छिनाल .. शब्द अथवा ववाल ……… ? [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

चूंकि शब्द प्रयोग ”छिनाल – बेबफा” माननीय कुलपति महोदय ने किया था। अत: मैने हिन्दी के प्रसिध्द विद्वान डा0 हरदेव बाहरी के ”शिक्षक हिन्दी शब्द कोष में इस शब्द का अर्थ तलाश किया। डा0 बाहरी के विषय में उल्लेखनीय है कि उनकी डी-लिट की डिग्री ”शब्दार्थ विज्ञान” …

……..भैय्या ! मैं तो इसीलिए ”बुध्दिजीवी” शब्द से ही घृणा करता हूं और उसे ”रूपजीवा” या ”रूपजीवी” शब्द के समान मानता हूं। अब अप जाने आपके लिए ”बुध्दिजीवी” का अर्थ बुध्दि यानी विवेक की ”वेश्यावृत्ति करने वाला” या ”बुध्दि से बेवफाई करने वाला।” वैसे आप मेरी मुफ्त की सलाह मानें तो मेरी ही तरह ”बौध्दिक” शब्द का प्रयोग कर सकते हैं वह भी मूर्खों में मेरी तरह न कि बुध्दिजीवियों में।

अभी कुछ दिन पूर्व समाचार पत्रों, टी0वी0 चैनलों पर एक बहस छिड़ी थी। एक विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति ने अपने एक साक्षात्कार में महिला लेखिकाओं के लिए ”छिनाल” शब्द का प्रयोग किया। कुलपति महोदय के इस ”शब्द प्रयोग”का प्रतिवाद हुआ। बुध्दिजीवियों ने कहा कि ”छिनाल” शब्द का अर्थ ”वेश्या” होता है तो क्या कुलपति महोदय महिला लेखिकाओं को ”वेश्या’ कह रहे हैं। अब कुलपति महोदय ने वास्तविक ”बुध्दिजीवी कुलाटी” मारी और बयान दिया कि ”छिनाल” से उनका अभिप्राय ”वेबफा” से था। अब यह मेरे जैसे मूर्खों के शब्दकोश में नई ज्ञानवृध्दि थी।

इस बीच कुछ अच्छे शीर्षकों से विभिन्न ”ब्लागों” पर मेरी दृष्टि गई। इस घटना से संबधित एक शीर्षक था – ”हम छिनाल ही भले।” इस बहस में जो पोस्ट दिखाई दिए उनमें जमकर बुध्दिजीवी नंगई स्पष्ट दिखाई दे रही थी। इस पर लिखना तो उसी समय चाह रहा था किंतु अन्य इससे अधिक महत्वपूर्ण विषय हाथ में थे और फिर दैनिक जीवन की व्यस्तताएं।

अब मेरा ध्यान गया ”छिनाल” शब्द की प्रथम परिभाषा ”वेश्या” पर। प्रसिध्द संस्कृत-हिन्दी, शब्द कोश द्वारा श्री वामन शिवराम आप्टे में ‘वेश्या’ शब्द का अर्थ इस प्रकार किया गया है –
वेष्या – (वेशेन पण्ययोगेन जीवति – वेश् + यत् + टाप्) – बाजारू स्त्री, रंडी,
गणिका, रखैल (मृच्छ – 1/32, मेघ0 35)
मृच्दकटिकम् संस्कृत नाटक है और मेघदूतम् महाकवि कालिदास का खण्डकाव्य जिनमें इस शब्द का प्रयोग किया गया है।

इस प्रकार दो शब्द और मिले। रंडी एवं गणिका। जिन्हें संस्कृत शब्द कोष में तलाशा जा सकता था।

रंड: – (रम् + ड) वह पुरूष जो पुत्रही मरे,
रंडा – फूहड़ स्त्री, पुंश्चली, स्त्रियों को संबोधित करने में निन्दापरक शब्द,
रंडे पंडित मानिनि – पंचतंत्र
संभवत: रंड: से ही लोकभाषा में रांड़ और रण्डी शब्द प्रचलित हुआ होगा।
रत् – (मू0क0कृ0) रम् + क्त – प्रसन्नता, खुश

