पीड़ा …….. [कविता] – अमिता ’नीर’

उर में पीड़ा रोये
ऑंखों से लोहू बरसे
तेरी स्मृति की सुरभि
मानस में धीरे बरसे
घन तम में पीड़ा रोयी
आंखों से लोहू बरसा
आंखों का बेकल पँछी
युग युग से तुमको तरसा
दुख दर्द भींच होंठों में
हमने चाहा मुस्काना
बह चली अचानक पीड़ा
आंखों नें रोना जाना
हा देव ! मुझे जलने का
अभिशाप दे दिया अच्छा
पर इस जलते उर पर भी
दो आंसू कण बरसाना

–अमिता ‘नीर’

यह कैसा मापदण्ड ……. [ लघुकथा] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

[महाराष्ट्र सहित 3 राज्यों का चुनावी दंगल टी वी से लेकर प्रिंट मीडिया तक चरम पर है. जनसामान्य की स्मृति रष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के बिंदुओं पर से कुछ अधिक ही विस्मरणशील होती है. साथ ही राष्ट्रीय दायित्व का चैथा स्तंभ मीडिया और पत्रकार के हाथ ऐसे में टी आर पी नाम की जोंक से ग्रस्त हो जाते हैं. स्थिति यह है कि लोकतंत्र का चौथा खंभा कई बार अव्यक्त रूप से ह्तोत्साहन योग्य व्यक्तित्वों के प्रचार का माध्यम बन जाता है. …….इसी परिप्रेक्ष्य में इस लघुकथा को पाठकों के सामने लाने की आवश्यकता अनुभव होती है. …]

रचनाकार के स्वर में
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टी वी पर शोर अभी कम नहीं हुआ था. सिडनी सहित आस्ट्रेलिया के अन्य नगरों में वहां के अस्पतालों में भरती भारतीय छात्रों के दृश्य स्क्रीन पर बार बार दिखाये जा रहे थे. उन्होंने रिमोट मानव के हाथ से लेकर वाल्यूम कम कर दिया.

“आस्ट्रेलिया में हमारे छात्रों पर हो रहे हमलों की जितनी भी निन्दा की जाये वह कम है. हमारी सरकार ने उनकॆ प्रधानमंत्री से तो …..” ड्राइंग रूम में पापा की चिन्तातुर आवाज गूंजी.

“ इन लोगों ने पहले से भी नाक में दम कर रखा है. क्रिक्रेट टीम के साथ होने वाले मैचों में नस्लभेद, हरप्रकार की बेइमानी और अब भारतीय छात्रों के साथ नस्लीय हिंसक घटनायें …… जबकि हम अब तक वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाते हुये हर विदेशी को अपने सिर आंखॊं पर बैठाने को तैयार रहते हैं.” टी वी पर प्रदर्शित समाचारों से मानव अब भड़कने लगा था.

“ शांत मानव शांत वह हमारी संस्कृति है. हमारी और उनकी सभ्यता में मूलभूत अंतर है . उनके कारण हम अपनी सभ्यता नहीं बदल सकते … और फिर सरकार वार्ता कर तो रही है. हमारे विदेशमंत्री ने विरोध स्वरूप अपना पूर्वनियिजित आस्ट्रेलिया दौरा भी निरस्त कर दिया . इस विषय में यहां मुम्बई में तुम क्या कर सकते हो.” पापा ने समझाने का प्रयास किया.

“ मैं चुप नहीं रह सकता हूं. हम कल ही अपने साथियों के साथ आंदोलन और धरना देंगे. सरकार को इस तरह चुप नहीं बैठने देंगे. आज दिल्ली या कोलकाता हर सरकार उग्र आंदोलन की भाषा ही समझती है. मानव के स्वर में युवा आंदोलनों की सफलता का दर्प और दॄढ़ निश्चय स्पष्ट दिखायी दे रहा था.

“ मैं तुमसे सहमत नहीं हूं मानव. तुम और तुम्हारे साथी संभवतः देश की कुछ और सम्पत्ति नष्ट करोगे तथा अनगिनत लोगों को असुविधा और संकट में डालने वाले हो बस … अपनी बात रखने के कुछ और … शांत तरीके भी तो हो सकते हैं “

“ आप नहीं समझेंगे पापा …… यह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न है मैं चुप नहीं बैठ सकता .. अपने देश के छात्रों को आस्ट्रेलिया में न्याय और सुरक्षा मिलने तक हम चैन से नहीं बैठेंगे ” मानव लगभग उत्तेजित था.

