मुखौटे …… [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

घण्टनाद ..

शंखध्वनि.. आरती
एक कतार
दो कतार….
११०१ की कतार..
११००१ की कतार
विशिष्ट कतार….
वी वी आई पी कतार
एक कुण्ड ….
दो .. तीन….
…. एक्कीसवां कुण्ड
गीले वस्त्र
गर्भगृह परिक्रमा
विग्रह दर्शन
धक्कामुक्की
रेलमपेला….
पंक्तिबद्ध यौवन
नयनबन्द …
सम्पूर्ण समर्पण
टटोलती दृष्टि,
परम्परागत पुजारी
हुंह …. !
एक मुखौटा

अजान
एक शोर
फिर कतार
वजू तकरीर
हंसते चेहरे
नये कपड़े
रंगबिरंगी टोपी
खिलखिलाते बच्चे
सेवैयां
ईदी और बच्चियां
गले मिलते लोग
हंसी खुशी,
और बस …
एक विस्फोट
हाहाकार …
बिखरा खून
चीथड़े अंग
कौम खतरे में, जिहाद
आह… !
फिर एक मुखौटा

नीरव .. शान्ति
गूंज घण्टे की
सेवा.. प्रेम सन्देश
भाईचारा.. श्वेत वस्त्र
कन्फेशन …
प्रभु लेता है …
सारे पाप अपने ऊपर
और तुम पापमुक्त ..
भावनात्मक शोषण,
फिर एक नया पाप
झूलता पालना .. धर्मप्रसार
यह भी …. !
बस एक मुखौटा

मुखौटे अभी और भी हैं
मुखौटे ही मुखौटे …
इन्हें उतारने के प्रयास में
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    जनवरी 26, 2011 @ 04:28:55

    बहुत खूब, सब कुछ कह दिया चन्द पंक्तियों में..

    प्रतिक्रिया

  2. Learn By Watch
    फरवरी 01, 2011 @ 14:03:25

    जब पढ़ना शुरू किया तब समझ नहीं आया कि क्या चल रहा है, पर जैसे जैसे आगे चला, वाह क्या अर्थ है.

    प्रतिक्रिया

  3. गीता पंडित (शमा)
    फरवरी 03, 2011 @ 08:24:12

    एक साहसिक कदम की सबसे पहले सराहना करनी होगी…कोंई तो है जो धर्म के बाह्य आडम्बर पर सशक्तता से निडर होकर अपनी लेखनी चला सकता है….अच्छा लगा पढकर…बधाई आपको श्रीकान्त जी….शुभ कामनाएँ…ऐसे ही मुखौटे उतारते रहें…गीता पंडित

    प्रतिक्रिया

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