत कंजूस हो “

” … सच पूछो कल से बहुत ही अन्यमनस्क अनुभव कर रहा था”
” फिर इतना बिलम्ब कैसे ..? कल ही क्यों नहीं काल किया. तबियत ठीक है ना.. तुम भी .. “


” नहीं नहीं .. ऐसा कुछ नहीं. बस पिछले कुछ दिनों बहुत अकेला सा अनुभव किया. जीवन की आपाधापी भरी तंग गलियों से जब भी गुजरा.. हरबार संभवतः उसी मोड़ पर पहुँच गया जहाँ पर कई बार अपनी परछाई तलाश करने लगता हूँ … मेरा स्वभाव तुम्हें पता ही है “

” वैसे मैं भी इस बार तुमसे बहुत नाराज़ हूँ … शायद थी अब नहीं. सोचा इस बार कोई फोन नहीं करूंगी… बहुत स्वार्थी हो गए हो …. बस नाम… नाम और काम. शायद मेरा अस्तित्व अब कहीं नहीं. इन दिनों तुम्हारे बारे में बहुत सोचा. जब भी याद किया… बस यही तय किया कि जब तक तुम्हारा काल नहीं आएगा, फोन नहीं करूंगी “

” थैंक्स… पता नहीं इसे क्या कहें जब भी मुझे या तुम्हें, दूसरे की तीव्र अनुभूति होती है, अगले की काल अपने आप ही आ जाती है “

” तो स्वयं की परछाई मिली ……”

” … संभवतः एक नाम …. एक सुखद सा अहसास … जब मन में थोड़ा झाँका और पास गया ..पहचाना … यह तो तुम्हारा ही चेहरा था…..”

” ऐसा कैसे होता है …. ? “


” कैसा …!!! “

” हम दोनों जीवन में अब तक मात्र एक बार मिले हैं और वह भी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में. निजी जीवन में अपने अलग अलग क्षेत्रों में व्यस्त होने के बाद भी लगता है कि युगों से एक साथ ही चल रहे हैं. है ना यह आश्चर्यजनक ? “

” हाँ यह है तो … शायद ही कोई हमारी बात पर विश्वास कर सके ….. “

” किंतु हम जानते हैं कि यही सत्य है .. उस एक बार की हमारी संक्षिप्त सी भेंट और औपचारिक हाथ मिलाने का स्पर्श … लगता है जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है. जीता जा रहा हूँ तब से….. अब तक का लंबा अंतराल कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला “

” तुम्हारी सारी बातें मुझे अब तक याद हैं. एक दिन तुमने कहा था ‘मुझे लगता है कि हमारे मानवीय जीवन की डगर का कोई ऐसा आयाम भी है जो सर्द रात्रि में भावना की गरमी और जीवन के जटिल संघषों की तपिश में एक घनेरी छाँव बनकर आकारहीन और आधारहीन होते हुए भी एक स्वरुप बनकर हमारे साथ हो लेता है ’ “

” ….. सच में जब भी थकता हूँ … खोजता हूँ स्वयं को … अंतस में तुम्हारा चेहरा उभरने लगता है. “

” .. हूँम्मऽ.. बस कहते रहो …. मन का सारा प्रस्तार बाहर आने दो “

“तुमने अपने बारे में आज तक मात्र एक बार इतना ही बताया कि तुम विवाहित हो. आगे तुम्हारी अनिच्छा के कारण मैंने अब तक तुम्हारे बारे में कुछ भी जानने की चेष्टा नहीं की. किंतु आज बताना चाहता हूँ कि जब भी अपना अस्तित्व तलाश करने का प्रयास करता हूँ.. अंतस में बस तुम्हारा ही स्मरण आता है और मैं ध्येय कामना विहीन निराबोध शिशु सा तुम्हारी ओर निहारने लगता हूँ “

“… हा हा… तुम इतने निराबोध हो …? “

” इसका उत्तर तो तुम ही दे सकती हो, स्वयं को और मुझे भी. फिर भी संभवतः सर्वज्ञ होने का हमारा दंभ ही हमें बहुत बेचैन करता रहता है. यही कारण है कि तुम्हारे सान्निध्य में एक निराबोध शिशु सा होकर मैं बहुत ही सहज अनुभव करता हूँ………”

” रहने भी दो…आनलाइन ही सही किन्तु वर्षों से तुम्हें जानती हूँ, लगता है चाटुकारिता के विद्यालय में पहली बार प्रवेश लिया है. यह तुम्हारे वश की बात नहीं. तुम जैसे हो वैसे ही अच्छे लगते हो … “

” नहीं ….ऐसा नहीं है. कह लेने दो मुझे.. आज जो अनुभव हो रहा है वही तुमसे कहा …. ”

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “

” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “



” हूँम्मऽ…. आज सोचती हूँ कि साइबर संपर्कों में गाम्भीर्य का नितांत अभाव और शाब्दिक नग्नता से आहत जब मैंने यह तय किया था कि तुम्हारे जैसे गंभीर रचनाकार की नेट पर वास्तविकता को परख कर ही रहूंगी तो यह कभी नहीं सोचा था कि तुम नेट पर भी संन्यासी जैसी बातें ही करोगे. राष्ट्रप्रेम, दर्शन .. अध्यात्म और यही सब दुरूह बातें.साईबर वर्ल्ड में तुम्हें दूसरों से भिन्न पाकर आरम्भ में आश्चर्यचकित थी…. अन्यथा मैंने बड़े बड़ों को दो या तीन बार आनलाइन होते ही उनकी औकात पर आते हुए देखा था. सोचती थी कि तुम भी देर सवेर वैसे ही निकालोगे किंतु ऐसा न हुआ “

