मुक्तिद्वार की सीढियां …[कहानी] श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

“हेलो “


” हेलो… आज इतने दिनों बाद “

” हाँ आज तुम्हारा स्मरण बहुत आवेग के साथ कर रहा था “

” सच पूछो तो मैं भी कल से ….”
” क्लासेस …? डिस्टर्ब तो नहीं ….. “

” नहीं .. नहीं … अभी फ्री हूँ. स्टूडेंट्स एनुअल फंक्शन की रिहर्सल में बिजी हैं . इतने दिनों बाद कम से कम आधा घंटा तो हम बात कर ही सकते हैं. वैसे भी तुम बात करने में बहुत कंजूस हो “

” … सच पूछो कल से बहुत ही अन्यमनस्क अनुभव कर रहा था”
” फिर इतना बिलम्ब कैसे ..? कल ही क्यों नहीं काल किया. तबियत ठीक है ना.. तुम भी .. “


” नहीं नहीं .. ऐसा कुछ नहीं. बस पिछले कुछ दिनों बहुत अकेला सा अनुभव किया. जीवन की आपाधापी भरी तंग गलियों से जब भी गुजरा.. हरबार संभवतः उसी मोड़ पर पहुँच गया जहाँ पर कई बार अपनी परछाई तलाश करने लगता हूँ … मेरा स्वभाव तुम्हें पता ही है “

” वैसे मैं भी इस बार तुमसे बहुत नाराज़ हूँ … शायद थी अब नहीं. सोचा इस बार कोई फोन नहीं करूंगी… बहुत स्वार्थी हो गए हो …. बस नाम… नाम और काम. शायद मेरा अस्तित्व अब कहीं नहीं. इन दिनों तुम्हारे बारे में बहुत सोचा. जब भी याद किया… बस यही तय किया कि जब तक तुम्हारा काल नहीं आएगा, फोन नहीं करूंगी “

” थैंक्स… पता नहीं इसे क्या कहें जब भी मुझे या तुम्हें, दूसरे की तीव्र अनुभूति होती है, अगले की काल अपने आप ही आ जाती है “

” तो स्वयं की परछाई मिली ……”

” … संभवतः एक नाम …. एक सुखद सा अहसास … जब मन में थोड़ा झाँका और पास गया ..पहचाना … यह तो तुम्हारा ही चेहरा था…..”

” ऐसा कैसे होता है …. ? “


” कैसा …!!! “

” हम दोनों जीवन में अब तक मात्र एक बार मिले हैं और वह भी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में. निजी जीवन में अपने अलग अलग क्षेत्रों में व्यस्त होने के बाद भी लगता है कि युगों से एक साथ ही चल रहे हैं. है ना यह आश्चर्यजनक ? “

” हाँ यह है तो … शायद ही कोई हमारी बात पर विश्वास कर सके ….. “

” किंतु हम जानते हैं कि यही सत्य है .. उस एक बार की हमारी संक्षिप्त सी भेंट और औपचारिक हाथ मिलाने का स्पर्श … लगता है जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है. जीता जा रहा हूँ तब से….. अब तक का लंबा अंतराल कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला “

” तुम्हारी सारी बातें मुझे अब तक याद हैं. एक दिन तुमने कहा था ‘मुझे लगता है कि हमारे मानवीय जीवन की डगर का कोई ऐसा आयाम भी है जो सर्द रात्रि में भावना की गरमी और जीवन के जटिल संघषों की तपिश में एक घनेरी छाँव बनकर आकारहीन और आधारहीन होते हुए भी एक स्वरुप बनकर हमारे साथ हो लेता है ’ “

” ….. सच में जब भी थकता हूँ … खोजता हूँ स्वयं को … अंतस में तुम्हारा चेहरा उभरने लगता है. “

” .. हूँम्मऽ.. बस कहते रहो …. मन का सारा प्रस्तार बाहर आने दो “

“तुमने अपने बारे में आज तक मात्र एक बार इतना ही बताया कि तुम विवाहित हो. आगे तुम्हारी अनिच्छा के कारण मैंने अब तक तुम्हारे बारे में कुछ भी जानने की चेष्टा नहीं की. किंतु आज बताना चाहता हूँ कि जब भी अपना अस्तित्व तलाश करने का प्रयास करता हूँ.. अंतस में बस तुम्हारा ही स्मरण आता है और मैं ध्येय कामना विहीन निराबोध शिशु सा तुम्हारी ओर निहारने लगता हूँ “

“… हा हा… तुम इतने निराबोध हो …? “

” इसका उत्तर तो तुम ही दे सकती हो, स्वयं को और मुझे भी. फिर भी संभवतः सर्वज्ञ होने का हमारा दंभ ही हमें बहुत बेचैन करता रहता है. यही कारण है कि तुम्हारे सान्निध्य में एक निराबोध शिशु सा होकर मैं बहुत ही सहज अनुभव करता हूँ………”

” रहने भी दो…आनलाइन ही सही किन्तु वर्षों से तुम्हें जानती हूँ, लगता है चाटुकारिता के विद्यालय में पहली बार प्रवेश लिया है. यह तुम्हारे वश की बात नहीं. तुम जैसे हो वैसे ही अच्छे लगते हो … “

” नहीं ….ऐसा नहीं है. कह लेने दो मुझे.. आज जो अनुभव हो रहा है वही तुमसे कहा …. ”

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “

” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “



” हूँम्मऽ…. आज सोचती हूँ कि साइबर संपर्कों में गाम्भीर्य का नितांत अभाव और शाब्दिक नग्नता से आहत जब मैंने यह तय किया था कि तुम्हारे जैसे गंभीर रचनाकार की नेट पर वास्तविकता को परख कर ही रहूंगी तो यह कभी नहीं सोचा था कि तुम नेट पर भी संन्यासी जैसी बातें ही करोगे. राष्ट्रप्रेम, दर्शन .. अध्यात्म और यही सब दुरूह बातें.साईबर वर्ल्ड में तुम्हें दूसरों से भिन्न पाकर आरम्भ में आश्चर्यचकित थी…. अन्यथा मैंने बड़े बड़ों को दो या तीन बार आनलाइन होते ही उनकी औकात पर आते हुए देखा था. सोचती थी कि तुम भी देर सवेर वैसे ही निकालोगे किंतु ऐसा न हुआ “

“छोडो वह सब … हमें पता है कि हमारे जीवन अपने अपने मार्ग पर सहज ढंग से चल रहे हैं. आगे भी इसी प्रकार चलते रहेंगे. कदाचित यह समय समय पर पारस्परिक भावनात्मक निर्भरता हमें बांधे हुए है.इसकी अनुभूति संसार की सभी परिभाषाओं से परे होकर भी अप्रतिम है. क्या है यह …? “

” मैं नहीं जानती … इस बात का उत्तर भी बहुधा तुमने स्वयं ही दिया है. तुम्हारे शब्द ही दोहरा रही हूँ …. यह जीवन की एकाकी नीरसता को भंग करते हुए वय के उत्तरार्ध की, हमारे मन की नैसर्गिक खोजी प्रवृत्ति ही है…. यह शारीरिक आकर्षण न होकर … विशुध्द बौद्धिक और भावनात्मक आवश्यकता है जो जीवन के नीरस ठहराव, स्थायित्व और उससे उपजी जड़ता को चैतन्य प्रदान करने लगती है … उससे लड़ने के लिए वय के ढलाव के प्रतिकूल उसमें ऊर्जा भरती है….. तुमने ही तो इसे परिभाषित किया है कई बार.. फिर …? “

” कहो तुम्हारे मुंह से सुनना अच्छा लगता है… “


” तुमने आज तक विवाह क्यों नहीं किया …?”

” बस … यूँ ही. जब विवाह की अभिलाषा हुयी लगा भावनात्मक जीवन में…मैं तुम्हारी कक्षा में प्रवेश ले चुका था. और वह शिक्षा अब तक पूरी नहीं हुयी”

“ठीक है ठीक है …. अभी स्टूडेंट्स को देखना है.. बर्षों बाद ही सही फ़िर कभी आनलाइन आना होगा ..? ”

” शायद नहीं, बहुत लम्बा अन्तराल हो चुका है. मन्दिर के पार्श्व की सीढियां मुक्तिद्वार से होकर नदी के किनारे बढ़ती हुयी मुख्यधारा से मोक्ष मार्ग तक तो ले जाती हैं परन्तु विज्ञान और बिजली जैसी कोई सुविधा … यहाँ नहीं है “

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “


” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “

” क्या लैपटॉप बाबा बनने का विचार है “

” नहीं नहीं .. वह बेचारा तो राष्ट्रवाद के उन्मुक्त भावना प्रवाह में बहकर सही होकर भी अनुचित दिशा में बह गया. मेरा विचार ऐसा नहीं है. सही विचार को सही मार्ग और दिशा पर चलकर ही वांछित फल प्राप्त करना श्रेयस्कर है अस्तु …. “

” … तुम नहीं सुधरोगे “

” चलती हूँ. इस संवाद को ब्लाग की अपेक्षा हो सकती है. डाल दूँ ?”

” तुम्हारे लौकिक जीवन में मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं रहा जो भी करोगी अच्छा लगेगा “

” ठीक है चलती हूँ अभी… अपना ध्यान रखना और यदि सम्भव हो तो काल करते रहना. वैसे मैं भी फोन करती रहूंगी. … अब लगता है… तुम मेरे जीवन की कक्षा के चिरंतन विद्यार्थी हो … तुमसे दूसरी भेंट सीधे मुक्तिद्वार की सीढ़ियों पर शीघ्र ही होगी.. “

“अर्थात ……!!!”

“यह बताने के लिए कि मैंने तुमसे मात्र एक ही झूठ बोला था कि मैं विवाहित हूँ …”

” ओह गाडऽ …. ! तुम भी … हरिओमऽऽ…. “

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Mired Mirage
    फरवरी 17, 2009 @ 11:58:00

    बहुत अच्छी ! परन्तु अन्तिम पंक्तियों के बिना भी सही रहती।घुघूती बासूती

    प्रतिक्रिया

  2. शोभा
    फरवरी 28, 2009 @ 12:16:00

    कहानी मुझे भी बहुत अच्छी लगी और मैं भी मानती हूँ कि अन्त कुछ और भी हो सकता था।

    प्रतिक्रिया

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