जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [3] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

11 मार्च 2011 से जिस प्रबल प्राकृतिक

….भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है….

……रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है……

प्रकोप का शिकार जापान हुआ उसकी पीड़ा से माह एक माह बाद भी उबर नही पाया है। इधर फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो से हो रहे तीव्र रेडियो विकिरण रिसाव ने एक नयी प्रकार की सुरक्षा चिंताओ से विश्व को रूबरू कराया है। हालिया समाचारों के अनुसार फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो के निकटवर्ती समुद्र में रेडियोधर्मिता की मात्रा अब तक की सर्वाधिक मात्रा मापी गई। परमाणु संयंत्र से 30 किमी0 की दूरी पर समुद्र से लिए गए नमूनों में आयोडीन – 131 का स्तर उच्चतम सीमा से 23 गुना ज्यादा और सीजियम – 137 का स्तर भी अब तक का सर्वाधिक पाया गया। मेरे लिए तो आयोडीन – 131 एवं सीजियम – 137 मात्र ऐसे शब्द हैं जिनसे यह अनुमान लगा सकता हूं कि ये रेडियोधर्मी कण पर्यावरण एवं मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक घातक होंगे।जानकार.. सुधी पाठकों को चाहिए कि जनजाग्रति की दृष्टि से इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे तो अच्छा रहेगा। इस बीच भारतीय ऊर्जा निगम के निदेशक श्रेयांस चक्रवर्ती ने भारतीय परमाणु संयत्रो में अतिरिक्त सुरक्षा बढ़ाये जाने पर बल दिया है। भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है।

विगत दिनो जापान की फुकूशिमा परमाणु दुर्घटना के पश्चात प्रारम्भ हुए रेडियो विकरण रिसाव के चलते उत्पन्न होने वाली सुरक्षा चिंताओ पर कतिपय मित्रों की प्रतिक्रिया कुछ उपेक्षात्मक थी। ऐसा लगा कि मानो वह कह रहे हैं कि रेडियो विकिरण कोई गंभीर समस्या नहीं है। ऐसे मित्रो को संबोधित करते हुए मैं चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना-यूक्रेन रूस से संबंधित कुछ तथ्य हिन्दी दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट से साभार प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस रिपोर्ट के अनुसार फूकुशिमा में रेडिएशन स्तर चेरनोबिल हादसे को पार कर चुका है। 26 अप्रैल 1986 यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र के रिएक्टर-4 में हुए परमाणु हादसे में रिएक्टर की छत उड़ गई और जो आग लगी वह नौ दिनो तक धधकती रही। रिएक्टर के बाहर कंक्रीट की दीवार न होने के कारण रेडियोधर्मी मलवा वायुमण्डल में फैल गया जिसके विकिरण से 32 लोगो की मृत्यु हो गई। अगले कुछ दिनो में रेडियोधर्मी बीमारियों के कारण 39 अन्य लोग मारे गए। चेर्नोबिल परमाणु हादसा विश्व परमाणु इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना सिध्द हुई। इसका रेडियोधर्मी पदार्थ यूक्रेन, रूस और बेलारूस तक फैल गया था। प्रदूषण को रोकने के लिए 18 अरब रूबल खर्च किए गए। 1986 से 2000 तक 350450 लोगो को यूक्रेन, रूस, वेलारूस के प्रदूषित इलाको से निकालकर दूसरी जगह बसाना पड़ा। इस हादसे के बाद धरती एक बड़ा भाग प्रदूषित हो गया और हजारो लोगो को अपनी रोजी-रोटी गंवानी पड़ी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार उस हादसे में मरने वालो की संख्या-4000 तक हुई हो सकती हैं यही नहीं इस हादसे के लोगो पर जो मानसिक आघात हैं उसकी गणना नहीं की जा सकती। हादसे के बाद तमाम लोग शराबी हो गए और बहुतो ने आत्महत्या कर ली।

उक्त रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है कि योग्यता एवं क्षमता के अनुसार लोगो को इस विषय में जागरूक एवं शिक्षित करने का प्रयास करें।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।
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गीता पण्डित के साथ बातचीत……. [स्वर-साक्षात्कार] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

 नहीं लिखती हूं तो मेरे शब्द मुझे आहत करते हैं, इसलिये लिखना मेरी मजबूरी है। ऐसा विचार है कवियत्री गीता पण्डित का। कवि पिता स्व० मदनमोहन शलभ की पुत्री अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर तथा विपणन में एम बी ए शिक्षित गीता जी के प्रथम काव्य संग्रह मन तुम हरी दूब रहना की समीक्षा आप साहित्यशिल्पी पर पुस्तक चर्चा स्तम्भ के अंतर्गत पढ़ चुके हैं|
आज के सामाजिक अवमूल्यन, टूटते परिवार , बिखरते रिश्ते , प्रकृति से अंधाधुंध छेड़छाड़ , नैतिक मूल्यों में गिरावट , बदलती बेकाबू सोच , बाजारवादी गलाकाट प्रति स्पर्धा जैसे तमाम दबावों के बीच जहां पर कोमल कान्त भावनायें मन के भीतरी कोने में दुबकने को विवश हैं वहीं पर इन विषम परिस्थितियों के चलते समकालीन कविता में विचारों सरोकारों की प्रमुखता भी बढ़ गई है और भावनाओं को निजी मान लिया गया है। ऐसे में गीता पंडित की कवितायें शुष्क विचारों से कहीं अधिक भावनाओं की शीतल बयार हैं |

     प्रस्तुत है एक साहित्यकार तथा एक नारी के रूप में गीता जी से श्रीकान्त मिश्र कान्तकी बातचीत का संक्षिप्त आलेख। आप प्रश्न से सम्बन्धित पूरी बातचीत संलग्न प्लेयर से सुन भी सकते हैं। [निर्बाध बातचीत सुनने के लिये कृपया प्लेयर में बफर होने की प्रतीक्षा कर लें ]

01  ’कान्त’: गीता जी ! सबसे पहले आपके प्रथम काव्य संग्रह मन तुम हरी दूब रहना के प्रकाशन के लिये बहुत बहुत बधाई।
गीता पण्डित : आभार आपका … ….
(पूरी बात सुनें)

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02  कान्त’:  कबसे आरम्भ किया तथा इसकी प्रेरणा कैसे मिली सबसे पहली बार कब लिखा। 
गीता पण्डित : बचपन में  पापा से प्रेरणा मिली इसका परिणाम हुआ कि मैं अपनी पढ़ने वाली कापियों के पीछे लिखने लगी। बस वहीं से आरम्भ हुआ। फिर विवाह के उपरान्त एक चिड़िया के घोसले ने पूरी स्थिति ही बदल दी ……. बाद में पहली कविता के नाम पर यदि कहें तो आरकुट पर पापा को समर्पित एक कविता है …..
(पूरी बात सुनें)

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03  कान्त’:  पहले काव्य संग्रह का नाम मन तुम हरी दूब रहना इसके पीछे आपकी सोच।

गीता पण्डित :  मैं बहुत समय से स्त्री पर लिखना चाहती थी। स्त्री पर जो भी होता रहा है वह सब मुझे अन्दर तक उद्वेलित करता है। निम्न से लेकर तक उच्च वर्ग तक स्त्री किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती रही है। औरत तो प्रेम है … वह जीवन देती है फिर उसके साथ यह सब क्यों …….. 
(पूरी बात सुनें)

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04  कान्त’:  जन्म लेने के बाद से कन्या बेटी पत्नी एवं प्रेमिका और बाद में मां, नारी को भारतीय समाज में सैद्धांतिक रूप से सर्वाधिक मान्य माना जाता रहा है किन्तु साहित्यिक धरातल पर  ….. मात्र शोषित और त्याग करने वाली के रूप में निरूपित किया गया है। साहित्यकार के नाते  आपके विचार …

गीता पण्डित :  नारी धरणी कहलाती है। त्याग करना उसके स्वभाव में है। लेकिन आज की स्त्री जीना चाहती है … आज वह अबला रह्कर नहीं जीना चाहती …. आज वह चाहती है कि उसका अपना अस्तित्व हो ….

(पूरी बात सुनें)


05  कान्त’:  अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ एक पश्न ….. क्या ऐसा नहीं लगता कि अस्तित्व के नाम पर आज महिलाओं ने एक वर्ग संघर्ष खड़ा कर लिया है। वे भारतीय परिप्रेक्ष्य से भटक सी गयी हैं। 

गीता पण्डित :  आप सही कह रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन इस सबसे अलग हटना होगा अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये हमें यह तो देखना होगा कि हम किस रास्ते पर चल रहे हैं। भारतीय संस्कृति तो हमारे अन्दर रची बसी है …..  हमें स्त्री की मर्यादा को रखते हुये अपने अस्तित्व को बनाना है……….
(पूरी बात सुनें)


06  कान्त’:  गीता जी साहित्य का सम्बन्ध मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से होता है। भाषा मात्र माध्यम होती है …….. आपने अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर किया है फिर भी साहित्य के लिये अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को माध्यम क्यों चुना।


गीता पण्डित :  हिन्दी हमारी अपनी मातृ भाषा है। …. पापा कवि थे ……. हिन्दी मुझे घुट्टी में पिलायी गयी है 
(पूरी बात सुनें)



07  कान्त’:  आपको ऐसा नहीं लगा कि अंग्रेजी के साथ अभिजात्यता जुड़ी हुयी है…. कभी ऐसा विचार मन में नहीं आया …
गीता पण्डित :  नहीं कभी ऐसा विचार नहीं आया। अपनी भाषा से ही मैं हर व्यक्ति के मन तक पहुंच सकती हूं। मेरा उद्देश्य ही यही है …..

(पूरी बात सुनें)


08   कान्त’:  आपके पति प्रवीण जी भी अच्छा लेखन करते हैं। कभी व्यक्तिगत जीवन मे दो रचनाकारों के बीच का अहं ………
गीता पण्डित :    यह सम्भव है किन्तु हम दोनों के बीच कभी ऐसा नहीं हुआ … प्रवीण जी बहुत ही सुलझे हुये 
व्यक्तित्व हैं। वह स्वयं भी मेरी बहुत सहायता करते हैं ……….

(पूरी बात सुनें)


09  कान्त’:  चलते चलते …. हमने आनलाइन ब्लाग्स और इनकी भीड़ के बीच इ-साहित्यपत्रिका साहित्यशिल्पी के रूप में एक प्रयोग किया। इसके बारे में आपके सुझाव और विचार… 
गीता पण्डित :  साहित्यशिल्पी को मैं पसन्द करती हूं यह हिन्दी के लिये निष्पक्ष रूप से काम कर रही है …… मुझे इसपर लिखना इसको पढ़ना अच्छा लगता है।

(पूरी बात सुनें)


10  कान्त’:  आपकी कोई दूसरी पुस्तक या कृति आने वाली है ……
गीता पण्डित :  हां जी … दूसरी मेरी प्रकाशित होने वाली है उसका नाम है मौन पलों का स्पन्दन…..

(पूरी बात सुनें)


11  कान्त’:  बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके। हमारे पाठक भी आपके विचार जानकर प्रसन्न होंगे 
गीता पण्डित :  ………. मेरी दो लघुकथा स्त्री विषय पर ही हैं। मेरा पूरा ध्यान स्त्री पर ही जाता है …..  स्त्री ही मेरा विषय रहे ऐसी प्रार्थना आप सब हमारे लिये  करें।  कि मैं स्त्री के ऊपर ……….
कान्त’:   आपकी आगामी पुस्तक के लिये शुभकामनायें ……आपका लेखन इसी प्रकार निरन्तर रहे …… शिल्पी से वार्ता के लिये आपका बहुत बहुत आभार

(पूरी बात सुनें)

माननीय अन्नाहजारें के आंदोलन के निहितार्थ …[आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

हमारी पीढ़ी के लिए उनका होना शायद एक स्वपन जैसा है। वह लोग जिन्होने गाँधी या जयप्रकाश नारायण को नहीं देखा,उन्हे पुस्तकों में पढ़कर यह विश्वास करने में जरा अचम्भा होगा कि कैसे एक व्यक्ति के नैतिक बल के समक्ष सत्ताशीर्षो को झुकना पड़ता है और पूर्वाग्रह मुक्त चितंन वाली व्यवस्था का वादा जनता से करना पड़ता है,पर अन्ना हजारे के 5 से 9 अप्रैल 2011 तक प्रात: लगभग 10 बजे तक चलने वाले सत्याग्रही आंदोलन के परिणाम आश्चर्यजनक हैं। जो काम स्वतन्त्रता के पश्चात से आज तक नहीं हो सका वह मात्र 16 घण्टे और कुछ मिनटों में हो गया। हमें गर्व होना चाहिए कि हम इतिहास की एक घटना के साक्षी है। हमने आगत के उस सन्धिकाल का साक्षात्कार किया है जो भविष्य में ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज होने वाला है।
किन्तु ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है।

5 अप्रैल 2011 को जब वह अपने चंद साथियों सहित जन्तर-मन्तर पर नई दिल्ली में धरने पर बैठे तो शायद उन्हें उनके साथियों को यह गुमान नहीं था कि उन्हे इतना व्यापक जनसमर्थन प्राप्त होगा। उनके अनन्य सहयोगी श्री अरविन्द केजरीवाल ने टी0वी0 साक्षात्कारों में ऐसा स्वीकार भी किया है। किन्तु देखते ही देखते उनके समर्थन में जनता के सहयोग की लहर सी दौड़ गयी खास बात यह थी कि यह समर्थन स्वत: स्फूर्त था और चिराग से चिराग जलाने जैसी कुब्बत के साथ एक शहर से दूसरे शहर तक फैलता जा रहा था। जहॉ जन्तर मन्तर पर ही 200 से ज्यादा लोग उनके साथ आमरण अनशन पर बैठ चुके थे वहीं देश के कोने कोने से लोगों के अन्ना के समर्थन में बैठनें के समाचार रोज समाचार पत्रों और न्यूज चैनल की सुर्खियों में थे।

आखिर कौन थे? यह लोग…. और अन्ना के समर्थन में स्वत: स्फूर्त ढंग से क्यों खड़े हो गए?

अब जरा अपने शहर के चौराहे अथवा धरना स्थल पर बैठे लोगों के चेहरों को एक बार पुन: अपने दृष्टि पटल के समक्ष दोहराने की कोशिश करें। कोशिश उन चेहरों को भी देखने की करें जो जन्तर-मन्तर पर श्री हजारें के साथ बैठे थे।क्या उन चेहरों में आपको निराला की ’वह तोड़ती पत्थर’ वाली श्रमिक महिला दिखाई पडी? क्या उस ”आमरण अनशन” वाले समूह में कोई कामगार, रिक्शा चालक, खेतिहार मजदूर,खोम्चे वाला, किसान या मनरेगा मजदूर नजर आया? क्या आपको कोई ऐसी आदिवासी, दलित महिला नजर आई जो किसी सत्ताधीश के निरंकुश कामुक उन्माद का निरीह शिकार हो गई हो और अपनी व्यथा कह भी न पाई हो। नहीं न। ऎसा कोई भी चेहरा इन ’धरनाधीशों’ के बीच नहीं था। तो आखिर यह समर्थक किस वर्ग से आए थे?

इस समस्या के समाधान की टाईमिंग पर नजर डालें तो स्थिति कुछ-कुछ स्पष्ट हो जायेगी। आपको याद होगा कि 5 अप्रैल को धरने पर बैठे श्री हजारें की माँगों पर 7 अप्रैल तक सरकार सकारात्मक हो गई थी और जो थोड़ा गतिरोध बचा भी था वह 8 अप्रैल तक पूर्णत: समाप्त हो गया और सरकार ने श्री हजारे की लगभग सभी मॉगें मान ली। 9 तक का समय तो नोटीफिकेशन अथवा गजट न हो पाने के कारण बढ़ा। आखिर कौन सा दवाब था। यदि समाचार पत्रों की सुर्खियों पर ध्यान दें तो पायेगें कि अप्रेल माह का द्वितीय शनिवार था और 10 को रविवार। इन दिनों दिल्ली सरकार और भारत सरकार सहित लगभग सभी राज्य सरकारों निगमों आदि के कार्यालयों में अवकाश और प्राइवेट कम्पनियों के कार्यालय भी बन्द रहते हैं। सरकार को आशंका थी कि अवकाश के इन दिनों में भारी संख्या में अध्यापक बुध्दिजीवी वकील, कर्मचारी इन धरनों में शमिल हो सकते हैं और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। यही वह दबाब था जिसने सरकार को समझौता करने के लिये बाध्य कर दिया।

अब तो आप समझ गए होगें कि धरना देने वालों में उस मध्यम स्तरीय मध्यम वर्ग के लोग थे जो विभिन्न सेवा क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इनमें उपरोक्त प्रकारों के अलावा मझले व्यापारी ठेकेदार स्वतंत्र व्यवसायी भी शामिल है। इनका सपना है ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ किन्तु इसके लिए ये प्राय: सीमाऐं नहीं लाघते। यद्यपि ये पूरी तरह से नैतिक और ईमानदार लोग नहीं हैं किन्तु भ्रष्टाचार के समर्थन में तो एकदम नहीं है। यह माना कि थोड़ी बहुत बेमानी के बाबजूद भी इनमें से ज्यादातर लोग अपने लिए थोड़ी सी सुविधाऐं और थोड़ी सी भविष्य की सुरक्षा ही (पूंजी/प्रापर्टी के रूप में) जुटा पाते है। किन्तु 1990 के बाद से उदारवाद की जो बयार बही है, उसने इस वर्ग के लिए जहां कुछ अवसर (ज्यादा नौकरियों और मोटे वेतन के रूप में) उपलब्ध कराऐं। ऐशों आराम के ज्यादा और उन्मुक्त साधन उपलब्ध कराऐं किन्तु वहीं ईष्या का प्रवाह भी खोल दिया। इन्होने देखा कि इनकी हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी जहां इन्हे मिल रहा है मानहीन एवं चरित्रहीन होने का लेबल और हमेशा नौकरी या व्यवसाय पर खतरे के रूप में असुरक्षा। वहींपर इनके ही कंधो पर चढे हुए लोग हजारों लाखो करोड़ कमा रहे हैं। और सम्मानीय होने के साथ साथ सताधीश भी हैं। ऊपर से मंहगाई और मंदी ने इन्हें इस हद तक हताश कर दिया कि शायद अन्ना के बजाय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का विकल्प मौजूद होता तो इनमें से तमाम लोग वहां भी दिखाई देते

यह मध्यम वर्ग सदैव ही सत्ताभोगी और सत्ता के निकट रहना पसन्द करता है और अपने बडे दायरे और सता के अपने होने के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इन पर निर्भर रहने की मजबूरी के चलते यह सदैव सता के चुबंक से चिपका रहता है। अगर कभी व्यवस्क्था की हिलडुल के चलते इन्हे झटका लगा भी तो ये जल्दी ही लाईन के साथ चिपक जाते हैं। इस आंदोलन का एक सबक यह तथ्य भी है। शांतिभूषण एवं प्रशांत भूषण का अन्ना हजारे की ओर से ड्राफ्टिंग कमेटी में चुना जाना इसी मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व है जिसकी बाबा रामदेव ने परिवार वाद कह कर आलोचना की है।

जन लोकपाल बिल की राह में यद्यपि अभी हजारों रोड़े हैं किन्तु किसी भी सरकारी संस्थान में सरकारी लोगों के अलावा इस प्रकार के त्यागी तपस्वी जनता द्वारा स्वत: स्फूर्त ढंग से समर्थन दिए गए प्रतिनिधियों का रहना एक अच्छी शुरूआत है। लेकिन ऊपर ही ऊपर रहने से काम चलने वाला नहीं इसे नीचे के स्तर तक लाना होगा। कुछ सुझाव है:-

1- मोबाइल अदालतो का राहत गठन हो। ये अदालतें गम्भीर अपराधो में घटनास्थल पर पहुंचें। पुलिस मौके पर एफ0आई0आर0 दर्ज करें। मौके पर ही जूरी गठित हो और मौके पर ही न्यायाधीश एवं जूरी का निर्णय जो अलग-2 भी हो सकता है को शामिल किया जाए। जिला सत्र न्यायालय में इन सबके आधार पर पुन: जूरी की मदद से फैसला हो। इसके बाद अभियुक्त को दोषसिध्द अपराधी(दोषसिध्द होने पर) मान लिया जाऐ। उसे उच्च न्यायालयों में अपील का अधिकार मिले किन्तु चुनाव लड़ने,सम्पति खरीदने, विवाह अथवा बच्चे पैदा करने जैसे तमाम अधिकारों से वंचित कर दिया जाये।

2- एफ0आई0आर0 की जॉच का अधिकारी भी ऐसी जूरी को दिया जाए।

3- नगरीय विकास एवं ग्रामीण नियोजन में ऐसी ही जूरी एवं सलाहकारों को महत्व दिया जाए।

4- पाठयक्रमों में भी लोकमान्यताओं, देश में परम्परागत रूप से सम्मान्य साहित्य, आदि को सलाहकार मण्डलों की राय के अनुरूप शामिल किया जाए।

5- रक्षा मामलों में भी पूर्व सेनाध्यक्षों, जासूस एवं ऐजेसियों के पूर्व अध्यक्षों आदि के सलाहकार मण्डलों की राय को प्राथमिकता दी जाए।

ऐसे ही नागरिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में इस पध्दति को लागू किये जाने की जरूरत है। ऐसी किसी भी समिति में किसी जनप्रतिनिधि अथवा अधिकारी को जनता की ओर से शामिल न किया जाए।
माननीय अन्नाहजारें के आंदोलन के निहितार्थ कुछ ऐसे ही हैं और सरकार के सलाहकार भी इस बात को जानते है।
शिवेन्द्र कुमार मिश्र बरेली

एक नयी दिशा …….[कहानी] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

[ यह कहानी वास्तव में १९७६ में देश पर थोपे गए आपात स्थिति के दिनों का एक अनजाने इतिहास का एक टुकडा भी है और आज के चुनाव के समय राष्ट्रीय सन्दर्भ में सबक भी. विगत के कई दशकों में देश में सामाजिक राजनीतिक दृष्टि से बहुत कुछ बदला है किन्तु जो नहीं बदला है वह है राष्ट्रीय समस्याओं का यथावत रहना. यही इस लम्बी कथा का सम्बन्ध आजके परिवेश से कराता है. लोकनायक जयप्रकाश के नाम से निकले उस समय के युवा आज के लालू और मुलायम के रूप में ना जाने कितने रूप धारण कर चुके हैं ……. ]

ताउम्र हमको मारने की कोशिश में तुम रहे…

हमने भी की है जिद मगर तुमको बचाने की ।

ये इश्क या जूनून कोई रंज है न ’कान्त’
हमने भी की है जिद मगर तुमको मनाने की।

जज्बात से यूं खेलना भाया उसे बहुत …
शब्दों ने की है जिद मगर उसको बताने की

जम्हूरियत की राह पर सब शख्स चल दिये..
कम्बख्त की है जिद मगर उसको मिटाने की।


इस नगर की सड़कों पर से गुजरने वाले जन समूह की एक इकाई मैं भी हूँ। यहाँ, इन्ही गलियों और सड़कों पर विचरण करते हुये मुझे एक अन्तराल हो चुका है । अतः मेरे लिये सब पुराना लगने लगा है । नवीनता की कोई अनुभूति नहीं । रोज – रोज वही सड़कें, वही गलियाँ, उन पर लटकते हुये पोस्टर, सभी पुराने से पड़ ग़ये हैं ।

संकरी गली से निकल कर चौराहा और वहाँ तैनात यातायात सुरक्षा कर्मचारी, उसकी सफेद ड्रेस, लाल पगड़ी, यह सब देखना भी मेरी दिनचर्या का अंग बन चुका है । कुछ देर तक चौराहे पर खड़े होकर हाथ उठा देना, आने जाने वाले वाहनों को आधे अधूरे मन से नियन्त्रित करना और फिर पास वाली पान की दुकान पर बैठ कर गप्पें लगाना. कर्तव्य पालन की भावना संभवतः गपशप करने में ही निहित है । जब भी उधर से गुजरता हूँ , पुलिस विभाग की इस अकर्मण्यता पर सहज ही कष्ट होता है । इस विभाग में कितने ही कर्मचारी हैं जो मात्र स्वयं की सर्वांगीण सुरक्षा में रात दिन सन्नद्ध रहते हैं। इनकी इसी स्वनिष्ठा का स्वाद थाने में किसी भी कार्य से गये हुये व्यक्ति को निश्चित रूप से चखना पड़ता है । इन सभी के सहयोग के लिये एक वर्ग सदैव ही प्रस्तुत रहता है । ये लोग अपने-अपने क्षेत्र के बेताज बादशाह होते हैं । आखिर थानेदार के कृपा पात्र जो ठहरे । थाने के आस – पास मँडराने वाले इस विशिष्ट वर्ग का पेशा प्रायः परम्परागत होता है । राजनीतिकों और पुलिस के बीच ये सेतु, किसी भी मामले को थाने के बाहर ही रफा-दफा करने के लिये रेट बता देते हैं । शेष इने-गिने कर्मचारी जो इस विभाग द्वारा देश एवं समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं । उन्हें प्रायः निराशा ही हाथ लगती है । इस विभाग में अधिकांश लोग उन्हें उपहास के योग्य मानते हैं ।

ऐसे ही इस नगर में भ्रष्टाचार के प्रहरियों से रक्षित एवं आतंक के निविड़ में असुरक्षा की संपूर्ण भावना को संजोये हुये, मैं प्रातः उठते ही जल्दी-जल्दी तैयार होता हूँ । कहीं देर ना हो जाय यह सोचकर जैसे तैसे भोजन करता हूँ । भोजन का पर्याय मेरे जैसे स्तर पर प्रायः खिचड़ी ही होता है । हाँ मैं सौभाग्यशाली हूँ, जो कभी–कभी इसमें ही सब्जी आदि डालकर बना लेता हूँ अन्यथा आजादी के इतने दिनों बाद स्वराज में भी करोड़ों लोगों को प्रतिदिन भोजन नसीब नहीं होता है । सप्ताह में कई दिन भूखे पेट सोना अब तक उनकी नियति बना हुआ है.

गली से निकलते निकलते ही साढ़े नौ बज जाता है । लम्बे – लम्बे डग भरता हुआ तेजी से चल देता हूं । चौराहा पार करते ही रिक्शेवाला आवाज देता है ।
‘ रिक्शा बाबूजी ? ’
‘ नहीं भाई ‘ का संक्षिप्त उत्तर मैं बिना रूके ही दे देता हूँ । उसकी निराश ऑंखें दूर तक मेरा पीछा करती हैं ।

चौराहा पार हो चुका है । सामने डाक्टर भानु का नर्सिंग होम है । रोगियों के रिश्तेदारों को घुड़कती -हड़काती नर्से इधर-उधर आ जा रही हैं । डाक्टर भानु को देखते ही मैं नमस्कार करता हूँ ।
‘ नमस्ते बेटा ‘ का सम्बोधन मुझे बहुत अच्छा लगता है । डाक्टर भानु मुझे कुछ दिनों से ही जानते हैं । जब मेरी माँ गम्भीर रूप से बीमार हो गयी थी । मैं उन्हें इलाज के लिये यहीं लाया था । उन दिनों यह नसिँग होम लगभग निर्माणाधीन अवस्था में था । आज यहां कितना कुछ है । इतनी अल्पावधि में इसकी प्रगति के पीछे लोग अनेकों बाते कहते हैं ।
सोचते – सोचते ही मार्ग समाप्त हो गया है । कालेज के मेन गेट पर भेंट होती है साइकिल स्टैण्ड के चपरासी से ।
‘ आज साइकिल नहीं लाये ?
‘ नहीं, मेरी नहीं थी, जिसकी थी ले गया ।
उत्तर देकर मैं आगे बढ ज़ाता हूँ । कालेज कम्पाउण्ड में एक आम का बाग है । सारे विद्यार्थी उसे आम्रपाली कहते हैं ।
आम्रपाली में पडी बेन्चों पर आर्ट सेक्शन के विद्यार्थी बैठे हुये हैं । विज्ञान का कोई विद्यार्थी वहाँ नहीं होगा क्योंकि प्रोफेसर कटियार क्लास में पहुँच चुके हैं । लो आज भी पाँच मिनट लेट हो ही गया ।

यह पीरियड खाली है । बाहर मैदान में जाकर बैठ जाता हूँ । सुनहली धूप फैली हुयी है घास पर, बाग के ऊपर, खेतों पर, धूप का यह अनन्त विस्तार । सूर्य के दूसरी ओर देखता हूँ । स्वच्छ नीलिमा युक्त आकाश पर रूई के श्वेत गोलों की तरह छिटके हुये बादल – — लगता है किसी ने ढेर सारी कपास धुनकर फैला दी हो । दूर तक फैली हुयी हरियाली । शरद् ॠतु में हरियाली ऑंखों को कितनी सुखद लगती है ? मैं बचपन से ही प्रकृति- प्रेमी रहा हूँ ।

‘ बन्धु यहाँ किसी सब्जेक्ट पर रिसर्च हो रही है क्या ? 
आवाज सुनकर तन्द्रा भंग हो जाती है । सिर उठाकर सामने देखता हूँ । महीप मुस्कराता हुआ चला आ रहा है ।
तुम कहाँ थे भाई.. क्लास में तो नहीं.. ?’ मैं पूछता हूँ ।
‘ यार क्लास ही आ रहा था तब तक वह मिल गयी ‘ महीप मेरे पास ही घास पर बैठता हुआ उत्तर देता है ।
‘ वह …! वह कौन ? ‘ मैं प्रश्न सूचक दृष्टि से उसकी ओर देखता हूँ ।
‘अरे वही बी ए फाइनल की मिस अमिता’ महीप थोडा झेंपता हुआ बताता है ।
‘ अच्छा तो तुम बी ए में चलने वाले उपन्यास ‘अमिता’ के बारे में कह रहे हो ‘ मैं मजाक में कहता हूँ. और फिर हम दोनों हॅसने लगते हैं ।

छुट्टी हो चुकी है । महीप बालीवाल खेलने के लिये आग्रह करता है । बड़ी मुश्किल से पीछा छुडा सका हँ ।
‘ यार वह देखो टेपरिकार्डर आ रहा है ‘ दूर से आते हुये सुनील को देखकर महीप कहता है ।
‘ तुम बैठकर सुनो मैं चला ‘ महीप खिसकना चाहता है ।
‘ तुम भी कभी- कभी सुन लिया करो यार ‘ मैं महीप को पकड़ता हुआ कहता हूँ । वैसे मैं जानता हूँ महीप क्यों सुनील से भागता है ।
‘ अच्छा तो मिस्टर मजनूँ की दास्ताने लैला आज आप सुन रहे हैं ? सुनील सदा की भाँति महीप को चिढ़ाते हुये दूर से ही हाँक लगाता है ।
‘ आओ यार ! तुम भी सुनाओ क्या हाल है’ मैं उसे सम्बोधित करता हूँ.
‘ अपना क्या हम तो सदा ही मस्त रहते हैं. बस रोना है तो मेरे यार तुम्हारी सूरत पर. जब देखो दार्शनिकों की तरह सोचते ही नजर आते हैं. बैठे यहाँ हैं दिमाग किसी दूसरे लोक की घास चर रहा होता है. मै तो कहता हूँ … ‘
‘ बस बस यार तुमने तो मेरा पूरा पीरियाडिक क्लासीफिकेशन ही कर डाला ‘ मैं सुनील की बात काटते हुये कहता हूँ और हम सब हँसने लगते हैं.
‘ अच्छा तो मैं चलता हूँ फील्ड में, तुम मेरी साइकिल लेते जाना ‘ महीप साइकिल की चाबी मुझे देते हुये कहता है.
‘ और तुम’ मैं महीप से पूछता हूँ.
‘ खेलने के बाद पैदल आ जाऊंगा ‘
‘ मिस अमिता के साथ ‘ मैं चुटकी लेता हूँ.
और इसके साथ ही एक बार पुनः हँसी का झोंका सा आता है. सब खिलखिलाकर हँसने लगते हैं. बिल्कुल बच्चों जैसी निश्छल हँसी.