किंतु इससे एक शब्द बना
रतआयनी – वेश्या, रंडी

ऐसा अर्थ किया गया। संस्कृत का एक अन्य समानार्थी शब्द मिला –

गणिका – (गण् + ठञ + टाप्) रण्डी, वेश्या – गुणानुरक्ता गणिका च यस्य बसन्तशोभेव वसन्तसेना – मृच्छंकटिकम
इससे मिलते-जुलते अर्थ वाले एक अन्य शब्द का संस्कृत साहित्य में प्रयोग हुआ है – ”रूपजीवा”

रूपम – (रूप : क्, भावे अच् वा) – आजीवा – वेश्या, रंडी, गणिका

जहां तक ”छिनाल” शब्द का अभिप्रेत है तो एक शब्द मिला।
छिन्न – (भू0क0कृ0) छिद् + क्त) – छिन्ना – वारांगना, वेश्या

इसी तरह से ”वारांगना” शब्द भी ‘वेश्या’ अर्थ में अभिप्रेत मिला।
वार: – (वृ + घञ्) – सम: – अंगना – नारी, युवति, योषित, वनिता,
विलासिनी – सुन्दरी – स्त्री

अर्थात ”वार:” शब्द के साथ इनमें से कोई भी शब्द जोड़ लिया जाए तो उसका अर्थ होगा –
”गणिका, बाजारू औरत, वेश्या, पतुरिया, रण्डी। ”वैश्या” के अर्थ में एक अन्य शब्द मिला।
वारवाणि: या वारवाणी – वेष्या

इतने श्रम के पश्चात भी ‘वेश्या’ के तमाम अर्थ तो मिले जो ”छिनाल” का अर्थ बताया गया था, किंतु ”छिनाल” शब्द संस्कृत -हिन्दी कोश में नही मिला। यद्यपि मिलते-जुलते उच्चारण वाला ”छिन्ना” शब्द मिला जिसका अर्थ भी ‘वेश्या’ था।

चूंकि शब्द प्रयोग ”छिनाल – बेबफा” माननीय कुलपति महोदय ने किया था। अत: मैने हिन्दी के प्रसिध्द विद्वान डा0 हरदेव बाहरी के ”शिक्षक हिन्दी शब्द कोष में इस शब्द का अर्थ तलाश किया। डा0 बाहरी के विषय में उल्लेखनीय है कि उनकी डी-लिट की डिग्री ”शब्दार्थ विज्ञान” में ही है। उनके शब्दकोष में ”छिनाल” शब्द का अर्थ था।
छिनाल – (वि0) पर पुरूषों से संबध रखने वाली (स्त्री) दुश्चिरित्रा स्त्री-पुंश्चली।
एक अन्य मिलते जुलते शब्द ”छिनार” का भी यही अर्थ है।
छिनार – (स्त्री) व्यभिंचारिणी स्त्री, पुंश्चली

मैं एक वाक्य प्रयोग करता हूं। मैं अपने मित्र से कहता हूं कि ”यार ! ”अमुक” बड़ी ”छिनाल” है वह इसका अर्थ ”वेश्या” समझता है। हां आप चाहें तो ”बेवफा” कह सकते हैं भैय्या ! मैं तो इसीलिए ”बुध्दिजीवी” शब्द से ही घृणा करता हूं और उसे ”रूपजीवा” या ”रूपजीवी” शब्द के समान मानता हूं। अब अप जाने आपके लिए ”बुध्दिजीवी” का अर्थ बुध्दि यानी विवेक की ”वेश्यावृत्ति करने वाला” या ”बुध्दि से बेवफाई करने वाला।” वैसे आप मेरी मुफ्त की सलाह मानें तो मेरी ही तरह ”बौध्दिक” शब्द का प्रयोग कर सकते हैं वह भी मूर्खों में मेरी तरह न कि बुध्दिजीवियों में।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।

