ब्राह्मणों की बौद्धिक पराजय और वेंटिलेटर पर जिन्दा हिन्दू समाज [आलेख] शिवेंद्र कुमार मिश्र

[वसन्तपंचमी से हिन्दू समाज में……..क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुपहिन्दू तालिबानी‘ तो पैदा नहीं कर रहेजो समाज निरन्तर आत्ममंथन और चिन्तन नहीं करता वह समाज वेन्टीलेटर‘ पर जिन्दा रहता है और एक जीवित समाज के सभी लक्षण खो देता हैतो यह सोचना भी प्रासंगिक होगा कि क्या हम जीवित समाज कहलाने के लायक हैं या नहीं.]

.       आइये स्वागत करें ऋतुराज बसन्त का बसन्त का आगमन ऋतु परिवर्तन का कारक तो है ही इसके साथ ही मन के भाव परिवर्तन का कारक भी है. बसन्त के आगमन के साथ ही खेतों में पीली चूनर ओढ़े प्रकृति नायिका यौवन श्रृंगार कर नाचने लगती है. वृक्षों पर नए नए पत्ते आ जाते हैं मानों जवान होते युवक के चेहरे पर मूछें निकलने लगी हों. हर ओर छा जाती है मादकतामचलने लगता है मनमयूरसंगिनी संग नत्य को….. और नायिकाएं मनभावन पिया की बाहों में मचलने को पागल होने लगती हैं.  क्या सुखद आश्चर्य है कि पाश्चात्यों का वेलेन्टाइन डेभी इसी समय पर पड़ता है.

 प्रश्न  यह भी है कि क्या व्यक्ति की निजता का कोई मूल्य हिन्दू समाज ओर राज्यके लिए है?  उसका कोई मूल्य है?  क्या हमारा संविधान जो व्यक्ति की स्वंतत्रता का उदघोष करता है उसके सरंक्षक अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान हैं? हिन्दू समाज के मनीषियों को यह भी तय करना होगा कि युवा स्त्री को वरचयन काअधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं. क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुप हिन्दू तालिबानीतो पैदा नहीं कर रहे.

वसंतोत्सव के दो रुप भारतीय हिन्दू समाज में प्रचलित हुए. एक वह रूप जो हमारे ब्राह्मणवादी  समाज होने की आलोचना से जुड़ा है. अर्थात अधिक नैतिक और अधिक कर्मकाण्डी होना. वसंतोत्सव में इसका रूप देवी सरस्वती के पूजन से जुड़ा है. माघशुक्ल पंचमी अर्थात बसन्तपंचमी, सरस्वती पूजन और उपनयन संस्कार के लिए शुभ मान जात है। वसन्तेब्राम्हणमुपनयेतयह तथाकथित अतिशय नैतिकतावादी आचरण मानवीय स्वाभाविकता, उसकी उत्सवप्रियता शरीर की स्वाभाविक भूखआहारनिद्राभयमैथुनानिआदि के मूल्य पर समाज को परोसा जाने लगा. इसने न केवल व्यक्ति की निजता का हरण कर लिया अपितु समाज की स्वाभाविक गति पर भी विराम लगा दिया जो आज तक बाधा का काम कर रहा है.  संभवत: समाज को अतिशय नैतिक और कर्मकाण्डी बनाने का दिशाबोध ब्राम्हणों के अपने बौद्धिक पतन और आत्मसम्मान खो जाने के मनोभय से उत्पन्न हुआ होगा. कहना कठिन है कि यह हीनग्रन्थि किस समय से ब्राम्हण वर्ग में उत्पन्न हुई होगी.  यद्यपि यह ऐतिहासिक शोध का बिषय है तथापि संभव है यह 600 ईषा पूर्व में समाज में जो उथल पुथल हो रही थी. जिसमें महात्मा बुद्ध और महावीर जैन जैसे समाज सुधारक दार्शनिकों ने अपना योगदान दिया और समाज में ठहराव और विभ्रम की स्थिति को दूर करने का प्रयत्न किया. उस समय की स्थितियों मे संभव है ब्राहमणों ने अपनी आत्मरक्षा के लिए कर्मकाण्ड को अधिक प्रेरित किया होगा और जैनियों तथा बौद्धों से तुलना करते हुए समाज को अधिकाधिक नैतिकता की ओर झोंकना प्रारम्भ कर दिया होगा. इसकी पुष्टि पातंजलिकृत संस्कृत व्याकरण ग्रंथ महाभाष्यमें मूर्तिऔर मूर्तिकारशब्दों के प्रयोग से होती है. पतंजलि को पुष्यमित्र सुंग का समकालिक माना जाता हैं. पुष्यमित्र का काल 100 बी सी मान्य है। भारतीय हिन्दू समाज में यदि मन्दिर निर्माण कला को तिथिबद्ध किया जाए तो गुप्तकाल से यह कुशलता समाज मे और प्रतिष्ठा पाने लगी. इतिहास में गुप्त शासकों का काल 319 बी सी 585 बी सी माना जाता है। जाता है. 11वीं और 12वीं सदी मूर्ति और मन्दिर निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. उत्तरप्रदेश के जनपद कानपुर के निकट भीतर गांव नामक स्थान पर स्थित मन्दिर गुप्तकालीन माना जाता है. यह मन्दिर हमारी मन्दिर निर्माण कला का प्रारम्भिक नमूना माना जा सकता है.