“ हूं…. आज देश के सामने महात्मा गांधी तो हैं नहीं. आज के युवा को इस मार्ग पर डालने वाले वर्तमान नेता ही तो हैं … और निरीह जनता भुगत रही है. “ वह स्वयं से बड़बड़ाने लगे. उनके स्वर में असहमति के साथ विवशता स्पष्ट थी.

“ मानव ..! मानव … !!” बाहर से पुकारने की आवाज और दरवाजे पर जोर जोर की खटखट के साथ लेन में शोर सुनायी पड़ा.

“ यह तो वीर भाउ की आवाज है, जरूर सारे साथी किसी धरने पर जा रहे होंगे ……. कहते हुये अगले ही पल मानव दरवाजे के बाहर आनन फानन में फुर हो गया.

“ अरे सुनो तो ….” पापा बस इतना कह्ते हुये बाहर सड़क पर जाते हुये उत्तेजित युवा भीड़ के रेले की एक झलक मात्र ही देख सके.

* * * * *

थोड़ी देर बाद ही स्थानीय चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज के साथ समाचारों का दूसरा दृश्य सामने था.

“ मुम्बई में रेलवे परीक्षा देने आये छात्रों पर स्थानीय युवकों का हिंसक हमला…” टी वी स्क्रीन पर समाचार वाचिका का स्वर पापा जी को अब सुनायी नहीं दे रहा था. वह दौड़ा दौड़ा कर पीटे जा रहे उत्तर भारतीय छात्रों की पीड़ा और चीख पुकार की अफरातफरी में खोते जा रहे थे. अपने ही राष्ट्र के एक कोने से दूसरे कोने में परीक्षा के लिये भटकते हुये असहाय छात्रों का पुलिस के सामने खदेड़ा जाना वह देख रहे थे. इन्हें पीटने वाली भीड़ में “ … मराठी मानुष…” के बैनर के साथ मानव का सर्वाधिक उत्तेजित चेहरा उन्हें टी वी स्क्रीन पर बार बार सबसे आगे दिखायी दे रहा था.

“ हेलो … ! पुलिस कंट्रोल …”

“ देखिये …… रेलवे परीक्षा देने आये उत्तर भारतीय छात्रों पर कुछ स्थानीय युवाओं की भीड़ ने हमला कर दिया है. कुछ करिये …”

“ हा.. हां हम भी टी वी पर देख रहे हैं. “

“ आप देखिये नहीं कुछ करिये … पीटने वालों की भीड़ में मेरा बेटा भी है “ उनकी आवाज में चिंता और व्यग्रता दोनों थे.

“ काका आप शांत रहें आपका बेटा तो अच्छी समाज सेवा कर रहा है “ उधर से मराठी में कहा गया.

“ यह क्षेत्रीयवाद आस्ट्रेलियाई नस्लवाद से कहीं अधिक खतरनाक है …. राष्ट्रीय स्वाभिमान का नाम लेने वालों का यह दोहरा मापदण्ड कैसा ? “ उनका धैर्य अब समाप्त हो गया था. रिसीवर लगभग पटकते हुये उन्होंने टी वी सेट बंद कर दिया.

वो देखो एक इंसान ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

वो देखो एक इंसान


पागल सा


वर्तमान के चीथड़ों को लपेटे


अतीत की सुई से सीता सा


वो देखो ….



गांधी का डंडा


सुभाष की आवाज


भगत की फाँसी का फन्दा


गले में डालता सा


वो देखो ….



हँसते है सडक़ चलते लोग


छात्र.. नेता … अभिनेता और कर्मचारी


दुकानदार.. पुलिस… अफसर और व्यापारी


होठों मे बुदबुदाते हुये


वंदेमातरम चीखता सा


वो देखो ….



अपने कंधो पर ढोता है अपनी लाश


सुनहले सपने इस देश के आंखो में सजाकर


पहचाने नगर में


परिचित चेहरा ढूँढता सा


वो देखो एक इंसान पागल सा..