रेलवे प्लेटफार्म का हिन्दुस्तान . फिर भी हमारा भारत महान…… [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

मै जानता हूं कि मानवतावादी-जनतंत्रवादी और सुधारवादी चीखेगें। मेरी मनुवादी सोच पर स्यापा करेगे। लेकिन अगर आप इन्सानी बस्ती को इंसानों के रहने योग्य नही बना सकते तो बीमारों और स्वस्थ लोगों के अलग-2 रहने की व्यवस्था तो कर ही सकते है। तो ऐसे लोगों की सार्वजनिक नागरिक जीवन में आजादी से घूमने-फिरने देने के बजाय क्या ही अच्छा होता कि उन्हे सम्भ्रान्त नागरिक बनाने और पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता । इसके लिए उन्हे अलग बस्तियों में भी रखना पडे ता कोई बुरा आईडिया नही। आखिर इनकी फिक्र न तो बाबा रामदेव हो है और न ही अन्ना हजारे को। मानवतावादियों पुरातंत्रवादी सुधारवादी संस्थाओं अथवा सरकारें इनकी चिन्ता कर पातीं तो ये दृश्य दिखाई ही नहीं देते। और हॉ ये किसी एक जगह के दृश्य नही है अपितु भारत वही में ऐसे दृश्य आम है।

एक चेहरा शरीर से तो स्त्री होने का आभास दे रहा है। काला-कलूटा मोटा सा शरीर कपड़ों में लिपटा हुआ। उन्हें चीथड़े ही कहें तो ज्यादा ठीक। अरे यह क्या प्लेटफार्म पर पड़े पूड़ी के एक-चौथाई टुकड़े को तो उसने ऐसे झपट के उठा लिया जैसे गिध्द ने मॉस पर झपटटा मारा हो। देखों वह चौथाई पूडी का टुकड़ा भी ऐसे छुपा कर ले जा रही है। जेसे कोई खजाना मिल गया हो।

सामने एक और चेहरा देखों। नीचे से पूरी तरह नग्न। पुरूष ही है। ऊपर एक हाफ आस्तीन शर्ट है। पीछे से देखो तो दोनो टॉगें गंदगी से लिपटी है। जी मितलाने लगता है।लगता है उल्टी हो जायेगी।ऊधर से निगाह हटा लेता हूं।

दूर रेलवे लाइन के किनारे अप्रैल माह के तीसरे सप्ताह की रांगा के मैदानों की चिलचिलाती धूप में ऐसा ही एक और शख्स लेटा है। गंदगी का साम्राज्य अपने शरीर पर लादे, पूरी आस्तीन की दो-दो शर्ट पहने पूरे कपड़ों में उलझे बाल,घसी आखें,इसे देख मन एक और वितृष्णा से भर गया है। तभी रेलवे लाईन की पटरी के किनारे भागता एक अधनंगा छोटा बच्चा उलझ कर गिर जाता है। ट्रेन आने की घोषणा हो रही है और मेरा ध्यान भटक जाता है। कर कहीं और ठहर गया।

आज फिर ट्रेन से उतरते ही मितली आने लगी। दृश्य ही ऐसा था। लगता है रेलवे प्लेटफार्म/स्टेशन शहर की न केवल सबसे बदबूदार जगह है अपितु अमानवीय भी। यह एक ऐसी जगह है जहां मानवाधिकार आयोग से लेकर महिला आयोग तक पशु संरक्षण आयोग से लेकर सफाई आयोग तक हर एक के लिए काम करने के समान अवसर उपलब्ध हैं। बस दिक्कत है तो मात्र इतनी कि हममें से हर आदमी केवल लफ्फाजी करता है : काम नहीं। जितना बड़ा पद उतनी ज्यादा लफ्फाजी और उतना ही कम काम।

