सूरज हर दिन निकलता है …. [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सूरज निकलता है

हर सुबह …..
सर्द पसरी रेत पर
टीलों के पीछे से
लेने अर्ध्य, आस्था..
सुनने.. जय जयकार..
हो सप्ताश्व रथ पर सवार
दौड़ाता है श्रमित अश्वों को
तप्त शरीर, लोकहित धीर


बालू पर घरौंदों में
घर नहीं बसते
लगता है बस मेला
और…
मेले की भीड़ में
परिवार नहीं बनते
मिलते हैं…. बस
अस्ताचल पर विछड़ने के लिये

ईश्वर और प्यार …
दोनों ही अस्तित्वहीन
किन्तु चलते हैं,
किसी मुद्रा की भांति
ईश्वर ……
आस्था का व्यापार
और प्यार……
रिश्तों के सांचों में…
स्वार्थ का आधार

गोधूलि में ……
मुंह फेर लेते हैं
घर वापस लौटते
पशु पक्षी… जन, गण….
अस्त होते सूरज से
वापस लौटता है
फिर भी वह,
हर शाम…. झोंपड़े में …
चूल्हे की आग और
टिमटिमाती रोशनी के लिये..

हर घर में एक सूरज होता है
और सूरज हर दिन निकलता है
Advertisements

4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. शोभा
    सितम्बर 11, 2010 @ 05:56:25

    बहुत सुन्दर लिखा है और सुनाया उससे भी अच्छा । बधाई स्वीकारें।

    प्रतिक्रिया

  2. गीता पंडित (शमा)
    नवम्बर 15, 2010 @ 14:48:36

    आपकी लेखनी मन को आंदोलित करती है….भाव प्रवीणता और शब्दों का सुंदर चयन मन मोह लेता है…उस पर मधुर सुर….आहा…..आभार आपका….शुभ-कामनाएँ….

    प्रतिक्रिया

  3. Rachana
    दिसम्बर 17, 2011 @ 17:21:18

    sunder bimb sunder bhav shunder shabdanupam prastutibadhairachana

    प्रतिक्रिया

  4. Suman Dubey
    दिसम्बर 18, 2011 @ 09:59:57

    namaskaar, bahut bdhiya likhaa hai kaant jii

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: