सुख और स्वतंत्रता …… [कविता – दर्शन] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

सुख और स्वतंत्रता


स्मरणीय है जीवन यदि हो


निरभ्र आकाश सा


बदली हो या चमकती धूप


छटती है क्योंकि छटनी है


रह जाता है नीलाम्बर का एहसास


व्यापक अनन्त सीमातीत


क्या सीमाहीनता सुख है?


हाँ तो क्यों बॅधता है इन्सान


सीमाओं के अनन्त जाल में


परिवार समाज राष्ट्र विश्व


सीमाएं ही तो है


पर सीमाहीन होना भी


क्या है ?


 


सुख ?


एक पक्षी उड़ता जाता है


उड़ता जाता है दूर बहुत दूर


कोई मंजिल नहीं न कोई मकां


थक गया तो रुक गया वहाँ


वहीं रात हुई आसमाँ तले


खुल गयी जो ऑख तो


सुबह हुई नाचती नर्तकी सी


न खुली तो हो गया अवसान


नर्तकी के नृत्य जैसा


थम गयी आवाज बजते


घुंघरुओं की


लाख गंगा पिण्ड तारे ग्रह उपग्रह


में हुआ उन्मुक्त सा वह घूमता है


और सचराचर जगत का वह नियन्ता


उसकी भी नियति को देखता है


और यह परमाणु जो है नामहीना


और सीमाजाल से है मुक्त जैसा


कोटि वर्षों की भी यात्रा को


एक पल में पूर्ण कर लेता अभी सा


और यह उन्मुक्तता स्वतंत्रता


सीमा से परे जाने की स्वच्छन्दता


सुख है क्या ?


उस रचियता की अनूठी स्रस्टियां


इस अखिल ब्रहमाण्ड की बहुमिट्टियां


कोटिश: नक्षत्र चंदा सूर्य तारे


एक पल में द्रष्टिगत उसको ये सारे


किन्तु फिर भी परमाणु स्वतंत्र है क्या ?


 


परमात्मा का अंश अब भी


सुखी है क्या?


गूंजता है नाद सारे


विश्व में जो


इस चराचर जगत की


हर स्रष्टि में जो


शब्द भाषा योगियों का नाद है जो


खोजने को इस प्रकृति का


राग है वा


कौन जाने उस अपरितम


सुख की भाषा


या जो जाने कैसे भाषे


बिना भाषा


सत्य वो है मधुरफल


गूंगे की भाषा


तुम ना जानो हम न जाने


जानने की फिर भी आकांक्षा


और यदि सीमा का बंधन


सुख की भूमि तब


तब तो आदम और हव्वा की कहानी


से ही उपजे इस जगत के सौख्य सारे


और बंधन राष्ट्र घर या विश्व सारे


हम हैं जीते नीति की लाखों विधाएं


और बनाते रास्ते सब द्विधाएं


पाप है पुण्य न्याय हो


अन्याय या फिर


मूल में है प्यास उर्जा


भूख मानों


छोड़कर कुछ चाहता पाना


किसी को


है क्षरण उर्जा का


केवल इसी में


तीर्थ व्रत उपवास फैले


धर्म लाखों


इस अनिश्चय की विधा में


जी रहे हैं


और इसमें जूझते नर नारी लाखों


इस द्विनिश्चय में ही


मानों भटकते हैं


किन्तु इस ऎहिक जगत का


सार इतना


एक नारी और नर का


साथ जितना


बंधनों का जन्म इनसे ही


हुआ है


जगत का हर सौख्य इनने


ही छुआ है


किन्तु इनसे रास्ते निकले


जो आगे


है अनेकों दुख का


वो भार लादे


प्यार ईर्ष्या घ्रणा और


अवसाद मानों 


विश्व को तुम चिरन्तन


म्रत्यु को प्रासाद मानों


वेदना भय या घ्रणा


हो प्यार का या दर्द मीठा


एक क्षण का सुख और


फिर दर्द का घट जो न रीता


क्या करुँ मैं किधर जाऊं


वेदना या दर्द पाउँ


उस चिरन्तन अमिट पथ पर


ले बुला परमात्मा अब


दौड़ जाउँगा पकड़ तेरी


छॅंटकी उगँली को


किन्तु फिर भी प्रश्न यह


मथता रहेगा सदा मन को


मैं स्वतंत्र हूँ या कहीं


फिर दास तेरा


या नियन्ता तू हमारी प्रेरणा है


कर्मगति चालित है


जीवनचक्र मेरा


या हमारी भावना का


स्वर्गतल ही


या हमारे ज्ञान का


र्निमोह मन ही


गति नियन्ता जीव का


ईंधन प्रभो है


और तू


गती का संचरण पथ या


है संचालक अनेकों वाहनों का


लक्ष्य है जीवरुपी ड्राइवरों का


क्या है तू?


क्या हँ मैं?


और प्रभु यह सुख


क्या है?


खोजना जिसको


हमारा


लक्ष्य रहा है


हे चिरन्तन!


हे अचिन्तन!


दास हूँ मैं या


कि फिर


स्वतंत्रदृष्टा


चेतना का ! 