साईकिल लेकर चल पडा हूँ. बाग में इस समय छात्र छात्राओं की भीड़ है. कुछ छात्रों के क्लास इसी समय से प्रारम्भ होने वाले हैं. अतः वे क्लास प्रारंभ होने से पहले बाग में पडी बेन्चों पर बैठे हैं. कुल मिलाकर एक मेला सा लगा है. सभी चञ्चल चित्त प्रसन्न मन. सम्भवतः इन्हीं छात्रों की चपल भीड़ में कुछ मेरे जैसे अकेलेपन से सराबोर अन्य भी एक दो छात्र हों. हो सकता है वे समस्याओं की श्रृंखलाओं से जूझ रहे हों. इसी के फलस्वरूप उन्हें अकेलापन लगता हो. किन्तु मैं मेरी तो ऐसी कोई भी समस्या नहीं है. फिर क्यों मन इतना उदास, अकेला सा लगता है. मैं कभी भी स्थायी रूप से कुछ दिनों तक प्रसन्नचित्त नहीं रहा हूँ. छात्रों के समूह में जब सब जी खोलकर हँस रहे होते हैं, मैं देख रहा होता हूँ शून्य के उस पार अंतरिक्ष में बिलकुल अपना अस्तित्व भूलकर. कभी-कभार किसी के टोक देने पर मानो सोता सा जागता हूँ. … और फिर उनकी बातचीत हँसी मजाक के लम्बे सिलसिले में हॅसता भी हूँ मगर एक फीकी सी हँसी. एक ठण्डी सी लहर, उदासी का एक झोंका ताड़ जाते हैं सारे साथी और फलस्वरूप सबके सब एकदम से ठहर जाते हैं. एक सन्नाटा छा जाता है. सबको यकायक अपनी ओर ताकते देख‚ मैं टोकता हूँ.

‘ अरे ! क्या हो गया…. सब चुप कैसे हो गये ?’
‘ चुप क्या यार..!, तुम भी पूरे दार्शनिक हो. कभी कुछ बोलो भी क्यों ठण्डी आहें भरा करते हो प्यारे ‘ सुनील स्नेह युक्त नाराजी से कहता है.
‘ मुझे तो इनका मामला भी कुछ पुराना सा लगता है यार ‘
‘ और अब इनके पास ठण्डी आहें ही शेष हैं ‘ सुभाष की बात को महीप पूरा करता है.

इस बात पर सभी खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं. उनकी इस हँसी में मेरा भी स्वर होता है. थोडी देर के लिये उनके इस मजाक पर मैं भी प्रसन्न चित्त हो जाता हूँ. सोचते- सोचते ही आ गया हूँ नदी के पुल पर. थोडी देर के लिये रूक जाता हूँ. पुल की रेलिंग के सहारे टिक कर नदी के बीचो बीच देख रहा हूँ. पानी के बहते हुये प्रवाह से मन खोने लगता है. उदासी की एक और अनुभूति. तत्काल सिर को झटका देकर मैं विचारों से मुक्त होने का प्रयास करते हुये चल देता हूँ और तेजी से.

भोजन कर चुका हूँ. गाँधी पार्क की ओर चल पडा हूँ. शाम का अँधेरा घिरने लगा है. सड़कों पर कुहासा छाता जा रहा है. सड़कों पर भीड़ भी कम होने लगी है. पड़ोस में ही अमरूदों के बाग पर अभी-अभी सूर्यास्त हुआ है. सूर्यास्त की लाली अब तक आसमान में छायी है. जाड़े क़ी ॠतु अभी प्रारम्भ ही हुयी है, फलतः बहुत ठण्ड नहीं होती है. हाँ सड़कें अवश्य सूर्यास्त होते ही सुनसान होने लगती हैं. आवश्यक कार्य के अतिरिक्त कोई भी बाहर नहीं निकलता है. पता नहीं क्यों मैं नियमित रूप से यन्त्रचालित सा होकर चला आता हूँ यहाँ. यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है. मैं स्वयं भी जानना चाहता हँ अपनी उदासी के कारण को. मैं क्यों इतना उदास रहा करता हूँ. एक यक्षप्रश्न सा मेरे मन में उठता है. क्या दुख मुझे खाये जा रहा है.

‘ क्यों इतने उदास रहते हो ‘ अपने अंतरमन से मैं प्रश्न करता हूँ.
‘ पता नहीं यों ही ‘ अंतर के दूसर कोने से स्वर उभरता है.
‘ कभी सोचा है कि इस यों ही का क्या प्रभाव पडा है तुम्हारे ऊपर ‘
‘………’ दूसरा अंतस निरूत्तर रह जाता है.

एक अजीब सी कशमकश से मैं तिलमिला उठता हूँ. सोचता हूँ जो लोग कल तक मुझे आदर्श बताते थे. दूसरों को मुझसे प्रेरणा लेने को कहते थे. आज जब मैं समाज का कुछ कार्य नहीं कर रहा हूँ तो रास्ता चलते हुये मुँह फेर लेते हैं. क्या समाज को मात्र कार्यरत कार्यकर्ता से ही स्नेह होता है. लगता है मेरी उदासी का हल भी यहीं कहीं आसपास में ही है.

पार्क की बत्तियाँ जल चकी हैं. पश्चिम की ओर पास में ही नदी का किनारा. संगमरमर का सुन्दर चबूतरा और उस पर स्थापित गाँधी जी की धवल मूर्ति. पास में ही बैठने के लिये बेञ्चें बनी हुयी हैं. मूर्ति के बिलकुल पास वाली बेञ्च पर बैठ जाता हूँ. पश्चिम की ओर क्षितिज पर सूर्यास्त की लालिमा अब तक छायी हुयी है. उसके नीचे रात्रि की कालिमा का साम्राज्य है. ऐसी ही अर्न्तद्वन्द की कई अंधेरी परतें मेरे मष्तिष्क में भी छायी हुयी हैं. नदी के किनारे-किनारे फैक्ट्रियों की चिमनियाँ दूर तक फैली हैं. नगर में सड़कों के किनारे जलती हुयी बत्तियाँ रोशनी के धब्बों की लम्बी चमकती हुयी रेखाओं जैसी प्रतीत होती हैं. सारा नगर यहाँ से एक सुन्दर दृश्यचित्र की भाँति अनुभूत होता है. मैंने कई बार यहीं पार्क में साँध्यबेला एवं रात्रि के इन चित्रों को कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है. बचपन की एक घटना याद आती है. तब मैं बहुत छोटा था. पिताजी के साथ खेतों पर गया था. वहां काम कर रहे मजदूर एवं चारो ओर फैले पलाशवन की हरी पट्टियों को देखकर मैं मन्त्रमुग्ध था. चारो ओर फैले दृश्यो में ध्यानमग्न देखकर पिताजी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखकर पूछा.

‘ क्या देख रहे हो बेटा ‘
कुछ न समझापाने की बेबसी से मैंने अपना हाथ जंगल की ओर उठा दिया.
‘ कैसा लगता है ‘ पिताजी ने पुनः पूछा था.
‘ अच्छा बहुत अच्छा ‘ बालसुलभ संकोच के साथ मैं बड़ी कठिनाई से बोला.
‘ क्या चित्रकार या कवि बनेगा रे ‘ पिताजी मुझे चूमते हुये प्यार से बोले. और मैंने उनके कन्धे से अपना सिर टिका दिया.

उसके बाद चल पड़ा था समय का एक लम्बा सिलसिला. गांव की अमराइयों में बिना भवन के चलने वाले प्राथमिक विद्यालय से होते हुये मैं पड़ोस के कस्बे से हाईस्कूल करके इस नगर में आ गया था. पिताजी जो क्रान्तिकारी रह चुके थे. धीरे धीरे वृद्ध होने लगे थे. उन दिनों मैं इण्टरमीडियेट के प्रथम वर्ष में था जब अविनाश के सम्पर्क में आया. वह एक सामाजिक संस्था के कार्यकर्ता थे. पिताजी से प्रोत्साहन और अनुमति मिलने पर मैंने भी उस संस्था के कार्यक्रम आदि में रूचि लेना प्रारम्भ किया. धीरे धीरे अविनाश से मेरी घनिष्ठ मित्रता हो गयी थी. वह मित्रता कब अंतरंगता में परिवर्तित हो गयी‚ पता ही नहीं चला. अब वह अविनाश दादा से मेरे अनुदा बन गये थे.

यह मेरा इण्टरमीडियेट का अंतिम वर्ष था. मैं परीक्षा की तैयारी में रात दिन जुटा हुआ था. उसी समय देश में आपात स्थिति की घोषणा कर दी गयी. सारा देश मानों सकते में आ गया था. कोई कुछ समझ पाता, उससे पहले ही अधिकतर राजनेता रातोंरात बन्दी बना लिये गये. जो बच गये उन्होंने सबसे पहले भूमिगत होना उचित समझा. सामाजिक संस्थाओं पर रोक और प्रेस पर सेंसर लगा दी गयी थी. प्रारम्भ में यह सब अप्रत्याशित सा लगा. बाद में लोगों के मन में कायरता का भाव आने लगा. प्रायः यह सुना जाता हमें क्या करना सरकार कुछ भी करे. हमें अपने कार्य से कार्य होना चाहिये. और फिर हम कर भी क्या सकते हैं. चारो ओर मानों आतंक का साम्राज्य छा गया था. सरकार की बुराई करने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता था. सत्तारूढ दल के लोग अपने प्रतिद्वन्दियों को ठिकाने लगाने में जुट गये थे. जो भी मँह खोलता सीधे मीसा अथवा डी आई आर में धर लिया जाता.

इधर अनुदा से काफी दिनों से भेंट नहीं हुयी थी. हाँ इतना अवश्य पता चला था कि वह सामाजिक संस्था भी प्रतिबंधित कर दी गयी थी जिसके लिये अनुदा कार्य करते थे. फलस्वरूप उसके कार्यकर्ताओं को भी भूमिगत होना पडा था. दो चार सदस्यों से अनुदा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा श्वास भी मत निकालो. कहीं किसी ने सुन लिया तो पड़ ज़ाओगे सारी उम्र भर के लिये जेल के चक्कर में. सरकारी आतंक के कारण कोई बात तक नहीं करना चाहता था. किन्तु मुझे तो अनुदा से मिलना था. किसी ने कुछ भी ठीक न बताया था. हाँ इतना अवश्य पता लगा था कि पुलिस उनकी खोजबीन कर रही है. सम्भवतः गिरफ्तार भी हो गये हों. क्योंकि उन दिनों गिरफ्तारियाँ चुपचाप होतीं थीं. अखबार प्रतिबन्धित होने के कारण समाचार भी प्रकाशित नहीं होते थे. कई अखबारों के सम्पादक जेल में डाले जा चुके थे और उनके कार्यालयों पर ताला पड़ ग़या था. मैं सारे प्रयासों के उपरान्त भी अनुदा की कोई खबर न पा सका था. अन्त में उदास मन से चुपचाप परीक्षा की तैयारी में जुट गया.