अधिक विषयान्तर में न जाकर यह कहना चाहूँगा कि ईषा पूर्व प्रथम सदी ने ब्राह्मणों के बौद्दिक पलायन के कारण मूर्ति पूजा के बीज डाले जो १२वीं सदी तक वटवृक्ष बन गए. हिन्दी भक्तिकाल का युग अर्थात 16वीं 17वीं सदी ने मन्दिरों की मूर्तियों को विघ्नविनाशक मंगलकारक मोक्षप्रदायक सर्वमंगलमांगल्येबना दिया.  धीरे धीरे यह गुण पशु पक्षियों पर्वतों नदियों यहॉ तक कि यह सरलीकरण त्योहारों कथाओं व्रतों उपवासों कहॉ तक कहूँहरि अनन्त हरि कथा अनन्ताकी भॉति सर्वत्र व्याप्त हो गया। ब्राह्मणों की बौद्धिक पराजय ने हिन्दू समाज को धर्मभीरु कायर नपुंसक बना दिया। गोस्वामी तुलसीदास के राम और उनकी रामकथा ने समाज को अतिशय नैतिक बनने का दिशा बोध दिया जो व्यवहार शून्य और एक हद तक असामाजिक था. कृष्ण भक्तों और उनके आन्दोलन ने समाज का धार्मिक कार्य नाचने गाने तक सीमित कर दिया. हिन्दू समाज महान नैतिक किन्तु व्यवहारिक और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत दिशाबोध से वचिंत कर दिया गया. जब समाज इतने भयंकर उथल पुथलसे गुजर रहा था और गुजर रहा है तो भला बसन्त और उसके आगमन पर मनाए जाने बाले उत्सवों की क्या बिसात जो इससे बच जाते. अस्तु! वसंतोत्सव का कामोद्दीपक और रागोद्दीपक उत्सव भी ब्राह्मणों की कर्मकाण्डी नजरों की भेंट चढ़ गया.  अब वसंतोत्सव मात्र पाटी पूजन उपनयन संस्कार शिक्षा प्रारम्भ करने की तिथि मात्र बन कर रह गया.

