मुखौटे …… [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

घण्टनाद ..

शंखध्वनि.. आरती
एक कतार
दो कतार….
११०१ की कतार..
११००१ की कतार
विशिष्ट कतार….
वी वी आई पी कतार
एक कुण्ड ….
दो .. तीन….
…. एक्कीसवां कुण्ड
गीले वस्त्र
गर्भगृह परिक्रमा
विग्रह दर्शन
धक्कामुक्की
रेलमपेला….
पंक्तिबद्ध यौवन
नयनबन्द …
सम्पूर्ण समर्पण
टटोलती दृष्टि,
परम्परागत पुजारी
हुंह …. !
एक मुखौटा

अजान
एक शोर
फिर कतार
वजू तकरीर
हंसते चेहरे
नये कपड़े
रंगबिरंगी टोपी
खिलखिलाते बच्चे
सेवैयां
ईदी और बच्चियां
गले मिलते लोग
हंसी खुशी,
और बस …
एक विस्फोट
हाहाकार …
बिखरा खून
चीथड़े अंग
कौम खतरे में, जिहाद
आह… !
फिर एक मुखौटा

नीरव .. शान्ति
गूंज घण्टे की
सेवा.. प्रेम सन्देश
भाईचारा.. श्वेत वस्त्र
कन्फेशन …
प्रभु लेता है …
सारे पाप अपने ऊपर
और तुम पापमुक्त ..
भावनात्मक शोषण,
फिर एक नया पाप
झूलता पालना .. धर्मप्रसार
यह भी …. !
बस एक मुखौटा

मुखौटे अभी और भी हैं
मुखौटे ही मुखौटे …
इन्हें उतारने के प्रयास में
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा

परशुराम जयन्ती और ब्राहम्णों को जाति दायरे में कैद करने की साजिश [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र,

बैसाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को ब्राहम्ण समाज परशुराम जयंती मनाता है। भगवान श्री परशुराम की जयंती पर यू०पी० के एक उत्साही मुख्यमंत्री ने इस दिन को एक राजकीय अवकाश घोषित कर दिया तब से बाकायदा छुट्टी मनाकर परशुराम जयंती मनाई जाती है। 

भगवान श्री परशुराम से लोक का परिचय रामायण और महाभारत के माध्यम से है। रामायण के परशुराम शस्त्र/शास्त्रविद और तपस्वी हैं और राजा जनक के दरबार में सीता जी के स्वंयवर के अवसर पर उपस्थित होते है। भगवान श्री राम द्वारा शिव धनुष भंग किया जा चुका है। शिव परशुराम जी के आराध्य एवं गुरु है। अत: उनका धनुष तोडे जाने से स्वाभाविक रुप से वह आहत है। प्रतिवर्ष सम्पूर्ण भारतबर्ष में रामलीला कमेटियों द्वारा आयोजित रामलीलाओं में कुशल कलाकारों द्वारा ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ से देश की हिन्दू जनता परिचित है। ग्रामीण हिन्दू जनता में तो इस उत्साही संवाद की तुलसीकृत रामचरित मानस की चौपाईयां प्रचलित है। विद्वान किन्तु क्रोधी, शिवभक्त, तपस्वी, विख्यात ब्राह्म्ण कुल मिलाकर यह है रामायण में भगवान परशुराम की लोकछवि।

लोक का भगवान श्री परशुराम से दूसरा परिचय महाभारत महाकाव्य के एक उदात्त नायक भीष्म के गुरु के रुप में है और अन्तत: गुरुशिष्य के मध्य हुए एक युद्व में शिष्य से पराजय के उपरान्त वह क्षत्रियों के शस्त्र शिक्षण से विमुख हो जाते है। महाभारत के एक दूसरे उदात्त नायक कर्ण को शस्त्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए ब्राहम्ण का रुप धारण करना पडता है। महाभारत के एक अन्य नायक पाण्डवों और कौरवों के गुरु आचार्य द्रोणाचार्य के गुरु भी भगवान श्री परशुराम ही है। इस तरह महाभारत में इनकी छवि शास्त्रविद और क्रोधी ब्राहम्ण के रुप में (भीष्म राजकुमारी अम्बालिका प्रकरण) निखर कर आई है।


परशुराम की एक अन्य लोकस्मृति पितृभक्त परशुराम की है जिन्होने अपने पिता की आज्ञा मानकर माता रेणुका का सर काट डाला। बाद में पिता के द्वारा वरदान मांगने को कहने पर इन्होनें माँ के पुर्नजीवन का वरदान मांगा।