ट्रेन से उतरते ही प्लेटफार्म से बाहर निकलने के लिए मैने रेलवे टिकट खिड़की की ओर जाने वाला रेलवे पुल के नीचे से होकर गुजरता हुआ रास्ता चुना। यात्रा की थकान और घर पहुंचने की जल्दी, तो ऐसे में जितनी जल्दी प्लेटफार्म से बाहर निकल कर चला जा सके उतना ही अच्छा। रेलवे पुल के नीचे से गुजरकर टिकट विण्डो वाले प्लेटफार्म के दाहिने होकर जैसे ही बाहर की ओर मुड़ा तो उचटती सी नजर दाहिने ओर की पटरी पर उकड़ूं बैठी स्त्री पर पड़ी। एक दम मादरजात नंगी। गुप्तांगो को छिपाने की अधूरी से कोशिश। रेलवे प्लेटफार्म मानवीय शक्लों की भीड़ से अटा पड़ा था – स्त्री-पुरूष, बच्चे-वृध्द सभी उस भीड़ का हिस्सा था। कभी-कभी अवारा घूमते सांड़ और कुत्ते भी इस भीड़ के होने का एहसास दिला जाते। लेकिन यह मानवीय शर्म किसी की अनुभूति का हिस्सा नहीं बन सकी।

हमारे रेलवे स्टेशन हमारी सभ्यता और तरक्की की निशानी हैं। मैं अपने बचपन को याद करता हूं तो देखता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है। छुक-छुक करती वाष्प इंजन से चलने वाली गाड़ियों की जगह डीजल और बिजली से चलने वाली तीव्र यात्री गाड़ियों ने ले ली है। अब प्रतीक्षा करती कोई औरत गाड़ी के आने की आवाज सुनकर यह नही कहती कि – ”दोपहर वाली गाड़ी आ गई लगता दो बज गए।” महानगरों मे मेट्रो गाड़ियां आ गई। जम्मू-कश्मीर के अन्दरूनी भागों तक रेलवे की पहुंच हो गई। पूरे देश में तीव्रगामी और सुविधाजनक रेलगाड़ियों का जाल बिछ रहा है। अब तो बुलेट गाड़ी भी चलाये जाने की चर्चा हो रही है। प्लेटफार्म पर मॉल बनाये जाने की चर्चा हो रही है। प्रतीक्षालय पहले से अधिक सुविधाजनक और स्वच्छ हो गए हैं। अब तो रेलगाड़ियों में आम आदमी के डिब्बे की सीट भी गुदगुदी कर दी गई है। टिकट विन्डो पर स्टेशन-स्टेशन और अलग-अलग ट्रेन के लिए लगने वाली लम्बी-लम्बी लाइनें और टिकट खरीदने के लिए होने वाली धक्कामुक्की और कभी-कभी हो जाने वाली रेलवे पुलिस की डण्डेबाजी प्राय: गायब हो गई है। लेकिन बहुत कुछ आज भी वैसा ही है जैसा पहली बार हिन्दुस्तान में टे्रन के चलने के समय रहा होगा।

सुबह नहा धोकर नाश्ता करके जब कभी प्लेटफार्म पर सुबह की ट्रेन पकड़ने पहुंचा तो पटरियों के बीच बिखरे पड़े मानव मल का साम्राज्य आज भी वैसा ही होता है जैसा कल रहा होगा। यह मल मई-जून की सुबह की धूप में ही सूखकर हवा के झोके के साथ हर श्रेणी के यात्री की नाक के झरोखों में प्रवेश कर उसके अन्तरमन तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा आता। आप लाख कोशिश करके उधर से दृष्टि हटायें भी तो प्लेटफार्म पर चलते हुए आपके पैरों के नीचे पशु-मल, केले के छिलके या अन्य गंदगी और यदा-कदा किसी शैतान बच्चे ने अपनी आलसी मां के कारण प्लेटफार्म पर ही कर दी ‘टट्टी’ आपको सावधानी से चलने की हिदायत दे जाती।