मनुष्य सदा से उत्सवधर्मी रहा है.. स्त्री पुरुषों का साथ साथ उठना बैठना नाचना गाना यह स्भाविकता है. आकर्षण प्रकृति का धर्म है. हमारे वैदिक ऋषियों ने इसे पहचाना भी और इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को व्यक्ति और समाज दोनो के ही हित में मूल्यांकित किया. डॉ राधाकुमुद मुखर्जी ने अपनी पुस्तक हिन्दू सभ्यता मेंबताया है कि ऋग्वैदिक काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों ही झांझ मजीरों और अन्य वाद्यों के साथ नृत्य में साथ साथ भाग लेते थे आघाटि10/146/2′. वात्सायन ने कामसूत्र में घटानिबन्धानिशब्द का प्रयोग किया है ब्याख्याकारों ने जिसका अर्थ विभिन्न उत्सवों में देवस्थान पर जाकर सामूहिक नृत्य गान आदि के आयोजन में भाग लेना माना है. कामसूत्र में जिन उत्सवों की चर्चा की गयी है उनमें वसंतोत्सव भी शामिल है. यक्षरात्रि: कौमुदी जागर: सुवसन्तक:। वात्सायन वसन्त्ऋतु के उत्सव पर स्त्री पुरुषों द्बारा सामूहिक रुप से खेले जाने वाले खेलों का भी उल्लेख करतै हैं। सहकारभज्जिंका अष्यूषखादिका बिसखादिका नवपात्रिका उदकक्ष्वेडिका पांचालानुयानम एकषाल्मली कदम्बयुध्दानि तास्ताश्च माहिमान्यो देश्याश्च क्रीडाजनेभ्यो विशिष्टमाचारेयु: इति संभूयक्रीडा।

इन उदाहरणों का उद्देश्य तथ्यपूर्ण ढंग से यह सिद्ध करना है कि भारत और हिन्दू समाज में स्त्री पुरुषों के साथ साथ संव्यवहार करने की परम्परा वेदकाल तक प्राचीन है. यह तो स्वत: स्पष्ट ही है कि ऐसे आयोजनों में युवा स्त्री और पुरुष ही अधिकाधिक संख्या में भाग लेते थे. आज भी ऐसे आयोजनों में युवक युवतियों की संख्या ही ज्यादा रहती है. वेलेन्टाइन डेके प्रेमयुगल और होली की मस्ती में किसी कामिनी के गोरे गालों पर रंग लगाने को आतुर युवक की व्याकुलता सब कुछ बयॉ कर देती है. होली की मस्ती में ऐसी कौन युवती होगी जो अपने प्रियतम की बाहो में सिमटकर होली के रंगों में सराबोर न होना चाहे।ऐसा कौन प्रौढ और वृद्ध होता है जो होली में बहकना नही चाहता. लोकगीत सबके मस्त हो जाने के भाव से भरे हैं होली में बाबा देवर लागें होली में‘ . आश्चर्य है कि ऐसी रंग भरी मस्ती भरी संस्कृति के तथाकथित आधुनिक रक्षक वेलेन्टाइन जोडों को अपमानित करके संस्कृतिरक्षा का गौरव अनुभव करते हैं और इन संस्कृतिपशुओं को मानवों के संसार से डंडे मारकर खदेड़ने वाला कोई नहीं