परशुराम की लोकमानस पर जो सर्वाधिक अंकित छवि है वह है क्षत्रियद्रोही और क्रोधी परशुराम की जिन्होनें 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन कर डाला। परशुराम की वंश परम्परा यह बताती है कि परशुराम की मॉ रेणुका राजा प्रसेनजित की पुत्री और एक क्षत्राणी थी जबकि पिता जमदग्नि भृगुवंशी ब्राहम्ण। दोनो वंशों में पीढियों से शत्रुता थी। एक बार जब परशुराम की अनुपस्थिति में नरेश कार्तवीय सहस्त्रवाहु अर्जुन नें जमदग्नि के आश्रम को जला डाला और महर्षि जमदग्नि का वध कर कामधेनु गाय छीन ली तो परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डालने की प्रतिज्ञा कर डाली। यह थे क्रोधीराम यानि कि परशुराम जिन्होनें इस प्रतिज्ञा को 21 वार क्षत्रियों का वध कर पूर्ण किया।

भगवान श्री परशुराम की लोकमानस में व्याप्त छवि क्या है?

शायद आप सहमत न हों किन्तु मेरा मानना है यह छवि क्षत्रिय मानमर्दक ब्राहम्ण योद्धा भगवान श्री परशुराम की है। जब आप किसी के विरोध में स्थापित होते है तो स्वयं को सीमित कर लेते है। यह सीमितीकरण ही जाति है। जातियां अपने को वर्ण में समावेशित मानते हुये भी वर्ण नहीं होतीं और प्राय: अपने कृत्यों से वर्ण विरोधी होती है। उदाहरण के लिए ब्राहम्ण अपने को लोकमात्र में पण्डित कहते है किन्तु सरयूपारिण कान्यकुब्ज आदि लगभग 72 विभेद हैं। इनमें भी शर्मा, मिश्रा, शुक्ला, घर, विस्वा आदि पर विभेद है। और इन विभेदों के आधार पर संगठन भी। क्षत्रिय वर्ण लोकभाषा में ठाकुर हो गया और उसमें भी चौहान, राठौर, कठेरिया, जाधव परमार आदि भेद और अनेको उपभेद। वैश्य लोकभाषा में लाला जी या साहू जी हो गया तथा उसके भी अग्रवाल, कलवार, गुप्ता,खत्री आदि अनेकों भेद उपभेद हो गये। अतीत का शूद्र वर्ण पिछड़ा और दलित पुनश्च पिछड़ा, अति पिछड़ा दलित और अति दलित में वदल गये। इस वर्ण ने कोई वर्णगत सामोहिक व्यंजनात्मक शब्द तो नही खोजा किन्तु उपवर्गों और जातियों मे संगठन और नेता खड़े कर लिए। बहिन मायावती दलित की बेटी हो गयी और लालू, मुलायम, कल्याण आदि पिछड़े नेता। इनके अपने-अपने महापुरुष भी वंट गये जैसे रामायण के संत भगवान वाल्मीकी दलित नेता हो गये तो शिवाजी महाराज पिछड़े। महाराणा प्रताप क्षत्रिय महापुरुष हो गये तो सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (मुख) जाति के महापुरुष। वस इसी श्रंखला में पण्डित (ब्राहम्ण) महापुरुष हो गय भगवान श्री परशुराम। अब हमारा जाति नायक दूसरों के लिए खलनायक है तो बना रहे। अगर यह जातीय महापुरुष सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता और हिन्दू संस्कृति को विभाजित करते दिखाई देते हैं तो ऐसा हुआ करे पर वोट की राजनीति में तो चलते ही हैं और एक सरकारी छुट्टी भी दिलाते हैं – वाल्मीकी जयंती रैदास जयंती -अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस और परशुराम जयंती।

