जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

……..इस बीच परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर सहित अन्य परमाणु वैज्ञानिक विभिन्न टी0वी0 चैनलों पर आकर जिस तरह अपने परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर बयान दे रहे थे : वह आश्वस्त करने के बजाय भय अधिक पैदा कर रहे थे। वैसे भी ये सारे सरकारी लोग हैं और इनका काम सरकार की अपेक्षाओं को ही प्रसारित करना है न कि वास्तविक सुरक्षा चिंताओ को जनता के सामने रखना।…….

11 मार्च 2011 नि:सन्देह मानव सभ्यता के इतिहास में बेहद त्रासदी भरी तिथि के रूप में अंकित हो गई। प्रकृति के भीषण उत्पात भूकंप (9 मात्रक की तीव्रता वाला) तत्पश्चात् सुनामी विकिरण, ज्वालामुखी विस्फोट उसके बाद 18 मार्च तक निरन्तर आते रहे भूकंप के झटके मानो प्रकृति ‘जापान’ नामक राष्ट्र को उसके किसी अज्ञात कर्म का भीषण दण्ड दे रही हो। सारा विश्व जापान की घटनाओं से दहल उठा। सम्पूर्ण विश्व भय से कांपने लगा। इस भय का बड़ा कारण इस भीषण प्राकृतिक विपदा के पश्चात् ‘जापान’ के बिजली उत्पादक परमाणु ऊर्जा सयंत्रो का एक-एक करके ध्वस्त होते जाना और भारी मात्रा में ‘रेडियोधर्मी विकरण’ प्रसारित करना है। यह स्थिति अभी भी नियंत्रण से बाहर है। जहां एक ओर इस समय दु:ख, भय, पीड़ा की घड़ी में जापानी भाई-बन्धुओं को पहुंचने वाली सहायता में प्रकृति ने पुन: ”हिमपात” रूपी विपदा खड़ी कर दी है। वहीं जापान से प्रसारित होने वाला रेडियोधर्मी विकरण सम्पूर्ण विश्व के लिए गंभीर चुनौती एवं चिंता का विषय बन गया है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा नियामक इकाई(AIEA) के वैज्ञानिकों सहित अमेरिका तथा अन्य राष्ट्र भी जापान के परमाणु ऊर्जा विकरण को रोकने के लिए प्रयत्नशील हैं किंतु अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नही आए हैं। अब ”रेडियोधर्मी विकरण” का जिन्न जापान से बाहर निकलकर रूस के ब्लाडीवोस्टक एवं सखालिन द्वीप तक जा पहुंचा है। इसके फैलने के भय से रूस, अमेरिका, चीन सहित अनेक देशों को चिंता में डाल दिया है। अब तो तृतीय परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ध्वस्त होने की घोषणा के साथ जापान सरकार ने परमाणु विकरण मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं। 
जापान में आई सुनामी ने जिस तरह ‘जापान’ के विद्युत उत्पादक परमाणु ऊर्जा सयंत्रो को एक के बाद एक ध्वस्त करते हुए सम्पूर्ण जापान में रेडियोधर्मी विकिरण के फैलाव को जन्म दिया। वह वास्तव में परमाणु ऊर्जा के माध्यम से विकास की बैलगाड़ी को अंतरिक्षयान बनाने के स्वप्न को बड़ा धक्का है। जापान की इस घटना के बाद अमेरिका, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया सहित अन्य तमाम राष्ट्रों ने जो परमाणु ऊर्जा के माध्यम से बिजली उत्पादन कर रहे हैं : अपने परमाणु संयंत्रो की सुरक्षा व्यवस्था की पुर्नसमीक्षा प्रारम्भ कर दी है। तमाम राष्ट्रों ने फिलहाल परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को स्थगित भी कर दिया। हमारे प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में एक सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि परमाणु सयंत्रो की सुरक्षा की समीक्षा की जायेगी। इस सम्बन्ध में भारत सरकार की हुई एक बैठक के बाद आवश्यक निर्देश भी सरकार द्वारा जारी कर दिए गए। किंतु इस बीच परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर सहित अन्य परमाणु वैज्ञानिक विभिन्न टी0वी0 चैनलों पर आकर जिस तरह अपने परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर बयान दे रहे थे : वह आश्वस्त करने के बजाय भय अधिक पैदा कर रहे थे। वैसे भी ये सारे सरकारी लोग हैं और इनका काम सरकार की अपेक्षाओं को ही प्रसारित करना है न कि वास्तविक सुरक्षा चिंताओ को जनता के सामने रखना। इनके बयानो को सारांश यह था :-
1- हमारे रिएक्टरों का डिजायन ज्यादा आधुनिक और सुरक्षित है।
2- इसे निरंतर बिजली देने वाले जनरेटर काफी ऊंचाई पर रखे गए हैं जहां तक सुनामी लहरें नही पहुंच सकती।
3- ये भूकंप जोन में नही हैं।
इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि इनमें से किसी भी वैज्ञानिक ने आंकड़ो के साथ उपरोक्त तथ्य टी0वी0 चैनलों पर नहीं रखें। उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित तथ्य ध्यान देने योग्य हैं :-
1- भारत में लगभग 20 परमाणु ऊर्जा सयंत्र हैं। जिनमें कुछ कार्य कर रहे हैं व कुछ निर्माणाधीन हैं इलमें से किसी परमाणु ऊर्जा सयंत्र के निर्माण की तकनीक ”कुकीनाका” जापान से उच्च स्तर की है अथवा किसकी उससे पूर्व की। ऐसा कोई तथ्य सम्मानीय वैज्ञानिकों ने जनता के समक्ष नहीं रखा।
