रेलवे प्लेटफार्म का हिन्दुस्तान . फिर भी हमारा भारत महान…… [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

मै जानता हूं कि मानवतावादी-जनतंत्रवादी और सुधारवादी चीखेगें। मेरी मनुवादी सोच पर स्यापा करेगे। लेकिन अगर आप इन्सानी बस्ती को इंसानों के रहने योग्य नही बना सकते तो बीमारों और स्वस्थ लोगों के अलग-2 रहने की व्यवस्था तो कर ही सकते है। तो ऐसे लोगों की सार्वजनिक नागरिक जीवन में आजादी से घूमने-फिरने देने के बजाय क्या ही अच्छा होता कि उन्हे सम्भ्रान्त नागरिक बनाने और पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता । इसके लिए उन्हे अलग बस्तियों में भी रखना पडे ता कोई बुरा आईडिया नही। आखिर इनकी फिक्र न तो बाबा रामदेव हो है और न ही अन्ना हजारे को। मानवतावादियों पुरातंत्रवादी सुधारवादी संस्थाओं अथवा सरकारें इनकी चिन्ता कर पातीं तो ये दृश्य दिखाई ही नहीं देते। और हॉ ये किसी एक जगह के दृश्य नही है अपितु भारत वही में ऐसे दृश्य आम है।

एक चेहरा शरीर से तो स्त्री होने का आभास दे रहा है। काला-कलूटा मोटा सा शरीर कपड़ों में लिपटा हुआ। उन्हें चीथड़े ही कहें तो ज्यादा ठीक। अरे यह क्या प्लेटफार्म पर पड़े पूड़ी के एक-चौथाई टुकड़े को तो उसने ऐसे झपट के उठा लिया जैसे गिध्द ने मॉस पर झपटटा मारा हो। देखों वह चौथाई पूडी का टुकड़ा भी ऐसे छुपा कर ले जा रही है। जेसे कोई खजाना मिल गया हो।

सामने एक और चेहरा देखों। नीचे से पूरी तरह नग्न। पुरूष ही है। ऊपर एक हाफ आस्तीन शर्ट है। पीछे से देखो तो दोनो टॉगें गंदगी से लिपटी है। जी मितलाने लगता है।लगता है उल्टी हो जायेगी।ऊधर से निगाह हटा लेता हूं।

दूर रेलवे लाइन के किनारे अप्रैल माह के तीसरे सप्ताह की रांगा के मैदानों की चिलचिलाती धूप में ऐसा ही एक और शख्स लेटा है। गंदगी का साम्राज्य अपने शरीर पर लादे, पूरी आस्तीन की दो-दो शर्ट पहने पूरे कपड़ों में उलझे बाल,घसी आखें,इसे देख मन एक और वितृष्णा से भर गया है। तभी रेलवे लाईन की पटरी के किनारे भागता एक अधनंगा छोटा बच्चा उलझ कर गिर जाता है। ट्रेन आने की घोषणा हो रही है और मेरा ध्यान भटक जाता है। कर कहीं और ठहर गया।

आज फिर ट्रेन से उतरते ही मितली आने लगी। दृश्य ही ऐसा था। लगता है रेलवे प्लेटफार्म/स्टेशन शहर की न केवल सबसे बदबूदार जगह है अपितु अमानवीय भी। यह एक ऐसी जगह है जहां मानवाधिकार आयोग से लेकर महिला आयोग तक पशु संरक्षण आयोग से लेकर सफाई आयोग तक हर एक के लिए काम करने के समान अवसर उपलब्ध हैं। बस दिक्कत है तो मात्र इतनी कि हममें से हर आदमी केवल लफ्फाजी करता है : काम नहीं। जितना बड़ा पद उतनी ज्यादा लफ्फाजी और उतना ही कम काम।

