जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [2] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

……..क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?
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अन्तत: सुदृढ़ जिजीविषा के ‘जापान’ ने हार मानकर फुकूशिमा परमाणु संयंत्र को बंद करने का निर्णय ले ही लिया। चार परमाणु रिएक्टरों को तत्काल बंद करने का निर्णय लिया गया जबकि शेष दो परमाणु रिएक्टरों को बंद करने का निर्णय स्थानीय विचार विमर्श के पश्चात लिया जायेगा। यह निर्णय प्लांट आपरेटर टेपको इलेक्ट्रिक पावर कंपनी ने (टेपको) अपने 66 वर्षीय अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण के कारण बीमार पड़ने के बाद लिया। इस बीच संयंत्र के पास के समुद्र के जल में रेडियोधर्मी आयोडीन की मात्रा स्वीकृत सीमा से बढ़कर 4385 गुणा ज्यादा हो गई। वहीं आई.ए.ई.ए. ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षित रेडियोधर्मी सीमाओं का दायरा बढ़ाकर 40 किमी0 कर देने की सिफारिश की। ये सारी सूचनाएं 31 मार्च/1 अप्रैल के समाचार पत्रों के जापान विषयक समाचारों का हिस्सा है।

यहां पर कुछ तथ्य मेरी दिलचस्पी जगाते हैं। जापान सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी से अधिक पीड़ित हुआ या मानवकृत विकास के असुरक्षित संसाधनों से टेपको के अध्यक्ष के बीमार पड़ने के बाद संयंत्रों को बंद करने का निर्णय लिया गया। इस दुर्घटना के एक साल बाद जापान के फुकूशिमा प्रांत की स्थिति अर्थात वहां की उपज, जलवायु और मानवीय जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव भी विकिरण के व्यापक प्रभावों के असर को व्याख्यायित करेगा। मेरे इसी विषय पर पिछले पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक मित्र ने लिखा है कि विकिरण से घबराने की जरूरत नहीं है। साधारण केला खाने से भी विकिरण हो सकता है। मित्र सही हो सकते हैं। यह विशेषज्ञों का क्षेत्र है और मैं विशेषज्ञ नहीं। किंतु मैं ”आम जन की” सुरक्षा को लेकर एक बार फिर यह कहना चाहूंगा कि उदाहरण आपके सामने है। आपने रेडियो विकिरण के विषय में हमारी चिंताओ को समझकर अपनी प्रतिक्रिया दी किंतु क्या इतने बड़े परमाणु हादसे के बाद भी ”रेडियो विकिरण” के शोर के बीच हमारे तंत्र ने आम जन को ”रेडियो विकिरण” के विषय में जागरूक करने की कोशिश की ? क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?

जहां तक परमाणु ऊर्जा और विकास की बात है तो वह अध्याय माननीय संसद द्वारा स्वीकृति देने के बाद बंद हो चुका है। किंतु परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न बिजली के महंगे उत्पादन का व्यय भी आम राजस्व से लिया जाए क्या इस पर बहस नहीं होनी चाहिए। क्या आम उपभोक्ता जरूरत की बिजली, सिंचाई और पर्यावरण की चिंता स्थानीय स्तर पर किए जाने की सोच पिछड़ापन है। क्या इसदेश में सभी पशु द्वारा चालित वाहन और उत्पादन एवं परिवहन के साधनों में पशुओं का प्रयोग बन्द हो गया है ? नहीं न। ऐसी कदापि नहीं हुआ है और विकास की तीव्र से तीव्र गति भी एक शताब्दी तक इसे समाप्त नहीं कर पायेगी। इसका अभिप्राय हुआ कि देश में बेटी के दहेज के लिए हेलिकाप्टर और 1-1 करोड़ रू0 भेंट देने वाले लोग हैं तो बेटियों के विवाह के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर रहने वाले भी। 5-7 करोड़ की कारों की अग्रिम बुकिंग कराने वाले लोग हैं तो बेटी को सरकारी साइकिल प्राप्त कराने के लिए लम्बी लाइनें लगाने व सिफारिशें कराने वाले भी। अगर ऐसे लोगो के लिए बिजली स्थानीय स्तर पर गोबर गैस वायु ऊर्जा या अन्य साधनों से सस्ते दर पर उपलब्ध कराई जाए तो क्या बुराई है ? इससे परमाणु ऊर्जा से होने वाला विकास कहां प्रभावित होता है ? इसी तरह से स्थानीय नदियों एवं बड़ी नदियों को जोड़कर गांवो में तालाब और कुओं की संख्या बढ़ाकर आम आदमी के लिए सिंचाई और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सके तो इसमें क्या बुरी बात है। शेर-चीते के विलुप्तीकरण की चिंता तो सारी दुनिया कर रही है क्योंकि उसमें व्यापार है, पैसा है और विलासिता भी। किंतु गांव की गौरेया और मैना के लुप्त होने की चिंता कौन करेगा ? आपको लगे मैं बहक गया हूं नहीं। मैं तो केवल विकास के मानको के मध्य यथासंभव संतुलन स्थापित करने की बात कर रहा हूँ।