“छोडो वह सब … हमें पता है कि हमारे जीवन अपने अपने मार्ग पर सहज ढंग से चल रहे हैं. आगे भी इसी प्रकार चलते रहेंगे. कदाचित यह समय समय पर पारस्परिक भावनात्मक निर्भरता हमें बांधे हुए है.इसकी अनुभूति संसार की सभी परिभाषाओं से परे होकर भी अप्रतिम है. क्या है यह …? “

” मैं नहीं जानती … इस बात का उत्तर भी बहुधा तुमने स्वयं ही दिया है. तुम्हारे शब्द ही दोहरा रही हूँ …. यह जीवन की एकाकी नीरसता को भंग करते हुए वय के उत्तरार्ध की, हमारे मन की नैसर्गिक खोजी प्रवृत्ति ही है…. यह शारीरिक आकर्षण न होकर … विशुध्द बौद्धिक और भावनात्मक आवश्यकता है जो जीवन के नीरस ठहराव, स्थायित्व और उससे उपजी जड़ता को चैतन्य प्रदान करने लगती है … उससे लड़ने के लिए वय के ढलाव के प्रतिकूल उसमें ऊर्जा भरती है….. तुमने ही तो इसे परिभाषित किया है कई बार.. फिर …? “

” कहो तुम्हारे मुंह से सुनना अच्छा लगता है… “


” तुमने आज तक विवाह क्यों नहीं किया …?”

” बस … यूँ ही. जब विवाह की अभिलाषा हुयी लगा भावनात्मक जीवन में…मैं तुम्हारी कक्षा में प्रवेश ले चुका था. और वह शिक्षा अब तक पूरी नहीं हुयी”

“ठीक है ठीक है …. अभी स्टूडेंट्स को देखना है.. बर्षों बाद ही सही फ़िर कभी आनलाइन आना होगा ..? ”

” शायद नहीं, बहुत लम्बा अन्तराल हो चुका है. मन्दिर के पार्श्व की सीढियां मुक्तिद्वार से होकर नदी के किनारे बढ़ती हुयी मुख्यधारा से मोक्ष मार्ग तक तो ले जाती हैं परन्तु विज्ञान और बिजली जैसी कोई सुविधा … यहाँ नहीं है “

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “


” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “

” क्या लैपटॉप बाबा बनने का विचार है “

” नहीं नहीं .. वह बेचारा तो राष्ट्रवाद के उन्मुक्त भावना प्रवाह में बहकर सही होकर भी अनुचित दिशा में बह गया. मेरा विचार ऐसा नहीं है. सही विचार को सही मार्ग और दिशा पर चलकर ही वांछित फल प्राप्त करना श्रेयस्कर है अस्तु …. “

” … तुम नहीं सुधरोगे “

” चलती हूँ. इस संवाद को ब्लाग की अपेक्षा हो सकती है. डाल दूँ ?”

” तुम्हारे लौकिक जीवन में मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं रहा जो भी करोगी अच्छा लगेगा “

” ठीक है चलती हूँ अभी… अपना ध्यान रखना और यदि सम्भव हो तो काल करते रहना. वैसे मैं भी फोन करती रहूंगी. … अब लगता है… तुम मेरे जीवन की कक्षा के चिरंतन विद्यार्थी हो … तुमसे दूसरी भेंट सीधे मुक्तिद्वार की सीढ़ियों पर शीघ्र ही होगी.. “

“अर्थात ……!!!”

“यह बताने के लिए कि मैंने तुमसे मात्र एक ही झूठ बोला था कि मैं विवाहित हूँ …”

” ओह गाडऽ …. ! तुम भी … हरिओमऽऽ…. “

वाह रे ! राजनीति की रामलीला….[देश] श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

. वाह रे ! राजनीति की रामलीला…… राम और रावण भीड़तंत्र के थियेटर में भरत मिलाप का दृश्य अभिनीत कर रहे हैं. ऐसे में बेचारे भरत पादुकाएँ लेकर अयोध्या के स्थान नागपुर से दहाड़ रहे हैं. देश के गाँव गाँव और खेत खलिहान तक फैले चुनावी थियेटर की दर्शक दीर्घा में वोट का टिकट जेब में डाले जनता रामकथा का यह परिदृश्य देख कर अपने सिर के बाल नोचने पर विवश है. विश्वसनीयता…….किस पर और कैसी? शिकायत किससे …? बस ठेठ अवधी में कह रही है  

“…. का यही रामलीला दिखावे क हमका भीड़तंत्र का टिकट दिए रहहु बाबा … ! अब का करी … सरजू मैया के पुल पर नुची मुरगी के पंखन क तरह फैला जूता चप्पल औ बोरीन माँ घसीटी जात लाशन के संग अजुध्या के नालीं म बहत खून….. ओहि के बाद बंबई के धमाका और बाद का तांडव ….. भुलाये ना भुलावा जाति है. अब वोटन क खातिर सबै सुथरे हुई गए हैं. जय हो सीता मैया के…सबका बेवकूफ समझ रहे हैं ….”  

. आम ग्रामीण से लेकर संभ्रांत शहरी तक .. यह बेमेल विवाह देखने को अभिशप्त हैं. संभवतः सत्ता सुन्दरी का वरण करने के लिए सब जायज है ……. जय हो ….. कल्याण हो इस देश का.