आस पास ही कहीं बांसुरी का स्वर मुखरित होना प्रारम्भ हुआ है. मेरी तन्द्रा भंग हो जाती है. सान्ध्य बेला की लालिमा एवं रात्रि का तम अब श्वेत धवल चाँदनी में परिवर्तित हो चुके हैं. नदी में कोई नाविक धीरे धीरे नाव खेता हुआ आ रहा है. आह बाँसुरी भी क्या गजब की होती है. और वह भी चाँदनी रात में नदी के किनारे. इसी के साथ मैं उच्छ्श्वास लेता हूँ. अनुदा भी बाँसुरी बहुत अच्छी बजाया करते थे. उनकी बाँसुरी बजा करती और हम सब चुपचाप सुना करते थे. मुझे अच्छी तरह से याद है कि एक बार यहीं पार्क में अनुदा और मैं टहलते हुये आ गये थे. उस दिन इसी बेंच पर बड़ी देर तक बैठे हुये चन्द्रमा की प्रच्छाया को नदी की लहरों से संघर्ष करते हुये देखते रहे और फिर वह बोले.

‘ देख रे! चन्द्रमा की यह छाया हमारा राष्ट्र है. नदी की लहरें अंग्रेजों से विरासत में मिली हमारे देश की समस्यायें हैं. खण्डित आजादी पाकर हमारा राष्ट्र आज इसी तरह जूझ रहा है भुखमरी, भ्रष्टाचार और अंतर्राष्ट्रीय भिखारीपन से. देश के बँटवारे से उपजी कलह और फूट का दंश आज भी हमारे समाज को डस रहा है ‘
‘ वह सब छोड़ो दादा, फिलहाल बाँसुरी सुनाओ ‘ मैंने उस पल उनकी गंभीर बातों में कोई रूचि न लेते हुये कहा.
‘ अरे बुद्धू…. बाँसुरी यहाँ कहाँ ‘ उन्होने भी गाम्भीर्य से बाहर आते हुये कहा.
‘ ये रही ‘ कहते हुये मैंने अपने साथ लायी बाँसुरी उनके आगे करदी. दादा से सुनने और सीखने की जिज्ञासा से मैं उन दिनों बांसुरी हर पल अपने साथ रखता. प्रायः दादा से छिपाकर.
‘ तुम इसे इसीलिये साथ लाये थे ‘ दादा ने बांसुरी मेरे हाथ से लेते हुये कहा.
‘ जी हाँ लेकिन अब सुनाइये फटाफट ‘ मैं बच्चों जैसा अधीर होने लगा था.
‘ इतने बड़े हो गये हो और बच्चों जैसा स्वभाव नहीं बदला. मालुम है तुम्हारी आयु में चन्द्रशेखर आजाद का चिन्तन क्या था’
‘ नहीं मालुम दादा. किन्तु वह सब फिर कभी‚ इस पल तो बस बाँसुरी की बात कीजिये ‘
और वह हँस पडे थे मेरी मुद्रा देखकर और हम बेन्च से उठकर छतरीदार चबूतरे पर आकर बैठ गये थे. दादा ने खम्भे से पीठ टिकाकर बाँसुरी बजाना प्रारम्भ किया. उनकी अंगुलियां बांसुरी पर बडी तेजी से उठ गिर रही थीं. और वातावरण में मुखरित हो उठा था मेरा प्रिय गीत

ज्योति जला निज प्राण की
बाती गढ बलिदान की‚
आओ हम सब चलें उतारें
मॉ की पावन आरती
भारत माँ की आरती

बांसुरी की स्वर लहरियां नगर के दक्षिणी पश्चिमी छोर पर बने इस पार्क में गूंज उठी थीं. गांधी चबूतरे से नदी के तट तक जाने वाली सीढियों पर एकाध नाव वालों को छोड़क़र सन्नाटा ही था. दादा बांसुरी बजाते-बजाते तन्मय हो गये थे. मैं भी कुछ देर तक बांसुरी का आनन्द उठाते हुये ठण्डी फर्श पर आराम से लेट गया था. उस दिन अनुदा बडी देर तक बांसुरी बजाते रहे. सम्भवतः उनका ध्यानमग्न होने का एवं चिन्तन करने का यही तरीका था. जब उन्होंने बांसुरी बजाना बन्द किया तो मुझे फर्श पर खर्राटे भरते हुये पाया था. आज इस पल वह सब स्मरण करके हृदय में एक भावावेग अनुभव करता हूँ और पुनः सोचने लगता हूँ.

उस दिन कालेज से अपने कमरे पर वापस लौट रहा था. सूचना कार्यालय के पीछे वाली सड़क से अभी गली में मुडा ही था कि एक क्लीनशेव्ड सूटेड-बूटेड युवक भी लम्बे कदमों से लपक कर मेरे साथ चलने लगा. मैने कोई विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी. किन्तु मुझे तब आश्चर्य हुआ जब मेरा रहने का मकान पास आने पर‚ मेरे साथ ही वह भी रूक गया.

‘ किससे मिलना है आपको ‘ मैंने सहज जिज्ञासा के साथ पूछा.
‘ पहले चुपचाप अन्दर चलो फिर बात करते हैं ‘ उसने हाथ से कमरे की ओर संकेत किया.
आवाज सुनकर मैं मानो तन्द्रा से जागा था.
‘अरे …! दादा आप.. !! ‘ और मैने शीघ्रता से अन्दर आते ही कमरे का दरवाजा उढ़का दिया. मुझे अब तक अवाक् खडे देखकर उन्होंने कहा
‘ जल्दी से कुछ खाने का प्रबन्ध करो. कई दिन से खाली पेट हूँ. कुछ खा सकता इसका अवसर ही नहीं मिला ‘
‘ ओह हाँ’ मैं अब भी विस्मित था.
‘ जी अभी कुछ करता हूँ. लेकिन यह हुलिया और आपकी वह मूछें और कुर्ता-धोती कहां गये. मैं तो बिलकुल ही नहीं पहचान पाया.’ मन में बहुत सारे सवाल थे जिनका उत्तर जानने को बहुत उत्सुक था.
‘ पहले खाने की व्यवस्था करो. धीरे धीरे सब पता चल जायेगा ‘ उन्होंने समझाने की मुद्रा में कहा.

उस दिन खाने के उपरान्त दादा वहीं सो गये थे. उनका शरीर थकान से शिथिल था. मेरे बहुत पूछने पर उन्होंने केवल इतना ही बताया था कि उनसे वरिष्ठ कार्यकर्ता पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये थे. संगठन की सारी व्यवस्था का भार इस समय उनके कन्धों पर था.

‘ माँ ‘भारती’ के लिये कुछ करने का साहस है ‘ पहली बार उन्होंने मुझसे सवाल किया‚ अन्यथा अबतक तो वह मेरे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर स्वयं ही थे.
‘ मैं क्या कर सकता हूँ ‘ मैंने उनका मुंह ताकते हुये प्रतिप्रश्न पूछा.
‘ तुम… एक छात्र…. छात्र-शक्ति ही आज वह सर्वोच्च शक्ति है जो सारे देश से इस तमस को मिटा सकती है. भूल गये शहीद भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद सब छात्र ही थे जब उन सभी ने देश के स्वाभिमान एवं स्वतन्त्रता के लिये अपना जीवन दाँव पर लगा दिया. आज उसी समय के क्रान्तिकारी वयोवद्व जयप्रकाश नारायण जी ने छात्रों का फिर आह्वान किया है. उन्होंने कहा है कि छात्रों को राष्ट्र की इस भयानक त्रासदी से संघर्ष करने के लिये सर्वस्व न्यौछावर करने का समय फिर आ गया है ‘ दादा का चेहरा आवेग से तमतमा उठा था. वह धारा-प्रवाह बोले जा रहे थे.
‘छात्र-शक्ति आज भी सारे देश को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है. आवश्यकता है उसे सही दिशा की. मैं समझता हूँ जयप्रकाश जी ने आह्वान तो कर ही दिया है ‘
‘ किन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से क्या कर सकता हूँ ‘ मैंने उन्हें टोका.
‘ समय आने दो सब पता चल जायेगा. बस साहस और उत्साह बनाये रखो. तब तक पूरे मन से पढायी करो और परीक्षा की तैयारी करो ‘ दादा ने कहा था.

अगली प्रातः मुँह अंधेरे ही वह जाने के लिये तैयार हो गये थे. उन्होंने मुझसे स्टेशन तक चलने के लिये कहा.
‘ इतनी सुबह आप कहां जायेंगे ‘ मैंने रास्ते में पूछा
‘ आवश्यकता पड़ने पर ही कोई बात बतायी जा सकती है. दादा ने चेतावनी देते हुये कहा.
‘ किसी बात को जब तक आज्ञा न हो जानने की चेष्टा मत करो. जितना आदेश उतना ही कार्य करने की आवश्यकता है. पूर्ण अनुशासन से ही आज हमारे कार्य की सफलता सम्भव है ‘ पुनः समझाते हुये बोले.
‘ पूरा मन लगाकर परीक्षा में प्रथम आने का प्रयास करो. मैं यथानुसार तुमसे स्वयं सम्पर्क करता रहूँगा. अच्छा अब तुम जाओ’ ऐसा कहकर उन्होंने मुझे स्टेशन के बीच रास्ते से ही लौटा दिया और वह स्टेशन की ओर बढ ग़ये थे. मैंने भी पहली बार दादा के साथ स्टेशन तक चलने का कोई आग्रह नहीं किया. बहुत दिनों बाद पता चला कि उन्हें कहीं जाना ही नहीं था. स्टेशन तक जाना उनका पुलिस से बचने का एक तरीका था. वहां तक जाकर वह सुरक्षित रास्ते से अपने गुप्त अड्डे पर लौट आया करते थे. यदि कोई उनका पीछा भी करता तो उन्हें बाहर गया हुआ समझता. इस प्रकार वह निर्विघ्न होकर कार्य करते रहते.

नदी का जल कल कल करता हुआ बह रहा है. और धीरे धीरे वह कल कल बदल जाती है एक सामूहिक गीत में. हम सब बैठे हुये गा रहे हैं

यह कल कल छल छल बहती
क्या कहती गंगा धारा‚
युग युग से बहता आया
यह पुण्य प्रवाह….