ब्राहम्ण के लिए एक अन्य शब्द है पुरोहित जिसका अपभ्रंश हुआ शायद पुजारी पण्डित जी। शब्द भी सम्भवत: पुरोहित से अदभुत हुआ होगा। पुरोहित के लिय वेद कहता है- ”वयं राष्ट्र जाग्रयाम”: पुरोहित हम पुरोहित राष्ट्र को जाग्रत रखते है यानी कि ब्राहम्ण राष्ट्र का अनुयायी है। हिन्दुत्व का पुरोधा है। जातियों में बंटा समाज, राष्ट्र, हिन्दुत्व को कमजोर करता है और राष्ट्र कमजोर होता है, हिन्दुत्व जीर्ण-शीर्ण होता है तो हम तो मर ही जाते है। इस राष्ट्र में हमारा कोई हिस्सा नही है। सत्ता क्षत्रियों के लिए हैं। व्यापार वैश्यों के लिए है। और सेवा कर्म शुद्रों के लिए है। यह सारे हिस्से आपस में अन्त: परिवर्तनीय है। किन्तु हम ब्राहम्णों का कोई हिस्सा नही है। क्योंकि लोकभावन, लोकसंगठन, सशक्तराष्ट्र सबल संस्कृति यही हमारा हिस्सा हैं। इसके लिए भोजन हम नागरिकों से भिक्षा के द्वारा प्राप्त करते है। ताकि प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित में नियोजित रखा जा सके। यह भिक्षा भी समाज को शिक्षा देकर प्राप्त करना चाहतें है। हमारे पास अपना कुछ नही है जो भी है राष्ट्र का है, हिन्दुत्व का है, राष्ट्र का है, मानवता का है (इदं राष्ट्राय इदन्न मम) । और इस परम्परा के प्रतीक भगवान श्री परशुराम नहीं है अपितु है आचार्य ”चाण्क्य”। ईसा से 323 वर्ष पूर्व भारत के महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के महामात्य, तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य अर्थशास्त्र जैसे लोक विश्रुत ग्रंथ के स्रष्टा आचार्य चाणक्य तो फिर ब्राहम्ण महापुरुष के रुप में आचार्य चाणक्य की जयंती क्यो नहीं मनाई जाती। वर्ण विभेदक परशुराम की जयंती क्यों ?

आईये खुले नेत्रों से काल के पटल पर लगभग 2330 वर्ष पूर्व का एक चित्र आपके सामने प्रस्तुत करते है।

वितस्तता की लहरों में काफी उष्णता अनुभव की जा सकती है। खूबसूरत वादियां युद्ध के स्वरों से झंकृत हो रही है। प्रेमी युगल दूर देश से आने वाले प्रबल झञ्झावात की चर्चा करते हैं। प्रेमिकाओं के कुरंग-नेत्रों में प्रेमी के युद्धक्षेत्र मे जाने की आशंका स्पष्ट देखी जा सकती है। नगरों की बीथिकाएं, चौपालें, पंचायतें, भावी युद्ध की आशंकाओं से ग्रसित हैं। उडन्त कथाओं में यूनान के किसी बहादुर राजा की चर्चा हुआ करती थी। नगर में आने वाले विदेशी व्यापारी और विद्यार्थी कामगार आदि सिकन्दर की चर्चा बढा-चढाकर किया करते थे। लोग चर्चा करते थे कि कैसे एक दूरदेश के छोटे से देश का महत्वाकांक्षी शासक सिकन्दर एक महान विजेता बन गया। अरबेला के मैदान मं (330 ई.पू.) कैसे उसने पार्शिया के महान सम्राट दारयवहु (डेरियस III) को परास्त कर पर्शियन साम्राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। और अब उसके आतंकी कदम भारतीय उपमहाद्वीप की ओर वढ रहे थे।

अन्तत: आक्रमण हुआ। पूर्व पर्शियन सम्राटों ने भारत प्रवेश के लिए जो मार्ग चुना था सिकन्दर ने भी उसी रास्ते से भारत में प्रवेश किया। भारत का पश्चिमोत्तर सीमान्त अव्यवस्था का शिकार है। सभी छोटे-बडे राजतंत्र, गणतंत्र पारस्परिक ईष्या द्वेष से ग्रसित हैं। डा० राय चौधरी ने ऐसे 28 राज्यों का उल्लेख किया है। हिन्दूकुश अरवेला के मैदान में विजय प्राप्त कर जब वह हिन्दूकुश पर्वत श्रखला पार कर हिन्दू भारत में पदार्पण करता है तो सर्वप्रथम तक्षशिला नरेश अम्भि और एक अन्य नरेश शशिगुप्त जैसे देशद्रोही राजा उसका स्वागत करते हैं। 

