दोषी कौन….. [आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

[मित्रों वर्षों पूर्व जम्मू कश्मीर से लेकर सम्पूर्ण देश में फैला आज जैसा आतंकवाद नहीं था. हां पंजाब प्रांत में राजनीतिक दुष्चक्रों से प्रभावित होकर आतंक की छिटपुट घटनाओं ने आहट देना प्रारम्भ कर दिया था. उन्हीं दिनों लिखा डायरी का यह पृष्ठ आज फिर मेरे सामने है. परिस्थितियां और संदर्भ आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं तथा हमारी सामाजिक सहभागिता की मांग कर रहे हैं]


हम सब मानव सारा जीवन एक मृगतृष्णा के पीछे ही भागते रहते हैं. यह मृगतृष्णा ही संभवत: हमारे जीवन को चेतनता का ….. गतिशीलता का एक कारण देती है.
मानव जीवन के सभी अनमोल क्षणॊं में हम अन्यान्य प्रकार से एक दूसरे को छलते रहत्ते हैं. कई बार मानव मानव को छलते छलते दानव बन जाता है…. इसी प्रवृत्ति का शिकार व्यक्ति अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये इतना अधिक सचेष्ट हो जाता है कि इसी दानवी प्रकृति के वशीभूत एक एक करके अपने ही प्रियजनों…. हितैषियों और अंत में अपने ही समाज को निगलना प्रारंभ कर देता है. इस स्थिति में स्वार्थ परता हमारी आंखों को तुच्छ भौतिक सफलता की पट्टी से मदांध कर देती है और हमारा विवेक लुप्तप्राय हो उठता है. किन्तु इस स्थिति के लिये उत्तरदायी कौन …?
जन्मजात शिशु पूर्ण रूपेण कुम्भकार की मिट्टी सदृश अथवा कोरे कागज की तरह ही तो होता है. उसके भविष्य का संविधान, उसकी जीवनदिशा एक एक करके उसके चारो ओर वातावरण में घटित घटनाक्रम लिखते जाते हैं. तत्पश्चात वह परम निर्विकार मानवशिशु युवा होते होते सज्जन या दुर्जन किसी भी प्रकार का बन जाता है.
किसी पेड़ पर जन्म लेने वाली नवनूतन पल्लव शाखायें बचपन से ही कठोर नहीं होतीं. दीर्घ उष्ण मरूस्थल में जन्म लेने वाले नागफणी के नवांकुर कांटे भी आरम्भ में कोमल होते हैं. उत्पन्न होते ही वह चुभने नहीं लगते. उन्हें भी कठोर बनने में समय लगता है. मरूस्थल की सूखी रेत, प्यासी धरती और सूरज से तपती हवा के गर्म थपेड़े उन्हें कठोर दर कठोर बनाते जाते हैं…. और फिर तीखी जलन का विष भरने लगता है उनमें. प्रतिशोध लेने को मजबूत कर देता है एक दिन पर्यावरण उन्हें.
दोषी कौन … नागफणी के वह, जन्मना कोमलकण्टक … अथवा पर्यावरण के तीखे तपते झोंके….? क्या इस मानवीय पर्यावरण के प्रति भी हमारा कोई उत्तरदायित्व है..?
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