ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,

[.. वर्षों पूर्व भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की दुखद हत्या पर लिखी यह कविता संभवत: इसी दिवस की प्रतीक्षा में अब तक अप्रकाशित रही है. प्रभाकरण के बर्बरतापूर्ण युग के अंत पर प्रस्तुत है डायरी का यह वर्षों पूर्व भूला हुआ पृष्ठ … ]



सुनो…. सुनो….
जरा ध्यान से सुनो
ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो
काल के क्रूर हाथों को झुका नहीं सकोगे
अपनी गरजती हुयी बन्दूकों से
ये जो धुँआ फैलाया है तुमने आंतक से
नियति की दृष्टि से छिप नहीं पाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.
सुनो… सुनो …
जरा ध्यान से 
ओ सपोले पालने वालो
पिलाते हुये दूध डस जायेंगें तुम्हारे हाथ
काल के यम पाश में कोई स्वार्थ होता
पीड़ा की कोई जाति नहीं होती
हिंसा के बीज का कोई धर्म नहीं होता
उसी पीड़ा से छटपटाओगे एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन
सुनो … सुनो …
जरा कान खोलकर सुनो
ओ चिता पर निर्दोषों को चढ़ाने वालो
अंगारे होंगे तुम्हारी चिता में भी
ऑंसू नहीं एक भी मिल सके शायद ठण्डा करने
नश्वर शरीर के सुख की चाह में
शरीरों को नश्वर करने का खिलवाड़
करते रहोगे कब तक
बहुत हो चुका बन्द भी करो अब
अन्यथा …
हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्य
लेगा निगल तुम्हें भी एक दिन
बचोगे नहीं तुम भी एक दिन.

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. PREETI BARTHWAL
    मई 20, 2009 @ 15:17:24

    बहुत बढ़िया।

    प्रतिक्रिया

  2. डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
    मई 20, 2009 @ 15:39:50

    हिंसा की लहरों पर ये मदान्ध नृत्यलेगा निगल तुम्हें भी एक दिनबचोगे नहीं तुम भी एक दिन. ———— ye saar hai kavita ka. JO bhi SHANTI chahta hai, Jisane desh ke sapeksh Rajiv Gandhi ke yogdan ko dekha-samjha hai usako jaroor SUKOON mila hoga.

    प्रतिक्रिया

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