मां …. [कविता] – भोजराज सिंह

[ नवांकुर प्रोत्साहन के लिये तृषाकान्त पर सभी नवोदित रचनाकारों का स्वागत है. यदि किसी कारणवश आपकी रचना भावपरक होने के उपरांत भी कहीं प्रकाशित नहीं हो सकी है तो अपनी रचना अपने संक्षिप्त परिचय के साथ हमें नवांकुर शीर्षक सहित skant124@gmail.com पर मेल करें.

नवांकुर की प्रथम कड़ी के रूप में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं भोजराज सिंह की रचना मां…

श्री भोजराज सैफ़ई निवासी हैं तथा कृषि विषय में स्नात्कोत्तर शिक्षा के उपरांत आगरा में प्रशिक्षु शिक्षक हैं. ]

कब्र के आगोश में जब थक कर सो जाती है मां

तब कहीं जाकर थोड़ा सुकून पाती है मां
फिक्र में बच्चों की कुछ ऐसी घुल जाती है मां
नौजवां होते हुये भी बूढ़ी नज़र आती है मां

रूह के रिश्तों की गहराइयां तो देखिये
चोट जो लगे हमको तो दर्द से चिल्लाती है मां
कब जरूरत हो मेरे बच्चे को यह सोच कर
जागती रहती हैं आंखें और सो जाती है मां

घर से जब परदेश जाता है कोई नूरे नजर
हाथ में गीता लिये दर पे आती है मां
जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेश में
आंसुओं को पोंछने ख्वाबों में आती है मां

चाहे हम खुशियों में मां को भूल जायें
जब मुसीबत में होते हैं तो याद आती है मां
लौट्कर जब सफर से वापस आते हैं हम
गोद में सर को लेकर प्यार से सहलाती है मां

हो नहीं सकता कभी अहसान उसका अदा
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है मां
मरते दम तक अगर बच्चा आये ना परदेश से
अपनी दोनों पुतलियां चौखट पर रख जाती है मां

प्यार कहते हैं किसे और ममता क्या चीज है
ये तो उनसे पूछिये जिनकी गुजर जाती है मां
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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. संजय भास्कर
    दिसम्बर 11, 2009 @ 08:13:45

    बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए…. खूबसूरत रचना……

    प्रतिक्रिया

  2. संजय भास्कर
    दिसम्बर 11, 2009 @ 08:14:14

    बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों मेंSANJAY KUMAR HARYANAhttp://sanjaybhaskar.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

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