कलम आज उनकी जय बोल


जला अस्थियां बारी बारी
छिटकाईं जिनने चिनगारी

जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर
लिए बिना गरदन का मोल
कलम आज उनकी जय बोल

प्रिय पाठकों !

यह सप्ताह भारत के इतिहास का एक विशिष्ट सप्ताह है। १०० वर्ष पहले इसी सप्ताह इस धरती पर दो महान विभूतियों ने जन्म लिया था। एक क्रान्तिदूत , शहीदे आज़म भगत सिंह और दूसरे राष्ट कवि रामधारी सिंह दिनकर। दोनो ने अपने-अपने दृष्टिकोण से देश को दिशा निर्देशन किया। एक जीवन की कला के पुजारी रहे और दूसरे ने सोद्देश्य मृत्यु अपनाकर विश्व को हर्ष मिश्रित आश्चर्य में डाल दिया। भगत सिंह का मानना था कि तिल-तिल मरने से अच्छा है स्वयं सहर्ष सोद्देश्य मृत्यु का वरण करो और दिनकर का मानना था कि जियो तो ऐसा जीवन जियो कि जान डाल दो ज़िन्दगी में। एक ने बलिदान की तथा एक ने संघर्ष की राह दिखाई। भगत सिंह एक विचारशील उत्साही युवा थे जिन्होने बहुत सोच समझकर असैम्बली में बम विस्फोट किया। वे जानते थे कि इसका परिणाम फाँसी ही होगा किन्तु ये भी समझते थे कि उनका बलिदान देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन को एक दिशा देगा और अंग्रेजों का आत्मबल कम करेगा। मरा भगत सिंह ज़िन्दा भगत सिंह से अधिक खतरनाक साबित होगा और वही हुआ। उनके बलिदान के बाद क्रान्ति की लहर सी आ गई। २४ वर्ष की आयु में उन्होने वो कर दिखाया जो सौ वर्षों में भी सम्भव नहीं था। उन्होने देश को स्वतंत्रता, समाजवाद और धर्म निरपेक्षता का महत्व बता दिया। परिणाम स्वरूप आज़ादी के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई। ये और बात है कि यदि वे आज देश की दशा देखें तो दुखी हो जाएँ।
दूसरे महान व्यक्तित्व थे राष्ट कवि दिनकर। दिनकर जी जीने की कला के पुजारी थे। २ वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया। बचपन अभावों में बीता। सारा जीवन रोटी के लिए संघर्ष किया और अवसाद के क्षणों में काव्य की आराधना की। सरकारी नौकरी करते हुए देश भक्ति और क्रान्ति से भरा काव्य लिखा और क्रान्ति का मंत्र फूँका। हुँकार, सामधेनी, रश्मि रथी, कुरूक्षेत्र ने देश के लोगों में आग जला दी। पद्मभूषण और ग्यानपीठ पुरुस्कार प्राप्त करने वाला कवि साधारण मानव की तरह विनम्र था। कभी-कभी आक्रोश में आजाता था। उन्होने समाज में संतों और महात्माओं की नहीं , वीरों की आवश्यकता बताते हुए लिखा-
रे रोक युधिष्ठिर को ना यहाँ, जाने दे उसको स्वर्ग धीर।

पर फिरा हमें गाँडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से आज करें, वे प्रलय नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे, हर-हर बम-बम का महोच्चार
देश के शत्रुओं को भी उन्होने ललकारा और लिखा-
तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यों मत कुरेदो।
दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वाला मुखी हैं।

वीररस के साथ-साथ उन्होने श्रृंगार रस का मधुर झरना भी बहाया। उर्वशी उनका अमर प्रेम काव्य है। जिसमें प्रेम की कोमल भावनाओं का बहुत सुन्दर चित्रण है। दिनकर का काव्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनकी कविता भारत के लोगों में नवीन उत्साह जगाती है। सारा जीवन कठिनाइयों का विषपान करने पर भी समाज को अमृत प्रदान किया। ऐसे युग पुरूष को मेरा शत-शत नमन।

दोषी कौन….. [आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

[मित्रों वर्षों पूर्व जम्मू कश्मीर से लेकर सम्पूर्ण देश में फैला आज जैसा आतंकवाद नहीं था. हां पंजाब प्रांत में राजनीतिक दुष्चक्रों से प्रभावित होकर आतंक की छिटपुट घटनाओं ने आहट देना प्रारम्भ कर दिया था. उन्हीं दिनों लिखा डायरी का यह पृष्ठ आज फिर मेरे सामने है. परिस्थितियां और संदर्भ आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं तथा हमारी सामाजिक सहभागिता की मांग कर रहे हैं]


हम सब मानव सारा जीवन एक मृगतृष्णा के पीछे ही भागते रहते हैं. यह मृगतृष्णा ही संभवत: हमारे जीवन को चेतनता का ….. गतिशीलता का एक कारण देती है.
मानव जीवन के सभी अनमोल क्षणॊं में हम अन्यान्य प्रकार से एक दूसरे को छलते रहत्ते हैं. कई बार मानव मानव को छलते छलते दानव बन जाता है…. इसी प्रवृत्ति का शिकार व्यक्ति अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतना अधिक सचेष्ट हो जाता है कि इसी दानवी प्रकृति के वशीभूत एक एक करके अपने ही प्रियजनों…. हितैषियों और अंत में अपने ही समाज को निगलना प्रारंभ कर देता है. इस स्थिति में स्वार्थ परता हमारी आंखों को तुच्छ भौतिक सफलता की पट्टी से मदांध कर देती है और हमारा विवेक लुप्तप्राय हो उठता है. किन्तु इस स्थिति के लिये उत्तरदायी कौन …?
जन्मजात शिशु पूर्ण रूपेण कुम्भकार की मिट्टी सदृश अथवा कोरे कागज की तरह ही तो होता है. उसके भविष्य का संविधान, उसकी जीवनदिशा एक एक करके उसके चारो ओर वातावरण में घटित घटनाक्रम लिखते जाते हैं. तत्पश्चात वह परम निर्विकार मानवशिशु युवा होते होते सज्जन या दुर्जन किसी भी प्रकार का बन जाता है.
किसी पेड़ पर जन्म लेने वाली नवनूतन पल्लव शाखायें बचपन से ही कठोर नहीं होतीं. दीर्घ उष्ण मरूस्थल में जन्म लेने वाले नागफणी के नवांकुर कांटे भी आरम्भ में कोमल होते हैं. उत्पन्न होते ही वह चुभने नहीं लगते. उन्हें भी कठोर बनने में समय लगता है. मरूस्थल की सूखी रेत, प्यासी धरती और सूरज से तपती हवा के गर्म थपेड़े उन्हें कठोर दर कठोर बनाते जाते हैं…. और फिर तीखी जलन का विष भरने लगता है उनमें. प्रतिशोध लेने को मजबूत कर देता है एक दिन पर्यावरण उन्हें.
दोषी कौन … नागफणी के वह, जन्मना कोमलकण्टक … अथवा पर्यावरण के तीखे तपते झोंके….? क्या इस मानवीय पर्यावरण के प्रति भी हमारा कोई उत्तरदायित्व है..?