जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [3] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

11 मार्च 2011 से जिस प्रबल प्राकृतिक

….भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है….

……रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है……

प्रकोप का शिकार जापान हुआ उसकी पीड़ा से माह एक माह बाद भी उबर नही पाया है। इधर फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो से हो रहे तीव्र रेडियो विकिरण रिसाव ने एक नयी प्रकार की सुरक्षा चिंताओ से विश्व को रूबरू कराया है। हालिया समाचारों के अनुसार फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो के निकटवर्ती समुद्र में रेडियोधर्मिता की मात्रा अब तक की सर्वाधिक मात्रा मापी गई। परमाणु संयंत्र से 30 किमी0 की दूरी पर समुद्र से लिए गए नमूनों में आयोडीन – 131 का स्तर उच्चतम सीमा से 23 गुना ज्यादा और सीजियम – 137 का स्तर भी अब तक का सर्वाधिक पाया गया। मेरे लिए तो आयोडीन – 131 एवं सीजियम – 137 मात्र ऐसे शब्द हैं जिनसे यह अनुमान लगा सकता हूं कि ये रेडियोधर्मी कण पर्यावरण एवं मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक घातक होंगे।जानकार.. सुधी पाठकों को चाहिए कि जनजाग्रति की दृष्टि से इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे तो अच्छा रहेगा। इस बीच भारतीय ऊर्जा निगम के निदेशक श्रेयांस चक्रवर्ती ने भारतीय परमाणु संयत्रो में अतिरिक्त सुरक्षा बढ़ाये जाने पर बल दिया है। भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है।

विगत दिनो जापान की फुकूशिमा परमाणु दुर्घटना के पश्चात प्रारम्भ हुए रेडियो विकरण रिसाव के चलते उत्पन्न होने वाली सुरक्षा चिंताओ पर कतिपय मित्रों की प्रतिक्रिया कुछ उपेक्षात्मक थी। ऐसा लगा कि मानो वह कह रहे हैं कि रेडियो विकिरण कोई गंभीर समस्या नहीं है। ऐसे मित्रो को संबोधित करते हुए मैं चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना-यूक्रेन रूस से संबंधित कुछ तथ्य हिन्दी दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट से साभार प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस रिपोर्ट के अनुसार फूकुशिमा में रेडिएशन स्तर चेरनोबिल हादसे को पार कर चुका है। 26 अप्रैल 1986 यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र के रिएक्टर-4 में हुए परमाणु हादसे में रिएक्टर की छत उड़ गई और जो आग लगी वह नौ दिनो तक धधकती रही। रिएक्टर के बाहर कंक्रीट की दीवार न होने के कारण रेडियोधर्मी मलवा वायुमण्डल में फैल गया जिसके विकिरण से 32 लोगो की मृत्यु हो गई। अगले कुछ दिनो में रेडियोधर्मी बीमारियों के कारण 39 अन्य लोग मारे गए। चेर्नोबिल परमाणु हादसा विश्व परमाणु इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना सिध्द हुई। इसका रेडियोधर्मी पदार्थ यूक्रेन, रूस और बेलारूस तक फैल गया था। प्रदूषण को रोकने के लिए 18 अरब रूबल खर्च किए गए। 1986 से 2000 तक 350450 लोगो को यूक्रेन, रूस, वेलारूस के प्रदूषित इलाको से निकालकर दूसरी जगह बसाना पड़ा। इस हादसे के बाद धरती एक बड़ा भाग प्रदूषित हो गया और हजारो लोगो को अपनी रोजी-रोटी गंवानी पड़ी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार उस हादसे में मरने वालो की संख्या-4000 तक हुई हो सकती हैं यही नहीं इस हादसे के लोगो पर जो मानसिक आघात हैं उसकी गणना नहीं की जा सकती। हादसे के बाद तमाम लोग शराबी हो गए और बहुतो ने आत्महत्या कर ली।

उक्त रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है कि योग्यता एवं क्षमता के अनुसार लोगो को इस विषय में जागरूक एवं शिक्षित करने का प्रयास करें।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।
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