2- किस परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लगातार बिजली उपलब्ध कराने वाले जनरेटर कितनी ऊंचाई पर रखे हैं। इसका आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है।
3- अभी तक आई सुनामी में प्राय: 40 से 50 फिट की ऊंचाई तक की समुद्री लहरें उठी हैं। किन्तु इनकी ऊंचाई भूकंप की तीव्रता व भूमि के अन्दर कितनी गहराई पर उसका केन्द्र है, इस पर निर्भर करता है। जापान में आए भूकंप की तीव्रता 8.9 मापी गई है हालांकि कुछ वैज्ञानिक केन्द्र इसे 7.6 भी कहते हैं और इसका केन्द्र (Epicentre) भू-गर्भ में 22.5 कि.मी. अन्दर था। ऐसी स्थिति में लहरों की ऊंचाई 35 से 40 फिट तक थी। यदि तीव्रता 9.5 और भू-गर्भ में केन्द्र 10 कि.मी. होता तो ? यानी की सुनामी लहरों की ऊँचाई कभी को 100 फिट या इससे ज्यादा भी हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में बिना स्पष्ट तथ्यों के इस तरह की बातें करना ”आश्वस्त” करने के बजाय ”भय” ही ज्यादा पैदा करता है। एक बात और भी कहना चाहूंगा कि जनता के सामने उपरोक्त तथ्य रखते हुए हमारे वैज्ञानिक शायद इस तथ्य से हमारा ध्यान हटाना चाहते हैं कि ‘जापान’ 52 ऊर्जा उत्पादक परमाणु रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हुए विश्व का तीसरे पाएदान का विकसित राष्ट्र है जबकि हम उससे कहीं पीछे खड़े, परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नए खिलाड़ी और विकासशील राष्ट्र हैं। एक दूसरा बड़ा अन्तर दोनो देशों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय में जमीन-आसमान का अन्तर भी है।
4- हमारे कौन-कौन से परमाणु ऊर्जा सयंत्र किस-किस सीस्मिक जोन (भूकंप आने वाले संभावित संवेदनशील क्षेत्र) में हैं। यह तथ्य भी सम्मानीय वैज्ञानिकों ने नहीं बताए।
भारत के परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर जन चिंताओ की कुछ वाजिब वजहें और भी हैं :-
1- परमाणु ऊर्जा सम्बन्धी गोपनीय कानून जिसके कारण यह पता लगाना मुश्किल काम है कि अन्दर क्या पक रहा है ?
2- 2004 में आई सुनामी और भुज के भूकंप का इन स्थानों के निकटवर्ती परमाणु ऊर्जा सयंत्रो पर क्रमश: मद्रास एटामिक पावर स्टेशन, कुंडकुलम पावर प्लांट पर क्या प्रभाव पड़ा ? इसकी कोई भी निष्पक्ष अध्ययन रिपोर्ट जनता के सामने नही आई।
3- पोखरण (राज0) जहां हमारे परमाणु परीक्षण किए जाते रहे हैं : उसके निकटवर्ती 50 कि.मी. तक के दायरे में परमाणु विकरण की क्या स्थिति है ? इस सम्बन्ध में भी कोई निष्पक्ष अध्ययन जनता के सामने नही हैं।
4- अमी 1984 भोपाल, यूनियन कार्बाइड जैसे लीक काण्ड में प्रभावित लोगो के प्रति हमारे तंत्र ने जो संवेदनशीलता और ऐसी घटनाओं से निपटने में आवश्यक तत्वरता दिखाई। वह एक प्रश्नचिहन खड़ा करता है।
5- अभी हाल में सी.वी.सी. की नियुक्ति राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला, 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि घोटालों में जांच भी मा0 सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद हुई हो। हसन अली जैसे 96000 करोड़ के आयकर चोर और अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा सयंत्रो के हजारों-लाखों करोड़ के निर्माण ठेकों मे दलाली नही ली गई होगी। इसका विश्वास करना दिन को रात मान लेने जैसा हैं
6- परमाणु ऊर्जा सयंत्रो के निर्माण, डिजायन आदि कितने आधुनिक और तय मानकों के आधार पर मजबूती से बनाए जा रहे हैं अथवा बनाये गये हैं। यह तो किसी जनहित याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय की सक्रियता से ही स्पष्ट हो सकता हैं।
विगत प्रस्तर में मैने जापान और भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय के बीच बहुत बड़े अन्तर का प्रश्न उठाया था। यह प्रश्न यहां इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि हमारे देश के करोड़ो घरो में बिजली का एक बल्व भी जलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में परमाणु ऊर्जा किसका विकास कर रही है और किस कीमत पर ? निश्चित रूप से परमाणु ऊर्जा उद्योग धन्धो की गति तेज कर देगी किंतु इनका निर्माण व्यय आम जनता के राजस्व से व्यय किया जायेगा। तो क्यों न औद्योगिक उत्पादन में व्यय होने वाली ऊर्जा पर समस्त व्यय उद्योगो से लिया जाए क्योंकि अन्तत: तो वह लोग अपने उत्पादों के भारी मूल्यों से इसकी कीमत चुका ही लेंगे तो फिर जनता दोहरा भुगतान क्यों करे। आम जनता के घरेलू व्यय के लिए क्यों न ऊर्जा स्थानीय स्तर पर कुटीर उद्योगो की तर्ज पर उत्पन्न करने का विकल्प तलाश किया जाए। यहीं विकल्प सिंचाई, शुध्द जलापूर्ति और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपनाए जाने की आवश्यकता है।
शिवेन्द्र कुमार मिश्रा
बरेली।
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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    मार्च 29, 2011 @ 04:39:38