एक अन्तिम तथ्य और प्रस्तुत करते हुए मैं अपनी बात समाप्ति की ओर ले जाउंगा. ऋतुराज वसन्त के आगमन का प्रथम दिवस वसन्तपंचमी है और होलिकोत्सव का प्रारम्भ भी वसन्तपंचमी से ही होता है. इस दिन प्रथम बार गुलाल उड़ाई जाती है जिसका अन्त फाल्गुनपूर्णिमा को होता है. रास के रचैया भगवान श्री कृष्ण हालिकोत्सव के अधिदेवता हैं चरकसंहिता में लिखा है कि वसन्तऋतु में स्त्री रमण तथा वनविहार करना चाहिए.कामदेव वसन्त के अनन्य सहचर हैं. अतएव कामदेव और देवी रति की पूजा भी इस तिथि को की जाती है. वसन्तपंचमी से हिन्दू समाज में विवाह कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाते हैं जो होलिकोत्सव के आठ दिन पूर्व होलिकाष्टकतक निरन्तर चलते रहते हैं. लगनका यह सिलसिला होली के पश्चात नवदुर्गा से ही प्रारम्भ होता है. मुझे समझ में नहीं आता कि प्रेम, काम, राग, आकर्षण एवं स्त्री पुरुष के सम्मिलन की इतनी सशक्त वैज्ञानिक और दृढ सांस्कृतिक परम्परा होते हुए भी कोई जीवित समाज कतिपय हुड़दंगियों और उदण्ड सैनिकों को यह तय करने का अधिकार कैसे दे सकता है कि किस युवा स्त्री को किस पुरुष के साथ संबन्ध रखना चाहिए. किसकोकिसके साथ घूमना चाहिए. प्रश्न यह भी है कि क्या व्यक्ति की निजता का कोई मूल्य हिन्दू समाज ओर राज्यके लिए है?  उसका कोई  मूल्य है?  क्या हमारा संविधान जो व्यक्ति की स्वंतत्रता का उदघोष करता है उसके सरंक्षक अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान हैं? हिन्दू समाज के मनीषियों को यह भी तय करना होगा कि युवा स्त्री को वरचयन काअधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं. क्या हम उग्र इस्लामी समाज की प्रतिक्रिया स्वरुप हिन्दू तालिबानीतो पैदा नहीं कर रहे. जो समाज निरन्तर आत्ममंथन और चिन्तन नहीं करता वह समाज वेन्टीलेटरपर जिन्दा रहता है और एक जीवित समाज के सभी लक्षण खो देता है. तो यह सोचना भी प्रासंगिक होगा कि क्या हम जीवित समाज कहलाने के लायक हैं या नहीं.

इति समाप्तम्

शिवेंद्र कुमार मिश्र

आशुतोष सिटी,

बरेली ( उ. प्र.)

 

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9 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. उपाध्यायजी(Upadhyayjee)
    फरवरी 25, 2009 @ 17:24:00

    बड़ा ही सुन्दर शब्दों का प्रयोग एवं तथ्यों को दर्शाते हुए आपने हिन्दू समाज में उपस्थित बहुत सारे रस्मो एवं रिवाजो के बारे में बताया! लेकिन पता नहीं क्यों आप इस लेख में बहुत क्रोधित एवं ब्राह्मणों को लताड़ते नजर आये | खैर आपने बहुत पुराणी घटनावों एवं उसका हिन्दू समाज एवं रस्मो पर प्रभाव दिखाया | ११ वीं शताब्दी से लेकर १९ वीं शताब्दी तक क्या हुआ? उसका प्रभाव हिन्दू समाज पर कितना पड़ा? क्या हिन्दू समाज स्वतः ऐसा हो गया या इन ८००-९०० साल का जो प्रभाव था उसके कारन ऐसा हुआ? क्या समाज में लड़कियों के वर चुनने पर रोक है? आज समाज बदल गया है | जैसे जैसे लोग जागरूक हो रहे हैं वैसे वैसे arrange मैरिज़ लव मैरिज़ या देख परख कर मैरिज़ हो रहा है | मुझे नहीं लगता की हिन्दू समाज का कोई ठीकेदार ऐसा करने से रोक रहा है | आप नाहक ही सुन्दर लेख को गलत समापन से गड़बड़ कर दिए |रही बात प्रेम को दर्शाने के तौर तरीको का तो समाज में उसपर अभी बहुत उथल पुथल चल रही है | कोई पब में बियर के साथ दर्शाना छह रहा है तो किसी को पब में पसंद नहीं है | कोई गुलाब का फूल लेकर पार्क या दूकान में दर्शाना चाह रहा है तो कुछ कह रहे हैं की इसको घर में करो | अब आप इसको संस्कृति से जोड़ रहे हैं तो इसके फायदे भी बताएं | कैसे हमारी संस्कृति समृद्ध हो जायेगी बियर के मग के साथ चीर्स के साथ प्यार दर्शाने से ? मैं भी सहमत हूँ की किसी को रोकना नहीं चाहिए लेकिन क्या हम इसको बढ़ावा दे सकते हैं? क्या ये ऐसी संस्कृति है की हम इसे बढ़ावा दें ?