कष्ट इतना ही होता तो शायद सहन भी कर लेता किंतु ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म की बेंच पर बैठे हुए अथवा एक प्लेटफार्म से दूसरे पर जाते हुए आपकी अवारा नजर बरबस भटक ही जाती है। सामने प्लेटफार्म के फर्श पर एक बुजुर्ग, भिखारी एक टांग पर दूसरी टांग चढ़ाये हुए लेटा है। तहमद से उसकी टांगो के बीच से उसके अंग खास अंग ताजी हवा का लुत्फ उठा रहे हैं तो गुजरती हुई महिलाओं और बच्चियों को किस तरह की शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता होगा : आप समझ सकते हैं। लेकिन यह सब कुछ कम है।

हद तो तब हो गई जब अनायास आंखो के सामने वह मादरजात नंगी और आ गई। हमारी हजारों जोड़ा आंखो में शर्म थी सो वह इधर-उधर नजर घुमाकर चली गईं। लेकिन कोई हाथ नहीं उठा एक कपड़ा लेकर जो उसे उठा देता और आंखो की शर्मिन्दगी को कम कर देता। मेरा भी नहीं आखिर मैं भी उस मुर्दा इन्सानियत का जीवित पुतला ही हूं। घर आकर पत्नी से जिक्र किया तो उन्होने कहा ”पगली होगी” मुझे तो लगता है शायद हम वह पागलों की भीड़ में एक वही अक्ल वाली थी जो हमें हमारी पहचान करा रही थी।

मालमू नहीं ऐसी चीजें मुझे ही दिखाई देती है या कभी रेलवे के अधिकारियों, कर्मचारियों, जी0आर0पी0 और आर0पी0एफ0 के पुलिस कर्मियों को भी। प्लेटफार्म पर आने वाले रेलवे बोर्ड के सदस्यों से लेकर माननीय एम0पी0, एम0एलेज0 और मन्त्रियों की नजर क्यों नही जाती। हमारे देश में नगर विकास मंत्रालय नाम की चीज भी काम करती है। तो नगरों में ऐसे लोगों के आवासन हेतु कोई नीति क्यों नही होती ? हो सकता है इनका कोई मसीहा न हो। न ये दलित हो न अल्पसंख्यक। संभव है ये ओ0बी0सी0 और सामान्य सवर्णो के दायरे में न आते हो। पर इनकी नस्ल को इन्सानी कहा ही जा सकता है। हो सकता है रेलवे यार्ड में आबादी से थोड़ी दूरी पर खड़े डिब्बों में कभी इस आबादी के बीज पड़ जाते हों। हो सकता है पटरियों के किनारे के झुरमटे ऐसी ही किसी पगली की घुटी-घुटी आवाजों से सिसकने लगते हों। हो सकता है दो प्रेमी क्षणिक प्रेम का ज्वार यहीं कहीं उतार जाते हों और तयशुदा वक्त पर लगे फूलों को नोंचकर यहीं फेंक जाते हों। और इन फूलों की जिन्दगी इन्ही पटरियों के किनारे कांटा बनकर चुभने लगती हो। मुझे ऐसे वक्त याद आते हैं – ‘मनु’। हां महान संहिताकार मनु जिस पर कभी इस दृष्टि से देखने की किसी ने कोशिश नहीं की। हम सभ्यता के आसमान पर खड़े मानवता के पुतले यह क्यों नही तय कर पाए कि सभ्य मानवीय बस्तियों में ऐसी आबादी के लिए भी कोई निश्चित स्थान होना चाहिए। आखिर क्यों ?