गीत समाप्त हो चुका है. परस्पर नमस्कार करके हम सब लेट जाते हैं. ठण्डी हवा का झोंका आता है और सभी अपने अपने कम्बल में सिमटना पा्ररम्भ कर देते हैं. ठण्डी हवाओं का एक एक झोंका हमारे शरीरों में सैकड़ों बर्छियां जैसी चुभोता हुआ निकलता है. जेल में वितरित कम्बल पर्याप्त नहीं हैं. इस कडाके की ठण्ड से निबटने के लिये. और फिर इन कम्बलों में पहले से ही मौजूद मानव परोपजीवी खटमल और चीलर भी हमें रक्तदान कर‚ पुण्य कमाने का भरपूर अवसर देते हैं. जेल का वार्डन शाम को हम लोगों के साथ नींद को नहीं बन्द कर पाता है. शायद नींद के लिये जेल की बैरकों में अब कोई जगह ही नहीं बची है. सारी बैरक में लेटने के लिये पंक्तिबद्ध सीमेण्ट की कब्रें जैसी बनी हुयी हैं. उन पर लेटे हुये हम सब सम्भवतः दफनायी हुयी रूह जैसे लगते हैं. ऐसा लगता है मानों कब्रिस्तान में कोई रूहानी सम्मेलन हो रहा हो. अपनी इस उपमा पर मैं बरबस ही मुस्करा उठता हूँ. मुझे जेल आये हुये आज चौथा दिन है. हम सब लोग अपने सौभाग्य को सराह रहे हैं जो माँ भारती की आपात स्थिति से पुनः स्वतंत्रता के लिये संघर्षरत हैं.कौन भला अपनी माँ को दासता के बन्धनों में जकड़ा हुआ देख सकता है. मुझे इस बात पर भी गर्व की अनुभूति होती है कि मेरे पिता देश की स्वतंत्रता एवं अखण्डता के लिये आगे बढे थे. आज उनके ही पदचिन्हों का अनुसरण मैंने भी किया था. पिताजी मुझसे जेल में मिलने नहीं आये. हाँ उनका संदेश अवश्य बडे भैया के माध्यम से मिला. ”मुझे तुमसे ऐसी ही अपेक्षा थी. कुछ भी हो किन्तु निजी स्वार्थ के लिये सम्पूर्ण राष्ट्र को एक बार पुनः अंधेरी सुरंग में ढकेलने वाली सरकार से माफी नहीं मांगना” यह संदेश सुनाते हुये भैया की ऑंखे भरभरा आयीं थीं.

अभी-अभी जेलर आया है. वह बता रहा है कि अनुदा भी पकड़े जा चके हैं. मुझपर इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है. हमारी मनोवृत्तियाँ बदल चुकी हैं. दादा के आते ही हम सब ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया था. शायद उनके आने और मिलने से मुझे अच्छा नहीं लगा था. आन्दोलन जारी रहने के लिये उनका बाहर होना बहुत आवश्यक था. लेकिन हमारे ग्रुप का सत्याग्रह सफल होने से पुलिस बौखला उठी थी. उसे अनुदा के द्वारा आंदोलन के जारी रहने का पता चल चुका था. अतः उसने अविनाश दादा को पकड़ने का एक जोरदार अभियान छेड़ दिया था. अंततः एक दिन किसी मुखबिर की सूचना पर दादा पुलिस की गिरफ्त में आ ही गये थे.

ओस पड़ने से स्वेटर गीला हो चुका है. मैं बेन्च पर से उठकर छतदार चबूतरे पर बैठ जाता हूँ. सम्भवतः रात्रि अभी अधिक नहीं हुयी होगी. जाड़ों में लोग जल्दी ही सोने के लिये चले जाते हैं. फलतः सन्नाटा छाया हुआ है. मैं पुनः खो जाता हूँ वैचारिक झंझावातों में.

बार्षिक परीक्षा के लिये सशर्त जमानत मिली.परीक्षा के दिवस छोड़क़र नगर से चालीस किलोमीटर की परिधि में प्रवेश निषिद्ध. जेल से बाहर आते ही कार्य में जुट जाने का निर्देश मिला. अविनाश दादा का दायित्व अब विजय भैया के पास था. भूमिगत रूप से आंदोलन चलाने में उन्हें मानों महारथ हासिल थी. अब उनसे वही स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त होने लगा था. उनके निर्देशानसार ही जुट गया था छात्र-शक्ति को संगठित करने में. परीक्षा देनी थी और भूमिगत रूप से आंदोलन भी सक्रिय रखना था. मेरे लिये यही निर्देश था. पुलिस की आंखो में चकमा देना अब कठिन था क्योंकि वह सब मुझे पहचानते थे. इतना ही नहीं वरन् परीक्षा वाले दिवस तो वह मेरा पीछा बस स्टैण्ड तक करते. लेकिन जेल में रहते हुये हमारी सारी रूप रेखा पहले ही बन चुकी थी. स्वयं को गुप्त रखते हुये कार्य करना अब मेरे लिये उतना कठिन नहीं था. क्योंकि जितना पुलिस मुझे पहचानती थी उतना ही मैं भी उन्हें पहचानता था. विशिष्ट व्यक्तियों के गुप्त कार्यक्रम होने पर यह बहुत उपयोगी होता था. सादे कपड़ों में पुलिस का कोई व्यक्ति आस पास तो नहीं है‚ यह देखना अब मेरा दायित्व था. जैसे तैसे परीक्षा समाप्त हुयी. उसके उपरान्त मुझे दूसरे स्थान पर कार्य करने का निर्देश मिला. नये स्थान पर पुलिस के पहचानने का संकट समाप्त हो गया था.

शनैः शनैः काल चक्र ने पलटा खाया था. हम लोग आंदोलन बन्द करके जनजागरण अभियान में पूरी शक्ति से जुट गये थे. सारा दिन सड़क के मुख्य मार्ग को छोड़कर पैदल या अन्यान्य सवारियों से किसी भी परिचय के सहारे गांव गांव टिकते हुये रात्रि में अपनी बात लोगों के कानों में डालते हुये, प्रातः मुँह अधेरे उस गांव से निकल जाते थे. बाद में अगले दिन पता चलता कि पुलिस ने छापा मारा. इस तरह लुका छिपी का खेल कब तक चलेगा मालुम नहीं था. सम्भवतः स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला आंदोलन था जब लगभग सभी बड़े नेता जेल में बन्द थे. निचले एवं मध्यम स्तर के कार्यकर्ता स्वविवेक से अपना सर्वस्व भूल कर यज्ञ की समिधा सदृश, राष्ट्रीय स्वतंत्रता हेतु हुत हो रहे थे.

उसी समय मानवता को त्राण मिलने का एक रास्ता निकला. सरकार के किसी चाटुकार ने यह सलाह दी कि इस समय चुनाव कराने से सरकार भारी बहुमत के साथ दूसरी बार सत्ता में वापस आ सकती है. तत्कालीन मदांध सरकार ने आंदोलन के दबाब और जनता में फैले विरोध से मुक्त होने के लिये ऐसा विश्वास करके चुनाव का निर्णय ले लिया. कहते हैं जब सियार की मौत होती है तो वह शहर की ओर भागता है. शायद इस कहावत का परिवर्तन चुनाव के बाद इस प्रकार हुआ था कि अलोकप्रिय शासन की जब मौत होती है तो वह जनता की तरफ यानी चुनाव की तरफ भागता है. चुनावों में सत्तारूढ दल की बुरी तरह पराजय हुयी थी. सारे देश में प्रसन्नता की लहर दौड़ ग़यी थी.

इसी के साथ पूरे देश में राजनीतिक कायाकल्प हो गया था. कल तक जो जेल में बन्द थे आज सरकार में शामिल होने के लिये वार्ता कर रहे थे. सत्तारूढ दल के सभी चाटुकारों ने अपनी निष्ठा रातोंरात बदल दी थी. अब वे सभी जीते हुये नेताओं के परचम पकड़े हुये सबसे आगे की पंक्ति में थे. सभी बड़े नेताओं का आग्रह लोकनायक जयप्रकाश जी से सरकार में आने का था जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता किन्तु दृढता के साथ ठुकरा दिया था. सच ही है जिन्हें जनजन के हृदय में स्वयमेव ही स्थान मिला हो उन्हें किसी अन्य स्थान पर बैठने की आवश्यकता कदापि नहीं.
अस्तु अनुदा भी जेल से छूटकर आ गये थे. वह बुरी तरह से अस्वस्थ थे. स्वस्थ होते ही उन्हें संगठन के कार्य से अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया गया. इस बीच मेरे पिताजी का भी देहान्त हो गया था. आर्थिक दायित्व का राक्षस मेरे सामने मुंह बाये खडा था. पढायी चौपट हो चुकी थी. और इसी के साथ प्रारम्भ हुयी थी मेरे अकेलेपन की अनुभूति. मुझे लग रहा था कि कहीं कुछ खो गया है. अकेलेपन के इसी अहसास से मैं स्वयं में ही सिमटने लगा था. प्रायः अनुभव करता कि अब मैं अप्रासंगिक हो गया हूँ. जहां भी जाता लोग सत्ता के गलियारों की बात करते मिलते. नयी सरकार ने छह महीने तक जेल में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का स्थान देने की घोषणा कर‚ अपने दायित्व की इतिश्री मानली. राजनीतिक आपाधापी के नये दौर में वास्तविक एवं जुझारू उन कार्यकर्ताओं को वह भी भूल गयी जिन्होंने अपना वर्तमान और भविष्य दोनों राष्ट्रयज्ञ में हुत कर दिया था. ये वह स्वाभिमानी लोग थे जो अपने लिये प्रमाण पत्र जुटाना अपमान समझते थे. अपने राष्ट्र के लिये उन्होंने निस्वार्थ भाव से तन मन धन और जीवन बिना किसी भय संकोच के अबिलम्ब झोंक दिया था. वहीं पर जिन लोगों ने आपात स्थिति में भूमिगत होकर जूझ रहे कार्यकर्ताओं के लिये अपने दरवाजे भी बन्द कर लिये थे‚ अब नयी सरकार के सर्वेसर्वा थे. बडे नेताओं की गणेश परिक्रमा करने वाले इन लोगों को राजनीति के गलियारों की अच्छी जानकारी थी. जेल से निकले अधिकान्श नेताओं का रिश्ता भी उन्हीं लोगों से था जो आपात स्थिति में चूहे की तरह बिल में जा घुसे थे अथवा माफीनामें जेब में लिये घूमते रहे थे.