    प्रतिक्रिया

  2. इष्ट देव सांकृत्यायन
    फरवरी 25, 2009 @ 18:49:00

    बहुत उम्दा विश्लेषण आप कर रहे हैं और यह विषय आपसे अधिक विषयी होने यानी के विशद विश्लेषण की मांग कर रहा है. इतने पर ठहरें नहीं, इसे विस्तार से पूरे तर्कों और प्रमाणों के साथ.

    प्रतिक्रिया

  3. Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"
    फरवरी 26, 2009 @ 06:46:00

    आपने बहुत ही सुन्दर तरीके से भारतीय दर्शन को तथ्यों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जिसमे आप आफी हद तक सफल भी रहे हैं,किन्तु मुझे कहीं कहीं आप किन्ही पूर्व‌ाग्रहों से ग्रसित दिखाई दिए। लेख के अधिकतम भाग में आप ब्राहमणों को लताडते हुए ही नजर आए। एक जगह आपने लिखा है कि “ईषा पूर्व प्रथम सदी ने ब्राह्मणों के बौद्दिक पलायन के कारण मूर्ति पूजा के बीज डाले”एक ग्रीक दार्शनिक ने कहा है कि यदि कुत्ते, गधे और ऊँट भी चित्र बना सकते तो उनके ईश्वर की आकृति भी उन्हीं की तरह होती। यानी अपने अपने मनोजगत् के आधार पर ही धर्म की आकृति स्वरूप लेती है। आप उसे मूर्ति कह लें या कोई विशेष आकृति। यदि हम किसी विशेष दिशा की ओर मुँह करके पूजा करते हैं या ईंट-पत्थर को जोड कर किसी पवित्र स्थल का निर्माण करते हैं जहाँ कुछ देर के लिए जाकर हम उस एक परम सत्ता का ध्यान कर सकें, अपने को जोड सकें उससे तो यह कृत्य भी उस निराकार विराट् सत्य को एक साकार रूप में सीमित करने की प्रक्रिया है। हम बीस बाई बीस के एक वायवी अंश में उसके अस्तित्व को महसूस करने के लिए ही ईंट गारे की दीवार और छत खडी करते हैं। कोई उसमें देव मूर्ति स्थापित करता है तो कोई अपने धर्म प्रवर्तक की प्रतिमा। अपनी भावनाएँ उसके प्रति समर्पित करने के लिए हम अपनी मनोवृत्ति के अनुसार ही उसे दीप, मोमबत्ती, माला पुष्प या खाता-अर्पण करते हैं। उसके उपदेशों का पाठ करना या उसकी स्तुति में आत्म निवेदन के द्वारा हम एक सम्बन्ध स्थापित करते हैं उससे। उसे सीमा में बाँधना हमारी विवशता है, मूर्खता नहीं। हम विराट् रूप को सीमित ज्ञानेन्दि्रय से अनुभव नहीं कर सकते इसलिए उसके प्रति एकाग्रता भी नहीं हो सकती। परिणाम – उच्छृंखलता, विचलन और आत्म-प्रवचंना। स्वयं एक मात्र उस सत्य को भी यदि उपने स्वरूप से ही सन्तोष हो जाता तो वह अपने अनगिन अंशावतार इस सृष्टि में न उत्पन्न करता। यह पूरा ब्रह्माण्ड उसके ही स्वरूप की भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। एक पिता यदि उपने ही अस्तित्व से सन्तुष्ट हो रहता तो वह अपनी वंशावलि के लिए चिन्तित न होता। पुत्र की कामना स्त्री-पुरुषों के भीतर से समाप्त हो जाती। लेकिन ऐसा नहीं है। हर व्यक्ति अपनी अगली पीढी को अविच्छित्र देखना चाहता है। शास्त्र भी कहते हैं कि यह सृष्टि भाव-संकल्पिता है। चराचर सृष्टि की उत्पत्ति हुई। यानी यह दिखाई देने वाली सृष्टि उसी एक सत्ता की कल्पना की अभिव्यक्ति है। अब इसे सम्पूर्णता में देख पाना या समझ पाना मनुष्य के लिए कठिन है। इसलिए वह उसका आकार अपनी कल्पना के अनुसार सीमित करता है और तब उसका ध्यान, मनन या उपासना करता है। यही है मूर्ति पूजा।