अब मैं पुन: परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा संबंधी प्रश्न पर वापस लौटता हूं। हमारे एक मित्र ने कहा है कि भारत के परमाणु रिएक्टरों Passive automatic convection cooling mechanism का प्रयोग करते हैं जिसके लिए परमाणु रिएक्टर बंद होने की स्थिति में किसी जनरेटर की आवश्यकता नहीं होती। यह भी विशेषज्ञता का क्षेत्र है अत: विशेषज्ञों की राय का ही आदर किया जाना चाहिए। किंतु कतिपय प्रश्न आपके समक्ष अवश्य करना चाहूंगा :-

1- कुल कितने लाख करोड के परमाणु ठेके हुए हैं और इनमे पूर्ण पारदर्शिता बरती गई हैं

2- क्या कोई सक्षम संस्थान यह उत्तरदायित्व लेने को तैयार है कि इनमें किसी प्रकार की दलाली नहीं ली गई है।

3- क्या निर्माण आई.ए.र्इ्र.ए. अथवा भारत सरकार द्वारा तय अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।

4- और क्या परमाणु आपदा की स्थिति में हम तदनुरूप आपदा प्रबंधन मे सक्षम है ?

इन मुद्दों पर क्यों चर्चा नहीं होनी चाहिए। जहां तक आपदा प्रबंधन की कुशलता का प्रश्न है तो हम आत्म सम्मोहित लोग हैं अन्यथा लाटूर, टिहरी में आए भूकंपो को भूले नहीं होते जहां भारी मानवीय क्षति हुई थी। भुज के भूकंप में भी मानवीय क्षति कम नही हुई थी अपितु सराहना करनी चाहिए नरेन्द्र मोदी के विकास और पुननिर्माण की योग्यता की। एक और समाचार जो शायद हर सवेंदनशील व्यक्ति को भयभीत करेगा और वह यह कि ”हम विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्रो में नं0 चार पर है” अगर अभी हम न भूले हों तो याद होगा कि बिहार की बाढ़ में कुछ वर्ष पूर्व एक जिलाधिकारी अपने राहत कार्यों के लिए विश्व प्रसिध्द ”टाइम” पत्रिका के कवर पेज पर छपे थे और बाद में उसी बाढ़ राहत घोटाले में जेल गए। समस्या परमाणु ऊर्जा नहीं है अपितु झोल है आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हम लोग जिनके लिए यह भ्रष्ट व्यवस्था समर्पित है। हम एक छोटे राष्ट्र नहीं है। हम हैं 121 करोड़ की भारी भरकम आबादी वाले विकासशील देश। जहां छोटी सी गलती भारी तबाही लाती है। यहां आज भी लोग भूख से मरते हैं। ऐसे में परमाणु सुरक्षा की चिंताए पारदर्शी नीति से ही कम की जा सकती हैं।

मैं समाप्ति से पूर्व एक विषय और विचारार्थ रखना चाहूंगा। उद्योगों में सुरक्षा के मानक किस आधार पर तय होने चाहिए ? आम मानवीय क्षति पर्यावरण को हानि, राजस्व का जनता के हित में लाभकारी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा। (इसमें स्थानीय लोककला, संस्कृति, एवं भाषा आदि की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए) को वरीयता मिलनी चाहिए अथवा उद्योगपतियों-पूंजीपतियों की जान एवं उनके लाभ की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए। जापान के विषय में विचार करें तो टेपको कम्पनी ने अपने अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण की चपेट में आने के बाद परमाणु संयंत्रो को ठिकाने लगाने का निर्णय लिया अन्यथा तमाम कर्मचारियों की जान जोखिम में डालकर भी रिएक्टरों को ठण्डा करने का प्रयास जारी था। साथ ही यह भी संज्ञान लेना होगा कि आई.ए.ई.ए. 2008 में ही इन परमाणु संयंत्रो के कालबाधित हो जाने और उन्हें बंद करने का परामर्श दे चुकी थी फिर भी उन्हें आम जापानी नागरिक एवं राष्ट्र के मूल्य पर चलाए रखने की अनुमति दी गई। यदि जापान जैसे राष्ट्र में यह संभव हो तो भारत में जहां रोज एक नया घोटाला खुलता है वहां क्या संभव नहीं। अत: परमाणु संयंत्रों के विषय में सुरक्षा चिंताओं को शायद हल्के में लेना ठीक नहीं।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।
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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Ashish Shrivastava
    अप्रैल 05, 2011 @ 05:11:37

    इसे पढे :http://sb.samwaad.com/2011/04/blog-post.htmlविकिरण कब हानिकारक होता है :http://www.informationisbeautiful.net/visualizations/radiation-dosage-chart/कोयला बीजलीघर और परमाणु बिजलीघरhttp://www.washingtonpost.com/national/the-human-toll-of-coal-vs-nuclear/2011/04/02/AFOVHsRC_graphic.htmlआपको पर्यावरण की बड़ी चिन्ता है, इसे तो जरूर पढे। यह आपको बतायेगा कि कौनसी श्रोत पर्यावरण के हित मे है।http://solareis.anl.gov/guide/environment/index.cfmइसके बावजूद आपको लगता है कि परमाणु ऊर्जा बेकार है, बेशक ऊर्जा के लिए आप गोबर गैस संयंत्र लगाये !