ऐसे माहौल में राजनीति की उठापटक से बेखबर मैं एक छात्र‚ दिशाहीन सा रेगिस्तान में खडा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था यहां से जाना कहां है. मैंने एक दिन उन सज्जन से मिलने के लिये पत्र लिखा, जो आपात स्थिति में मेरी वजह से कई बार जेल जाने से बाल बाल बचे थे. बहुत आभार और मित्र भाव मानते थे उन दिनों. आज की सरकार में वरिष्ठ मन्त्री थे. उत्तर मन्त्री जी के सहायक से मिला कि मन्त्री जी जब भी राजधानी में होते हैं प्रातः जनता दरबार में सभी से मिलते हैं. आगे मैंने जाने और उनसे मिलने की आवश्यकता ही नहीं अनुभव की. उन्हीं दिनों बडे भैया ने एक दुकान में कुछ कार्य करना प्रारम्भ किया और मुझसे उनके शब्दों में ‘नेतागीरी’ का चक्कर छोड़ दुबारा पढ़ायी करने को कहा. तबसे पढ़ायी चल रही है किन्तु मैं हर पल अपने को छला सा ठगा सा दिशाहीन पाता हूँ. सोचता हूँ क्या है दिशा मेरे जैसे युवकों की. क्या यही है हमारा भारत जिसके लिये लोकनायक ने हमारा आह्वान किया था. आज स्वतंत्रता की सुखद अनभूति का अर्थ किसके लिये है मुझ जैसे जनसाधारण को या रातोंरात पाला बदलने वाले सत्ता के गलियारों में काई की तरह चिपके हुये‚ गणेश परिक्रमा करने में चतुर नेताओं को … ?

सोचते-सोचते मन खिन्न हो उठा है. रात्रि बहुत हो चुकी है शायद. चलना चाहिये सोचकर उठता हूँ. तभी….
‘आतू…. अतुलेश’ कानों में स्वर पड़ता है. मैं चौंक कर पार्क की अंधेरी वीथी की ओर देखने का प्रयास करता हूँ. उधर से आती छाया ने भी शायद मुझे देख लिया है. लम्बे डग भरते हुये देखकर मैं उन्हें पहचान लेता हूँ. किन्तु आज मैं सदा की भांति चिल्लाकर उनका स्वागत नहीं करता हूँ. बस चुपचाप खड़ा रहता हूँ. अपलक उन्हें निहारता रहता हूँ. दादा आगे बढक़र मेरा कन्धा पकड़ कर हिलाते हैं.

‘क्यों क्या हो गया तुझे’ और वह प्यार से कन्धा थपथपाने लगते हैं.
‘दादा’ मैं भर्राये कण्ठ से बडी मुश्किल से बोल पाता हूँ.
‘ मैं नयी जगह पहुंचा ही था कि विजय जी का पत्र तेरे बारे में, विस्तार से मिला. अभी थोडी देर पहले ही ट्रेन से पहुंचा हूँ. मुझे मालुम था तू यदि अपने कमरे पर नहीं होगा तो यहीं मिलेगा. और फिर यह स्थान तो आपात स्थिति के हमारे कई गुप्त ठिकानों में से एक है ‘ वह बताने लगते हैं.
‘ क्या हो गया..? तू कुछ बोलता क्यों नहीं. हो जाय बांसुरी ‘ उनका ध्यान फिर मेरी चुप्पी पर जाता है.
‘ नहीं दादा अब बहुत रात हो गयी है ‘ मैं ठण्डे मन से उत्तर देता हूँ.
‘ अच्छा एक बात सुनेगा तू ‘ वह ध्यान से मेरा चेहरा देखते हुये कहते हैं.
‘ जी ‘ मैं उनकी ओर निर्भाव देखता हूँ.
‘मुझे संगठन की ओर से वापस यहीं कार्य करने का निर्देश मिला है ‘
‘ ओह दादा सच’ मैं इस अप्रत्याशित प्रसन्नता को अपने स्वर में मिला हुआ पाता हूँ.
‘ तो फिर हो जाय बांसुरी ‘ मैं अतिउत्साहित हो उठता हूँ.
‘ नहीं रे वह तो मैंने तुझे उत्साहित करने के लिये कहा था. अन्यथा बांसुरी नहीं है मेरे पास. मैंने काफी दिनों से बजाना ही छोड़ दिया है’ जीवन में पहली बार अपने आदर्श अनुदा को नैराश्य के भाव में देखता हूँ.
‘ चलें आतू कल से बहुत कार्य है. जुट जाना है ‘ वह आगे बढ लेते हैं.
‘ अब क्या दादा अब तो अपनी सरकार है. अब कौन सा पहले की तरह जन जागरण करना है या पुलिस से लुका छिपी करनी है’ मैं सहज भाव से कहता हूँ.
‘ नहीं रे राष्ट्रकार्य कभी समाप्त नहीं होता. बस कार्य के सन्दर्भ बदल जाते हैं. मात्र सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा. जब तक लोगों का चिन्तन नहीं बदलेगा सारी सम्स्यायें वैसी की वैसी रहेंगी ‘ दादा का उत्तर है.
‘ तो फिर हमने संघर्ष क्यों किया’ मैं जिज्ञासा प्रकट करता हूँ.
‘ तब देश के लोकतांत्रिक अस्तित्व को खतरा था. आज देश की सारी व्यवस्था को भ्रष्ट लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक मूल्यों एवं परंपराओं से खतरा है’ दादा अब गंभीर हो चले हैं.
‘ तो इस नयी लडाई में मेरा क्या हिस्सा होगा’ मैं पूछता हूँ.
‘ अपनी शिक्षा संपूर्ण करना ताकि तुम आत्मिक रूप से जाग्रत होकर इस देश को नयी दिशा दे सको ‘ मैं दादा की ओर ध्यान से देखता हूँ. किन्तु लम्बे ड़ग भरते हुये वह अवस्थातीत लगते हैं.
‘ आज पुनः छात्र शक्ति का ही आह्वान करना होगा. भ्रष्ट राजनीति के इस कीचड़ को अपने पौरूष से वही मुक्त कर सकती है ‘ दादा अपने आप से बातें करते हुये आगे बढे ज़ा रहे हैं.

उनकी चाल में तेजी आ गयी है. ऐसा लगता है कि अदृश्य लक्ष्य तक पहुँचने की शीघ्रता में वह दौडे चले जा रहे हैं. उनका अनुसरण करते हुये मैं स्वयं में अपूर्व ऊर्जा का अनुभव कर रहा हूँ. लगता है रेगिस्तान की मरीचिका में भटकते हुये मुझे एक नयी दिशा मिल गयी है. एक मरूद्यान का स्पष्ट बिम्ब मेरे सामने है. वह दूर प्रतीत होकर भी अब अप्राप्य नहीं लगता है.

अन्ना, अनुपम और आन्दोलन के सबक ……. [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

[मित्रो अन्ना हजारे का अनशन समाप्त हो चुका है। भारतीय इतिहास में पहली बार….निरन्तर निरंकुश होते जा रहे राजनीतिकों को प्रजातन्त्र की वास्तविक शक्ति एवं उनकी अपनी औकात का पता चला है। किन्तु पहली सीढ़ी मात्र है। सम्पूर्ण घटनाक्रम के आलोक में प्रस्तुत है शिवेन्द्र मिश्र का यह आलेख … कृपया अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत करायें.] 

05 – 09 अप्रेल -2011सर्वप्रथम अन्ना के साहस को प्रणाम, भारतीय ’जन’ के चरणों में नमन, गण को धिक्कार और भारतीय मन को कोटिशः साधुवाद। अन्ना। आप हमारे लिए प्रखर राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं जो अपने प्रतिनिधियों को शर्मनाक कार्य करते हुए देखता है तो साइबर पानी में डूबकर मर जाना चाहता है। (क्योंकि वास्तविक पानी तो इन नेताओं ने गरीब की आँखों और भ्रष्टाचार की नदी के अलावा छोड़ा ही कहाँ है!) अन्ना आपने नागरिकों का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है। अन्ना ’वन्दे मातरम्’ ’भारत माता की जय’ इन उद्घोषों से आपका स्वागत है।

अनुपम खेर ने एक बयान दिया और शुरू हो गई अन्ना की जूती से मार खाए नेताओं की अपनी खाल बचाने की चिकचिक। अभी वही चीख रहे हैं जिन्हें जूती सीधी पड़ी है किंतु चीखेंगे सभी जरा धीरे-धीरे थम-थम के। बस देखते जाइये।

अनुपम के बहाने कुछ प्रश्न हवा में है। अनुपम का कथित बयान जो मीडिया के माध्यम से जानकारी में आया है, वह है – यदि संविधान में बदलाव जरूरी है तो किया जाना चाहिए। ’’मैं समझता हूँ इस बहस को आगे बढ़ाना चाहिए।’’ मैं इसे आगे बढ़ाते हुए कुछ प्रश्न रख रहा हूँ: आप अवश्य सहभाग करेंगे:-

1- संविधान की प्रस्तावना पढ़िए ’’हम’’ भारत के लोग – – – एतद्द्वारा संविधान को आत्मर्पित, अध्यर्पित एवं समर्पित करते हैं।’’

बड़ा कौन ? हम भारत के लोग अर्थात् जनता ? या संविधान ?

2- क्या संविधान स्वयं को बदल डालने का अधिकार जनता को नही देता? यदि नहीं तो संविधान संशोधन क्यों? यह भी तो संविधान का बदलाव ही है? एक खास बात कहना चाहूँगा कि संविधान परिवर्तन न होता तो इन शुतुरमुर्गी सेकुलर नेताओं का क्या होता क्योंकि ’’धर्म निरपेक्ष’’ शब्द संविधान परिवर्तन की देन है।

3- यदि अनुपम खेर का बयान संविधान का अपमान है तो इस पर विचार करने का अधिकार किसका होना चाहिए?

4- संविधान अथवा संवैधानिक विधि की समीक्षा का अधिकार मा. सर्वोच्च न्यायालय को है जबकि विधायिकाओं का गठन संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्थाओं के अन्तर्गत होता है तो ’’संविधान के अपमान’’ के प्रश्न पर विचार करने का अधिकार किसका होना चाहिए विधायिका का अथवा सर्वोच्च न्यायालय का?

5- याद करिए कि हिटलर एक चुना हुआ प्रतिनिधि था और पाकिस्तान के तमाम तानाशाहों ने सत्ता हथियाने के बाद जनतांत्रिक माध्यम का उपयोग करते हुए अपने चयन को वैध ठहराया। तो कहीं महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा अनुपम खैर के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला बनाना इस बात का संकेत तो नहीं कि भारतीय राजनीति व्यक्तिगत/संस्थागत तानाशाही की तरफ बढ़ रही है।

6- भारत में कौन सा तंत्र है? लोकतंत्र, जनतंत्र अथवा प्रजातंत्र। मेरी समझ में तो नेता जिसे जनता कहते हैं वह तो प्रजातंत्र का हिस्सा है। किसी पार्टी अथवा नेता की ’’परजा’’ दलित है तो कहीं यादव, कहीं सेकुलर तो कहीं हिन्दू। इसी के दम पर आपस में सांठ-गांठ करके (गठबंधन बनाकर) कहते हैं हमें तो जनता ने चुना है अतः हम पर उँगली नहीं उठा सकते। क्या यह ठीक है?

