क्यों अमृत में गरल घोलते …… [कविता] – अमिता ‘नीर’


महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

तुम्हें नहीं बहला पाते हैं
रातें चन्द्रकिरण रस भीनी
ये हिमवर्षी सुन्दर दिन
अतिरंजित सपनें मानव के
क्यों ले मन के विजन डोलते
महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

अरे ! मौन ये भी अच्छा है
अंधकार कितना सच्चा है
पर इसमें भी जुगुनू जैसे
कोटि कोटि तारे प्रदीप्त हैं

अलकें पलकें निशि भर जगकर
कहती हैं क्या टिम टिम करते
महा मौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

मदमाते यौवन की पावस
कभी बनी जो मधुर विह्वला
किन्तु आज इस सूनेपन में
इस एकाकी नीरवता में
क्यों न हृदय की ग्रन्थि खोलते
महामौन क्यों नहीं बोलते
अनाहूत क्षण क्यों टटोलते

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. ओम आर्य
    जून 19, 2009 @ 09:10:48

    अरे ! मौन ये भी अच्छा हैअंधकार कितना सच्चा हैपर इसमें भी जुगुनू जैसेकोटि कोटि तारे प्रदीप्त हैंसाकारात्मक सोच को दर्शाती यह कविता……जो बेहद दिल के करीब लगा…………..बहुत ही सुन्दर

    प्रतिक्रिया

  2. परमजीत बाली
    जून 19, 2009 @ 09:32:34

    बहुत सुन्दर!! उस महामौन के मौन मे ही तो सभी उत्तर छुपे हैं।बहुत बढिया रचना है।बधाई।

    प्रतिक्रिया

  3. रंजना
    जून 19, 2009 @ 10:09:33

    Anupam !! Adwiteey lagi aapki yah rachna….Bhaav shbd yojna shilp sabne milkar man baandh liya….Bahut hi sundar likhte hain aap…mata aappar apni kripa banayen rakhen.

    प्रतिक्रिया

  4. शोभा
    जून 19, 2009 @ 10:31:23

    bahut sundar likha hai amita. bahut bahut badhayi.

    प्रतिक्रिया

  5. Mithilesh dubey
    सितम्बर 10, 2009 @ 16:47:19

    बहुत बढिया रचना है।बधाई।

    प्रतिक्रिया

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