    बहुत अच्छा आलेख. बस पहली लाइन में कर्मों की सजा की बात ठीक नहीं लगी. हम भी ऐसा सोच सकते हैं जापान के बारे में! बाकी बिल्कुल ठीक है कि गोपनीयता के आवरण में क्या किया जा रहा है किसी को खबर नहीं. कमीशनखोरी और सुरक्षा की बात एकदम सटीक है..

    प्रतिक्रिया

  2. Ashish Shrivastava
    मार्च 29, 2011 @ 06:12:44

    क्या आप जानते है कि कोयला आधारित बिजली संयंत्र परमाणु बिजली संयंत्रो से ज्यादा विकिरण उत्सर्जित करते है ?भारत के परमाणु रिएक्टर Passice automatic convection cooloing mechanism का प्रयोग करते है जिसके लिए परमाणु रिएक्टर बंद होने की स्थिति मे किसी जनरेटर की आवश्यकता नही होती है।विकिरण से घबराने की इतनी आवश्यकता नही है, एक केला , साधारण केला खाने से भी रेडीयो विकिरण होता है।मानव शरीर मे पोटेशीयम होता है जिससे भी विकिरण निकलता है।परमाणु उर्जा आवश्यक है, इसका विकल्प नही है। हां इसे ज्यादा सुरक्षित बनाना आवश्यक है। यह ऐसी प्रक्रिया है जो हर उद्योग मे आवश्यक है।सौर ऊर्जा,पवन उर्जा इतनी ऊर्जा पैदा नही कर सकते की हम विकसित देशो के बराबर आ सकें।जल आधारित बीजली परियोजना के से लाभ से ज्यादा पर्यावरण हानी होती है।तेल नही है हमारे पास, आयात से काम चलता है। वैसे भी वह पर्यावरण के लिए हानीकारक है, ग्लोबल वार्मीग की मुख्य वजह है !कोयला आधारित संयंत्र सबसे ज्यादा हानिकारक है, पर्याबरण को क्षति, ग्लोबल वार्मिंग, विकिरण फैलाते है !आपके पास विकल्प क्या है? परमाणु उर्जा के अतिरिक्त ? गोबर गैसे ? लगाईये !http://vigyan.wordpress.com/2011/03/22/nradiation/http://vigyan.wordpress.com/2011/03/21/japandisaster/

    प्रतिक्रिया

  3. Ashish Shrivastava
    मार्च 29, 2011 @ 06:18:33

    भारत आपादाओ से निपटने विकसीत देशो से ज्यादा समर्थ है। ये आपको मजाक लगेगी लेकिन आप २००४ म दक्षिण भारत मे आयी सुनामी, या मुंबई की जुलाई २००४ की बरसात, या भूकंप से अमरीका के कैटरीना तुफान, जापान की सुनामी या न्युजीलैंड २०११ के भूकंप से तुलना किजिये।

    प्रतिक्रिया

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