शिवेन्द्र बरेली

ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,

[.. वर्षों पूर्व भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की दुखद हत्या पर लिखी यह कविता संभवत: इसी दिवस की प्रतीक्षा में अब तक अप्रकाशित रही है. प्रभाकरण के बर्बरतापूर्ण युग के अंत पर प्रस्तुत है डायरी का यह वर्षों पूर्व भूला हुआ पृष्ठ … ]



सुनो…. सुनो….
जरा ध्यान से सुनो
ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो
काल के क्रूर हाथों को झुका नहीं सकोगे
अपनी गरजती हुयी बन्दूकों से
ये जो धुँआ फैलाया है तुमने आंतक से
नियति की दृष्टि से छिप नहीं पाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.
सुनो… सुनो …
जरा ध्यान से 
ओ सपोले पालने वालो
पिलाते हुये दूध डस जायेंगें तुम्हारे हाथ
काल के यम पाश में कोई स्वार्थ होता
पीड़ा की कोई जाति नहीं होती
हिंसा के बीज का कोई धर्म नहीं होता
उसी पीड़ा से छटपटाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन
सुनो … सुनो …
जरा कान खोलकर सुनो
ओ चिता पर निर्दोषों को चढ़ाने वालो
अंगारे होंगे तुम्हारी चिता में भी
ऑंसू नहीं एक भी मिल सके शायद ठण्डा करने
नश्वर शरीर के सुख की चाह में
शरीरों को नश्वर करने का खिलवाड़
करते रहोगे कब तक
बहुत हो चुका बन्द भी करो अब
अन्यथा …
हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्य
लेगा निगल तुम्हें भी एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.

एक और नये खतरे की घण्टी बज चुकी है……[समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

अपने ही देश में सैनिकों को कोयम्बटूर के पास खदेड़ने की घटना ……. खतरे की घण्टी बज चुकी है……

विगत दिवस कोयम्बटूर के पास आर्मी के कानवाय पर तथाकथित लिट्टॆ समर्थकों द्वारा हमला करके आर्मी की युनिफ़ार्म पहने सैनिकों का अपने ही देशवासियों द्वारा खदेड़ा जाना राष्ट्रीय जनमानस के लिये बहुत ही अशुभ संकेत है. पहले से ही पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद और नक्सली समस्या से प्रभावित भारतवर्ष के लिये अब ’लिट्टे समर्थन’ के नाम पर मात्र राजनीतिक लाभ के लिये तमिल भावना को गलत दिशा देते हुये अपने सैनिकों के साथ इस प्रकार का वर्ताव नितान्त निन्दनीय राष्ट्रविरोधी दुष्कृत्य है.

सैनिकों ने बहुत ही संयम का परिचय देते हुये हुल्लड़ मचाती भीड़ से ट्कराव बचा लिया अन्यथा हथियारबन्द सैन्य समूह की थोड़ी सी भी असवधानी के दूरगामी परिणाम हो सकते थे. अपने देशवासियों से ट्कराव बचाने उनका प्रयास सराहनीय है. सैनिकों द्वारा टकराव बचाने के लिये तथाकथित तमिल भीड़ के उपद्रवी लोगों के सामने से हट जाने को भीड़ के नेता अपनी शेखी से भले ही जोड़ लें किन्तु यह नितान्त राष्ट्रद्रोह है. आगामी समय के लिये खतरे की घण्टी बज चुकी है…… जागो हिन्दुस्तान जागो.. !!!

मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं …[गीत] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र


चाँदनी रात थी और नदी का था तट


 

बल खाती हवा मन रहा था भटक 


तुमको आवाज दी पर तुम आई नहीं 


गुनगुनाती रहीं गीत गाती रहीं 



दूर आकाश में व्योम के कोण से 

उठ रहे मेघ थे साँवले साँवले 

मैने इगिंत किया तुमने जाना नहीं 

मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं  


मेघों की गर्जना दामिनी की कड़क 

सुनकर चौकी थीं तुम घबराई थीं तुम 

दौडकर मेरी बाहों में तुम आ गईं 

कुछ लजाई हुई कुछ सताई हुई  


मैने चाहा था जो वो मुझे मिल गया 

बिन माँगें ही मुझको खुदा मिल गया 

तेरी अलकों से मैं खेलता फिर रहा  

तुम लजाती रहीं सकुचाती रहीं  

शिवेन्द्र कुमार मिश्र, बरेली

चुनाव के नाम पर न कोई ’खंडिस्तान’ चाहिये [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

हिन्दू न ढूँढ़ता हूँ मैं.. न मुसलमान चाहिये
पहचान ढूँढ़ता हूँ बस.. पहचान चाहिये
हिन्दू मिले और बौद्ध जैन सिख मिल गये
अगड़े मिले पिछड़े मिले पर ‘हम’ ही रह गये
कोई पूछने लगा क्या सवर्ण हो तुम..?
मण्डल और कमण्डल की ना दुकान चाहिये
पहचान ढूँढ़ता हूँ पहचान चाहिये

तुम भाजपाई हो या फिर काँग्रेसी हो
कम्युनिस्ट सोशलिस्ट या फिर जनता दल के हो
द्रमुक, लीग, अन्ना संग गोरखाली मिल गये
लेकिन प्रभो…!
मुझको तो एक अदद इंसान चाहिये
पहचान ढूँढ़ता हूँ पहचान चाहिये

कन्नडिगा तमिल तेलगू गुजराती मैं नहीं
सिंधी पंजाबी या बंगाली मैं नहीं
कश्मीरी कौन है आसामी मैं नही
गोरखाली फिर मलयाली या मराठी भी नहीं
अरे बाबा कान पकड़ता हूँ…… !
चुनाव के नाम पर न कोई ’खंडिस्तान’ चाहिये
अपने नाम के साथ सारा हिन्दुस्तान चाहिये
पहचान मेरी है यही बस ये पहचान चाहिये.