क्षितिज के पार तो नवकल्पना है [कविता] … शिवेंद्र कुमार मिश्र


मैं देखना चाहता हूँ क्षितिज के पार  

कुहासा ढक लेता है आखों की रोशनी  
चाहता है तोड़ दें स्वप्न उगने की कल्पना  
मैं आक्रोश से मूँद लेता हूँ आँख की पुतलियां  
देखने को क्षितिज के पार का अदभुत विहान  
कुहासा घना और घना हो जाता हैं  
क्षितिज के पार का द्रश्य  
मानो अन्दर का आवेग फिर भरता है उफान  
दे मर जाता है  
पर कहॉ मानता है हठी मन  
कहता है उठ ! अजेय अर्जुन !!  
क्षितिज के पार तो नवकल्पना है  
जीवन के रंगों की अनोखी अल्पना है  
उसे देखने को न चाहिए नयन  
वहॉ तक तो पहुचता है बलिष्ठ मन  
देख जरा नजर उठाकर तो देख  
नही दीखता तुझे मैं तो साफ देखता हूँ  
क्षितिज के नीलाभ आकाश में  
अरुणोदय का रक्तिम प्रकाश देखता हूँ  
गंगा की धूल से उठता हवा का ववंडर  
ढक लेता है आकाश का वज्र हृदयतल  
फूट निकलती है उससे गंगा की धारा  
अविकल निश्छल निर्मल पावन 
जल रक्तवर्णा धारित्री कर रही है स्नान
भूमि लुठिंत देह करती नव जल में अवगाहन
धुल गए हैं कर्म के अनन्त हतघाव,अब क्या 
अब तो नवदेह में देखेगें जीवन का नवप्रभाव 
देखो हुआ जा रहा अरुणोदय आकाश 
आ गयी नवउषा भी लेकर नया विश्वास 
प्रेमवर्णी चूनर में वधू है उमंगित प्रफुल्लवदना 
दूर गूंज रहा वेदस्वर अविचलित सुमना 
मंत्रोच्चार घ्वनियों से गूंजते आकाश 
फैल रहा शनै: शनै: प्रात: का प्रकाश  
बहुत कुछ गुजर गया निशा प्रहरी के साथ 
फिर भी उतफुल्लित है आज का सुप्रभात 
सड़ता है गलता है मिटना है उसको 
रुदन क्या करता है जाना है जिसको 
आया है जो लेकर के नव नव मंगलगान 
यही अनन्त तपका अदभुत परिणाम 
ले प्रभात! नमस्कार हो क्षितिज पार  
खींच लाया तुमको मेरा मन र्निर्विकार 
आओगे अपना सपना है 
अपना सपना तो अब उनको बुनना है  

‘इति समाप्तम’  
शिवेंद्र कुमार मिश्रा
आशुतोष सिटी (बरेली)
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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Harkirat Haqeer
    मार्च 29, 2009 @ 09:03:00

    मैं देखना चाहता हूँ क्षितिज के पार कुहासा ढक लेता है आखों की रोशनी चाहता है तोड़ दें स्वप्न उगने की कल्पना मैं आक्रोश से मूँद लेता हूँ आँख की पुतलियां देखने को क्षितिज के पार का अदभुत विहान कुहासा घना और घना हो जाता हैं क्षितिज के पार का द्रश्य मानो अन्दर का आवेग फिर भरता है उफान दे मर जाता है शिवेंद्र कुमार मिश्र को पहली बार पढ़ा …अच्छी लगीं उनकी ये पक्तियां …!!

    प्रतिक्रिया

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