    प्रतिक्रिया

  4. Abhishek
    फरवरी 26, 2009 @ 07:38:00

    भारत की मूल प्रकृति-पूजक जनता को कर्मकांडों और धर्मों की बेडियों में बाँधने के प्रयास आज भी जारी हैं.

    प्रतिक्रिया

  5. Sanjay Sharma
    फरवरी 26, 2009 @ 08:14:00

    ब्राह्मणों की बौद्धिक पराजय संभव ही नहीं .ब्राह्मण की परिभाषा पर एक बार और गौर करने की आवश्यकता है .व्यापक अपेक्षा गूढ़ अर्थ के बिना बेकार है .ब्रह्मनत्व कभी ख़त्म नहीं होगा ,वेंटिलेटर पर सोया हिन्दू कभी ख़त्म नहीं होगा ये तो दिनोदिन सब में समाहित होता जा रहा है .

    प्रतिक्रिया

  6. Sanjay Sharma
    फरवरी 26, 2009 @ 08:15:00

    यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

    प्रतिक्रिया

  7. Suresh Chiplunkar
    फरवरी 26, 2009 @ 11:38:00

    आपका ब्राह्मणों के प्रति दुराग्रह / पूर्वाग्रह स्पष्ट दिखाई दे रहा है… जैसा कि उपाध्याय जी ने कहा कि समाज के तमाम बन्धन खोल देने के फ़ायदे भी बताये जायें। यदि शराब/बीयर की तरह, सेक्स, वेश्यागमन, दो-चार पत्नियाँ रखना आदि कानूनन वैध बना दिया जाये तो समाज को इससे कितना और क्या फ़ायदा होगा यह स्पष्ट करें… गुजरात में शराबबन्दी लागू है, इससे समाज को क्या-क्या नुकसान हुए हैं यह भी स्पष्ट करने का कष्ट करें…

    प्रतिक्रिया

  8. Anonymous
    फरवरी 27, 2009 @ 15:52:00

    सुधी पाठको आपकी स्नेहमिश्रित टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. आपके शब्दों में आक्रोश भी दिखा और प्रेरणा भी . आप में से एक मित्र ने मुझे ब्राह्मणों के प्रति पूर्वाग्रहग्रसित माना तो किसी ने कहा की आप ब्राह्मणों को लताड़ रहे हैं. एक अन्य मित्र मुझे मूर्ति पूजा के विरोधी मानते नजर आये. अस्तु ना तो मैं मूर्ति पूजा का विरोधी हूँ ना ही ब्राह्मण विरोधी. यह संदर्भित आलेख से स्वयम ही स्पष्ट है हाँ मेरा जो भी आशय है वह आलेख के प्रसंग में ही है . आपने बार और पब आदि के विषय चर्चा भी की उसके सन्दर्भ में मेरा विनम्र निवेदन है की आप इसी ब्लॉग पर मेरा आलेख मैं कडुवा हो गया हूँ अवश्य पढें और अपने विचारों से मुझे अवश्य उपकृत करें. आप सभी सुधी सज्जनों के अन्य प्रश्नों के समेकित उत्तर मेरे आगामी लेख के माध्यम से आप सब के सन्मुख शीघ्र ही होगे. तब तक स्नेह बनाये रखें …… जय राम जी की साभार् शिवेंद्र कुमार मिश्र

    प्रतिक्रिया

  9. शोभा
    फरवरी 28, 2009 @ 12:15:00

    बहुत ही प्रभावी भाषा में तथ्यों का उल्लेख किया गया है। मुझे अलंकृत भाषा ने बहुत प्रभावित किया। लेखक को बधाई।

    प्रतिक्रिया

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