लोकतन्‍त्र की द्रोपदी का चीरहरण … [आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,

08 मार्च 10 : आज भारतीय लोकतन्‍त्र की द्रोपदी का राजनीतिक दुशासन ने भरी लोकसभा में सारी दुनिया के सामने चीरहरण कर दिया. पौराणिक कथानक में तो द्रोपदी की लाज उस समय के महानायक भगवान श्रीकृष्ण ने चीरहरण होते होते बचा ली थी किन्तु फिर भी उस अक्षम्य अपराध के लिये मूकदर्शक रहने पर महान सत्यव्रती भीष्मपितामह को भी आततायी दुर्योधन के साथ कौरवकुल एवं समस्त युग सहित महाभारत की भीषण त्रासदी का अभिशाप भोगना पड़ा था.


किन्तु आज …….. ?

अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि आज अंतर्राष्ट्रीय महिलादिवस के दिन नारी को मातृशक्‍ति मानने वाले भारत में महिला आरक्षण बिल को प्रस्तुत होते ही राज्यसभा में सभापति, महामहिम उपराष्ट्रपति के हाथों से छीनकर चिन्दी चिन्दी फाड़कर उनके ही ऊपर फेंक दिया गया. यह कोई साधारण राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है. यह विरोध करने का कोई लोकतान्‍त्रिक तरीका भी नहीं है. यह घटना महाभारत के ऎतिहासिक चीरहरण से कहीं अधिक गम्भीर एवं अक्षम्य राजनीतिक अपराध है.


हवा में तैरते हुये महिला बिल के वह टुकड़े, मात्र कागज की चिन्दियां नहीं थे. वह राष्ट्र की 71% जनसंख्या को पालने पोषने वाली महिलाओं की राजनीतिक अस्मिता की चिन्दियां थीं….. उनकी राजनीतिक उड़ान के पंखों एवं उनके स्वतंत्र सपनों की चिन्दियां थीं. आजादी के वर्षों बाद, आज भी… आधी दुनियां कही जाने वाली समस्त मातृशक्‍ति को उसकी 50% हिस्सेदारी के स्थान पर मात्र 33% आरक्षण का प्रस्ताव …… और उसपर भी इतना ववाल. घटना को लेकर राजनीतिक गलियारों में जो भी चर्चा हो किन्तु एक भयावह राजनीतिक परिदृश्य स्पष्ट है. बहुसंख्यक शालीन सांसदों के सामने मात्र कुछ राजनीतिक डकैतों ने बिल फाड़कर लोकतन्‍त्र का गला दबाकर उसकी हत्या करने जैसा गम्भीर अपराध किया है. इन सांसदों ने लोकतन्‍त्र में आस्था रखने वाले समस्त भारतीयों का उपहास उड़ाया है. उन सभी नागरिकों की लोकतन्‍त्रीय आस्था को ठेस पहुचायी है जो लोकतन्‍त्र में ही राष्ट्रीय उत्‍थान की शक्‍ति ढूंढ़ते हैं.


आज की इस घटना के परिप्रेक्ष्य में कोई भी समझ सकता है कि जिस राष्ट्र में महामहिम उपराष्ट्रपति के हाथों में यदि एक महत्वपूर्ण दस्तावेज कुछ राजनीतिकों के राजनीतिक कदाराचरण के कारण सुरक्षित नहीं है तो लोकतन्‍त्रीय मर्यादाओं की सुरक्षा कैसे होगी. लोकतन्‍त्र की शक्‍ति राजनीतिकों के सार्वजनिक जीवन में मर्यादापूर्ण
व्यवहार एवं शुचितापूर्ण लोकाचरण में ही निहित है. किन्‍तु यह दुर्भाग्य की बात है कि पिछले कई दशकों से अनेकों राजनीतिकों के सार्वजनिक कदाचरण से सड़कों का गुण्डा परिदृश्य अन्‍ततोगत्वा संसद तक पहुंच गया है. फलत: आज का जनमानस राजनीतिक डकैत्तों से लोकतन्‍त्र की सुरक्षा के लिये चिन्तित है. क्या कोई बता सकता है कि राजनीतिक दुराचार के दोषी इन तथाकथित माननीयों को कोई सबक सिखा सकेगा … ? अथवा सदैव की भांति इसबार भी राष्ट्र में लोकतन्‍त्र की भावना एक बार फिर कुंठित होगी … ?


हे मातृशक्‍ति ! अन्ततोगत्वा तुम्हे ही जाग्रत होना होगा फिर से महिषासुर रूपी लोकतन्‍त्र के इन राजनीतिक बलात्कारियों से निबटने के लिये भी …. या देवी सर्वभूतेषु …… लोकतन्‍त्र रूपेण संस्थिता नम्स्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नम:.

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