    प्रतिक्रिया

  2. Ashish Shrivastava
    अप्रैल 05, 2011 @ 05:14:51

    थोड़ा ज्ञानवर्धन और ……भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम के बारे में आप यहाँ जान सकते हैं :http://www.dae.gov.in/power/npcil.htmhttp://en.wikipedia.org/wiki/India%27s_three_stage_nuclear_power_programmehttp://india.gov.in/sectors/science/nuclear_stage_III.phphttp://www.dae.gov.in/publ/3rdstage.pdfइससे आप यह जान पाएंगे कि दरअसल परमाणु उर्जा संयंत्रों में इस्तमाल होने वाला 95% उर्जा अवशेष फिर से इस्तमाल किया जायेगा …बाकी के अवशेष को भी ठिकाने लगा दिया जायेगा …यह अवशेष खतरनाक है ये बात हमारे परमाणु उर्जा संयंत्र के वैज्ञानिकों को अच्छी तरह पता है … और इसलिए इनको जब ठिकाने लगया जायेगा तब ये ध्यान रखा जायेगा कि और विशेष सावधानी बरती जायेगी कि किसीको कोई ख़तरा न रहे …

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  3. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अप्रैल 05, 2011 @ 17:34:42

    गोबर गैस, सौर ऊर्जा, पवन चक्कियों से बनी ऊर्जा इन रियेक्टरों से बहुत बेहतर है. यूनियन कार्बाइड ने भी पूरी सुरक्षा की गारंटी दी थी लेकिन क्या हुआ, दुनिया ने देखा. भारत में सुरक्षा का स्तर कैसा है, सब जानते हैं. इसलिये परमाणु ऊर्जा से बहुत बेहतर है कि अंधेरे में रहने की आदत डाली जाये.

    प्रतिक्रिया

  4. Ashish Shrivastava
    अप्रैल 05, 2011 @ 23:44:48

    भारतिय नागरिक जी, आपकी टिप्पणी पर अब क्या कहें?सौर उर्जा और पर्यावरण के हितकारी ? आपने इसे नही पढ़ा http://solareis.anl.gov/guide/environment/index.cfmक्या आप जानते है पवन चक्की हर जगह नही लग सकती ? और इसके लिये कितनी जगह चाहीये होती है ?जल आधारित संयंत्रो से पर्यावरण को होने वाली हानी तो जानते ही होंगे !कोयला/तेल आधारित संयंत्रो की तो बात ही ना की जाये तो बेहतर !गोबर गैस : मिथेन जानते है आप ? मिथेन जलने से क्या निकलता है जानते ही होंगे !युनियन कार्बाईड का परमाणु ऊर्जा से क्या संबध ?भारत मे परमाणु संयंत्र ४० वर्ष से है? कितनी दुर्घटना हुयी है ? कितनी मौतें हुयी है ?२००४ की सुनामी मे कलपक्कम मे क्या हुआ था ?गुजरात के काकरापार संयंत्र को भूकंप से क्या हुआ था !क्या आप एक सप्ताह बिना बिजली के रह सकते है ? एक बार रह कर देखे उसके बाद अंधेरे मे रहने की बात करें।

    प्रतिक्रिया

  5. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अप्रैल 10, 2011 @ 05:14:28

    आशीष जी, आप कहां रहते हैं, कह नहीं सकता. उप्र में तो एक दिन में जब आठ घण्टे सप्लाई रह जाती है तो ब्लैक आउट जैसा ही आलम होता है. दूसरा यह कि मैं ठेठ गांव से सम्बन्धित हूं जहां कुछ वर्ष पहले तक बिजली नहीं पहुंची थी, लोग अभावग्रस्त थे, लेकिन सुखी थे. परमाणु ऊर्जा और यूनियन कार्बाईड के बीच संबंध के बारे में भी आपको बताता हूं. यूनियन कार्बाईड ने भी सुरक्षा के ऐसे ही दावे किये थे जैसे हमारे यहां परमाणु संयंत्रों के मामले में किये जा रहे हैं, अंजाम क्या हुआ सबको खबर है. २००४ में कितनी तीव्रता थी कलपक्कम में सुनामी की, केन्द्र कहां था सुनामी का. जहां सारे सुरक्षा नियम सिर्फ कागजों पर चलते हों, वहां परमाणु सुरक्षा को लेकर कोई श्वेत पत्र जारी क्यों नहीं किया जाता. आशीष जी, सांस छोड़ने से भी कार्बन डाई आक्साइड निकलती है, क्या सांस लेना छोड़ सकते हैं.. प्रश्न यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में प्लेटोनिक मूवमेंट के चलते यदि आठ/नौ तीव्रता का भूकम्प यहां आ गया तो हमारे संयंत्र उसे झेल पाने की स्थिति में होंगे. नये संयंत्रों को लेकर पारिस्थितिकी में जो परिवर्तन होंगे उसके बारे में कुछ ज्ञानवर्धन करेंगे…

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