काश मै मनु होता। तो घृणा और विद्रूपता के इन पुतलों को सभ्य नागरिक समाज से दूर रहने को बाहय कर देता। मै जानता हूं कि मानवतावादी-जनतंत्रवादी और सुधारवादी चीखेगें। मेरी मनुवादी सोच पर स्यापा करेगे। लेकिन अगर आप इन्सानी बस्ती को इंसानों के रहने योग्य नही बना सकते तो बीमारों और स्वस्थ लोगों के अलग-2 रहने की व्यवस्था तो कर ही सकते है। तो ऐसे लोगों की सार्वजनिक नागरिक जीवन में आजादी से घूमने-फिरने देने के बजाय क्या ही अच्छा होता कि उन्हे सम्भ्रान्त नागरिक बनाने और पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता । इसके लिए उन्हे अलग बस्तियों में भी रखना पडे ता कोई बुरा आईडिया नही। आखिर इनकी फिक्र न तो बाबा रामदेव हो है और न ही अन्ना हजारे को। मानवतावादियों पुरातंत्रवादी सुधारवादी संस्थाओं अथवा सरकारें इनकी चिन्ता कर पातीं तो ये दृश्य दिखाई ही नहीं देते। और हॉ ये किसी एक जगह के दृश्य नही है अपितु भारत वही में ऐसे दृश्य आम है।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।

मां तू वापस आ जा …. [ कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

कहाँ हो तुम आज
ओ माँ ..!

डब-डब…
गूँजती है आवाज़
आज भी ….

मेरे कानों में
और तैरता हूँ मैं
मछली की तरह
बँधा हुआ…

स्नेह की 
उसी रज्जु से

सुनता हूँ ….
धक्-धक्
पीता हुआ अमृत
आज भी ..

तुम्हारे आँचल में
और सींचता हुआ
स्वयं को

निहारते हैं
टुक्-टुक् …
मेरे दो नयन
आज भी ..

बलिहारी तेरा चेहरा
मेरी हर मुस्कान पर

माँ …
तुम्हे डर नहीं लगा
कभी भी अँधेरों से
क्योकि …
गूंजते हैं   आज भी
तेरे वे शब्द .. वीथी में
ये तेरी ….
बिटिया है.. बहना है
अपने घर ..गाँव.. देश
और परिवेश का गहना है

तू है ना .. !!
इन सब का पहरेदार
पार्वती का गणेश

यही सिखाती थीं ना?
तुम …
सारे बेटों को माँ

वृद्ध डंडा टेकते
वो बाबा…
बूढ़ी दादी की लाचारी
और वो अंधा भिखारी
अरे ! उस जानवर को
डंडा मत मारना
उसके पेट में बच्चे हैं
वो माँ है.. मेरी तरह
इनकी रक्षा करते हैं
सीख देती …
मुझे सब याद है माँ

दुखी हूं मैं आज मां
ये मेरे नन्हें ..
मेरे छोटे ..सब भटक गए हैं
देख….
ये सबको कब से छेड़ रहे हैं
और 
मेरी नसों में …
दौड़ रही है बिजली

क्या तू कहीं खो गई है मां 
शायद …
किसी ब्यूटी पार्लर में..
या फिर ….
पश्चिमी आधुनिकता की
अंधी चकाचौध में
तू वापस आजा माँ

गीत गुनगुना मन …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

माना लहरें भंवर भयंकर
धीरज नैया डोले
आशा की पतवार उठा ले
माझी साहस कर ले
वैचारिक झंझावातों से
हार न बैठो मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

थक कर चकनाचूर है फिर भी
बैठ न आंखे मीचे
अविचल नियम प्रकृति का निशि दिन
चलते आगे पीछे
कहीं ‘नित्य’ का रथ रूकता है
सोच विहंस मेरे मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन

तारे घटा टोप में डूबे
‘शशि’ मेघों ने घेरा
घनीभूत नैराश्य हो चला
मन में डाले डेरा
‘पौरूष’ को ललकार ‘कान्त’ कर
नभ से प्रकट ‘तडित’ मन
कठिन तमस निश्चय जायेगा
गीत गुनगुना मन

मौन सतत् सन्नाटा चहुँदिश
क्यों चुप बैठा मन
कठिन तमस भी कट जायेगा
गीत गुनगुना मन
गीत गुनगुना मन