7- क्या उपरोक्त ’’जन’’ अर्थात ’’परजा’’ को तंत्र को समझने की समझ है। मैं कहता हूँ बिल्कुल नहीं शायद इसी को अरस्तू ने कहा था ’’जनता तो भेड़ है।’’ जनतंत्र अथवा लोकतंत्र का जन अथवा लोक तो अन्ना हजारे के साथ हैं, गांधी, एनीबेसेन्ट और तिलक के साथ था। विवेकानन्द के साथ था। किंतु इन्हें तो ’’परजा’’ ने किसी संसद अथवा विधानसभा के लिए नहीं चुना तो क्या विधायक जी अथवा सांसद जी कानून की बाध्यता पैदा कर नाम के आगे ’’माननीय’’ लगवा लेंने से गांधी या अन्ना हजारे से बड़े हो गए।

कृपया इन प्रश्नों पर बहस छेड़कर इसे आगे बढ़ाए।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली

एक नयी सुबह की अनुभूति … किन्तु भ्रष्टाचार से वास्तविक मुक्ति के लिये समाज निर्माण का कार्य प्रत्येक को अपने ही परिवेश से करना होगा।

जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [2] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

……..क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?
…….

अन्तत: सुदृढ़ जिजीविषा के ‘जापान’ ने हार मानकर फुकूशिमा परमाणु संयंत्र को बंद करने का निर्णय ले ही लिया। चार परमाणु रिएक्टरों को तत्काल बंद करने का निर्णय लिया गया जबकि शेष दो परमाणु रिएक्टरों को बंद करने का निर्णय स्थानीय विचार विमर्श के पश्चात लिया जायेगा। यह निर्णय प्लांट आपरेटर टेपको इलेक्ट्रिक पावर कंपनी ने (टेपको) अपने 66 वर्षीय अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण के कारण बीमार पड़ने के बाद लिया। इस बीच संयंत्र के पास के समुद्र के जल में रेडियोधर्मी आयोडीन की मात्रा स्वीकृत सीमा से बढ़कर 4385 गुणा ज्यादा हो गई। वहीं आई.ए.ई.ए. ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षित रेडियोधर्मी सीमाओं का दायरा बढ़ाकर 40 किमी0 कर देने की सिफारिश की। ये सारी सूचनाएं 31 मार्च/1 अप्रैल के समाचार पत्रों के जापान विषयक समाचारों का हिस्सा है।

यहां पर कुछ तथ्य मेरी दिलचस्पी जगाते हैं। जापान सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी से अधिक पीड़ित हुआ या मानवकृत विकास के असुरक्षित संसाधनों से टेपको के अध्यक्ष के बीमार पड़ने के बाद संयंत्रों को बंद करने का निर्णय लिया गया। इस दुर्घटना के एक साल बाद जापान के फुकूशिमा प्रांत की स्थिति अर्थात वहां की उपज, जलवायु और मानवीय जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव भी विकिरण के व्यापक प्रभावों के असर को व्याख्यायित करेगा। मेरे इसी विषय पर पिछले पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक मित्र ने लिखा है कि विकिरण से घबराने की जरूरत नहीं है। साधारण केला खाने से भी विकिरण हो सकता है। मित्र सही हो सकते हैं। यह विशेषज्ञों का क्षेत्र है और मैं विशेषज्ञ नहीं। किंतु मैं ”आम जन की” सुरक्षा को लेकर एक बार फिर यह कहना चाहूंगा कि उदाहरण आपके सामने है। आपने रेडियो विकिरण के विषय में हमारी चिंताओ को समझकर अपनी प्रतिक्रिया दी किंतु क्या इतने बड़े परमाणु हादसे के बाद भी ”रेडियो विकिरण” के शोर के बीच हमारे तंत्र ने आम जन को ”रेडियो विकिरण” के विषय में जागरूक करने की कोशिश की ? क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?

जहां तक परमाणु ऊर्जा और विकास की बात है तो वह अध्याय माननीय संसद द्वारा स्वीकृति देने के बाद बंद हो चुका है। किंतु परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न बिजली के महंगे उत्पादन का व्यय भी आम राजस्व से लिया जाए क्या इस पर बहस नहीं होनी चाहिए। क्या आम उपभोक्ता जरूरत की बिजली, सिंचाई और पर्यावरण की चिंता स्थानीय स्तर पर किए जाने की सोच पिछड़ापन है। क्या इसदेश में सभी पशु द्वारा चालित वाहन और उत्पादन एवं परिवहन के साधनों में पशुओं का प्रयोग बन्द हो गया है ? नहीं न। ऐसी कदापि नहीं हुआ है और विकास की तीव्र से तीव्र गति भी एक शताब्दी तक इसे समाप्त नहीं कर पायेगी। इसका अभिप्राय हुआ कि देश में बेटी के दहेज के लिए हेलिकाप्टर और 1-1 करोड़ रू0 भेंट देने वाले लोग हैं तो बेटियों के विवाह के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर रहने वाले भी। 5-7 करोड़ की कारों की अग्रिम बुकिंग कराने वाले लोग हैं तो बेटी को सरकारी साइकिल प्राप्त कराने के लिए लम्बी लाइनें लगाने व सिफारिशें कराने वाले भी। अगर ऐसे लोगो के लिए बिजली स्थानीय स्तर पर गोबर गैस वायु ऊर्जा या अन्य साधनों से सस्ते दर पर उपलब्ध कराई जाए तो क्या बुराई है ? इससे परमाणु ऊर्जा से होने वाला विकास कहां प्रभावित होता है ? इसी तरह से स्थानीय नदियों एवं बड़ी नदियों को जोड़कर गांवो में तालाब और कुओं की संख्या बढ़ाकर आम आदमी के लिए सिंचाई और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सके तो इसमें क्या बुरी बात है। शेर-चीते के विलुप्तीकरण की चिंता तो सारी दुनिया कर रही है क्योंकि उसमें व्यापार है, पैसा है और विलासिता भी। किंतु गांव की गौरेया और मैना के लुप्त होने की चिंता कौन करेगा ? आपको लगे मैं बहक गया हूं नहीं। मैं तो केवल विकास के मानको के मध्य यथासंभव संतुलन स्थापित करने की बात कर रहा हूँ।

अब मैं पुन: परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा संबंधी प्रश्न पर वापस लौटता हूं। हमारे एक मित्र ने कहा है कि भारत के परमाणु रिएक्टरों Passive automatic convection cooling mechanism का प्रयोग करते हैं जिसके लिए परमाणु रिएक्टर बंद होने की स्थिति में किसी जनरेटर की आवश्यकता नहीं होती। यह भी विशेषज्ञता का क्षेत्र है अत: विशेषज्ञों की राय का ही आदर किया जाना चाहिए। किंतु कतिपय प्रश्न आपके समक्ष अवश्य करना चाहूंगा :-

1- कुल कितने लाख करोड के परमाणु ठेके हुए हैं और इनमे पूर्ण पारदर्शिता बरती गई हैं

2- क्या कोई सक्षम संस्थान यह उत्तरदायित्व लेने को तैयार है कि इनमें किसी प्रकार की दलाली नहीं ली गई है।

3- क्या निर्माण आई.ए.र्इ्र.ए. अथवा भारत सरकार द्वारा तय अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।

4- और क्या परमाणु आपदा की स्थिति में हम तदनुरूप आपदा प्रबंधन मे सक्षम है ?

इन मुद्दों पर क्यों चर्चा नहीं होनी चाहिए। जहां तक आपदा प्रबंधन की कुशलता का प्रश्न है तो हम आत्म सम्मोहित लोग हैं अन्यथा लाटूर, टिहरी में आए भूकंपो को भूले नहीं होते जहां भारी मानवीय क्षति हुई थी। भुज के भूकंप में भी मानवीय क्षति कम नही हुई थी अपितु सराहना करनी चाहिए नरेन्द्र मोदी के विकास और पुननिर्माण की योग्यता की। एक और समाचार जो शायद हर सवेंदनशील व्यक्ति को भयभीत करेगा और वह यह कि ”हम विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्रो में नं0 चार पर है” अगर अभी हम न भूले हों तो याद होगा कि बिहार की बाढ़ में कुछ वर्ष पूर्व एक जिलाधिकारी अपने राहत कार्यों के लिए विश्व प्रसिध्द ”टाइम” पत्रिका के कवर पेज पर छपे थे और बाद में उसी बाढ़ राहत घोटाले में जेल गए। समस्या परमाणु ऊर्जा नहीं है अपितु झोल है आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हम लोग जिनके लिए यह भ्रष्ट व्यवस्था समर्पित है। हम एक छोटे राष्ट्र नहीं है। हम हैं 121 करोड़ की भारी भरकम आबादी वाले विकासशील देश। जहां छोटी सी गलती भारी तबाही लाती है। यहां आज भी लोग भूख से मरते हैं। ऐसे में परमाणु सुरक्षा की चिंताए पारदर्शी नीति से ही कम की जा सकती हैं।

मैं समाप्ति से पूर्व एक विषय और विचारार्थ रखना चाहूंगा। उद्योगों में सुरक्षा के मानक किस आधार पर तय होने चाहिए ? आम मानवीय क्षति पर्यावरण को हानि, राजस्व का जनता के हित में लाभकारी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा। (इसमें स्थानीय लोककला, संस्कृति, एवं भाषा आदि की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए) को वरीयता मिलनी चाहिए अथवा उद्योगपतियों-पूंजीपतियों की जान एवं उनके लाभ की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए। जापान के विषय में विचार करें तो टेपको कम्पनी ने अपने अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण की चपेट में आने के बाद परमाणु संयंत्रो को ठिकाने लगाने का निर्णय लिया अन्यथा तमाम कर्मचारियों की जान जोखिम में डालकर भी रिएक्टरों को ठण्डा करने का प्रयास जारी था। साथ ही यह भी संज्ञान लेना होगा कि आई.ए.ई.ए. 2008 में ही इन परमाणु संयंत्रो के कालबाधित हो जाने और उन्हें बंद करने का परामर्श दे चुकी थी फिर भी उन्हें आम जापानी नागरिक एवं राष्ट्र के मूल्य पर चलाए रखने की अनुमति दी गई। यदि जापान जैसे राष्ट्र में यह संभव हो तो भारत में जहां रोज एक नया घोटाला खुलता है वहां क्या संभव नहीं। अत: परमाणु संयंत्रों के विषय में सुरक्षा चिंताओं को शायद हल्के में लेना ठीक नहीं।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।