निकाई नगर में अपनी सेना को दो भागों में बॉटकर एक दल हेकेस्टियन और पार्डिक्स के नेतृत्व में पुष्कलावती के अष्ठक को हराते हुए खैबरदेई के रास्ते सिन्धु नदी के तट पर पहुंचा। दूसरा दल सिकन्दर के नेतृत्व मे कुनार एंव स्वात नदी को दुर्गम घाटी के मार्ग से अस्पेसियन जाति से जा टकराया। यद्यपि नीसा रणराज्य ने सिकन्दर की अधीनता बिना लड़े ही स्वीकार कर ली। किन्तु शुरईयन अरसेकेनस आदि ने उसके विश्व विजेता होने के दर्प को भीषण आघात पहुंचाया। मस्सग दुर्ग में भयंकर युद्व हुआ और मस्सग सेनानियों ने उसके अहं को भीषण चोट पहुंचायी। इसके अतिरिक्त स्वाभिमानी पोरस से यहॉ तक आते-आते उस विश्व विजेता सेना को असली युद्ध का स्वाद खूब चखने को मिल चुका था। इस बीच चाणक्य के नेतृत्व में तक्षशिला के आचार्य और स्नातक मिलकर जहॉ सिकन्दर के आगे भयानक चुनौतियों का भय बढ़ा रहे थे वहीं पीछे के रास्ते पर पत्थर रख रहे थे। सिकन्दर के सैनिकों में मगध की विशाल सेना और उसके अमात्य, राक्षस को लेकर अफवाहों का दौर जारी था। चाणक्य के स्नातक वखूबी इस काम को अंजाम दे रहे थे।

सिकन्दर के सैनिकों में यह अकवाहु थी कि मगध के पास इतनी विशाल सेना थी कि जहॉ तक दृष्टि जाती थी सेना ही सेना दिखाई देती थी। और आमात्य राक्षस तो सैनिकों को जीवित ही आहार कर जाता था। अन्तत: यूनानियों का मनोबल छूट गया और वापसी का निर्णय हुआ।

सिकन्दर की वापसी का स्वागत आचार्य चाणक्य के स्नातकों ने व्यवस्थित किया था। अब तक पश्चिमोत्तर सीमान्त के राज्यों में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई जा चुकी थी और परिणाम था अस्सकोनोई, अद्रेस्तार, कठ, वसाती आदि राज्यों के साथ भयंकर सैनिक युद्ध।इन्ही मुठभेड़ों मे लगे किसी तीर के घाव ने सिकन्दर को 323 ईसा पू० में बेबीलोन में मृत्यु की नींद सुला दिया।

किन्तु आचार्य चाणक्य ने इस आक्रमण से सबक लिया था और सिकन्दर को आर्यावत की सीमा से वापस धकेलने के बाद भी यह महान स्वप्न द्रष्टा ब्राहम्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधकर एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण को कृत संकल्प था। ”इदं राष्ट्राय इदन्न ममं” के मंत्र का जाप करते हुए इस महान नेता ने 322 ई० पू० में चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिहांसन पर आरुढ़ किया। एक ओर जब सिकन्दर अपनी मृत्यु की ओर बढ रहा था तो भारत अपनी सम्पूर्ण चेतना, यौवन और उत्साह के साथ नई सुबह का स्वप्न देख रहा था। और इन दोनों ही द्रष्यों का स्वप्नद्रष्टा था-महान आचार्य चाणक्य -ब्राहम्ण चाणक्य।

मित्रों मैं आलेख के समापन की ओर आ गया हूं। मेरा विचार से अब तक आप समझ ही चुके होंगें कि क्यों ब्राहम्णों के नायक के रुप में जनतंत्रीय नेताओं और दलों को परशुराम भाते हैं चाणक्य नहीं। परशुराम विघटन के प्रतीक हैं। भेद के प्रतीक हैं और प्रतीक हैं मात्र एक जाति के, जो वोट बैंक हो सकती है किन्तु चाणक्य तो राष्ट्र की थाती हैं। चाणक्य राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक है ब्राहम्ण चाणक्य की धरोहर सम्पूर्ण राष्ट्र है कोई एक जाति नहीं किन्तु यह वोटबैंक की राजनीति के माफिक नहीं। यह तो एक राष्ट्रवादी , सांस्कृतिक विचारधारा है और जिसके कुछ खास राजनीतिक संकेत। मित्रों चाणक्य का रास्ता ही हमारा रास्ता हो सकता है। हम सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए हैं। 

याद है वेद का घोष- ”वयं राष्ट्रे जाग्रयाम: पुरोहित:” तो आइए चाणक्य जयंती का भव्य आयोजन कर राष्ट्रदेव को विनम्र प्रणाम करें।