ट्रेन से उतरते ही प्लेटफार्म से बाहर निकलने के लिए मैने रेलवे टिकट खिड़की की ओर जाने वाला रेलवे पुल के नीचे से होकर गुजरता हुआ रास्ता चुना। यात्रा की थकान और घर पहुंचने की जल्दी, तो ऐसे में जितनी जल्दी प्लेटफार्म से बाहर निकल कर चला जा सके उतना ही अच्छा। रेलवे पुल के नीचे से गुजरकर टिकट विण्डो वाले प्लेटफार्म के दाहिने होकर जैसे ही बाहर की ओर मुड़ा तो उचटती सी नजर दाहिने ओर की पटरी पर उकड़ूं बैठी स्त्री पर पड़ी। एक दम मादरजात नंगी। गुप्तांगो को छिपाने की अधूरी से कोशिश। रेलवे प्लेटफार्म मानवीय शक्लों की भीड़ से अटा पड़ा था – स्त्री-पुरूष, बच्चे-वृध्द सभी उस भीड़ का हिस्सा था। कभी-कभी अवारा घूमते सांड़ और कुत्ते भी इस भीड़ के होने का एहसास दिला जाते। लेकिन यह मानवीय शर्म किसी की अनुभूति का हिस्सा नहीं बन सकी।

हमारे रेलवे स्टेशन हमारी सभ्यता और तरक्की की निशानी हैं। मैं अपने बचपन को याद करता हूं तो देखता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है। छुक-छुक करती वाष्प इंजन से चलने वाली गाड़ियों की जगह डीजल और बिजली से चलने वाली तीव्र यात्री गाड़ियों ने ले ली है। अब प्रतीक्षा करती कोई औरत गाड़ी के आने की आवाज सुनकर यह नही कहती कि – ”दोपहर वाली गाड़ी आ गई लगता दो बज गए।” महानगरों मे मेट्रो गाड़ियां आ गई। जम्मू-कश्मीर के अन्दरूनी भागों तक रेलवे की पहुंच हो गई। पूरे देश में तीव्रगामी और सुविधाजनक रेलगाड़ियों का जाल बिछ रहा है। अब तो बुलेट गाड़ी भी चलाये जाने की चर्चा हो रही है। प्लेटफार्म पर मॉल बनाये जाने की चर्चा हो रही है। प्रतीक्षालय पहले से अधिक सुविधाजनक और स्वच्छ हो गए हैं। अब तो रेलगाड़ियों में आम आदमी के डिब्बे की सीट भी गुदगुदी कर दी गई है। टिकट विन्डो पर स्टेशन-स्टेशन और अलग-अलग ट्रेन के लिए लगने वाली लम्बी-लम्बी लाइनें और टिकट खरीदने के लिए होने वाली धक्कामुक्की और कभी-कभी हो जाने वाली रेलवे पुलिस की डण्डेबाजी प्राय: गायब हो गई है। लेकिन बहुत कुछ आज भी वैसा ही है जैसा पहली बार हिन्दुस्तान में टे्रन के चलने के समय रहा होगा।

सुबह नहा धोकर नाश्ता करके जब कभी प्लेटफार्म पर सुबह की ट्रेन पकड़ने पहुंचा तो पटरियों के बीच बिखरे पड़े मानव मल का साम्राज्य आज भी वैसा ही होता है जैसा कल रहा होगा। यह मल मई-जून की सुबह की धूप में ही सूखकर हवा के झोके के साथ हर श्रेणी के यात्री की नाक के झरोखों में प्रवेश कर उसके अन्तरमन तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा आता। आप लाख कोशिश करके उधर से दृष्टि हटायें भी तो प्लेटफार्म पर चलते हुए आपके पैरों के नीचे पशु-मल, केले के छिलके या अन्य गंदगी और यदा-कदा किसी शैतान बच्चे ने अपनी आलसी मां के कारण प्लेटफार्म पर ही कर दी ‘टट्टी’ आपको सावधानी से चलने की हिदायत दे जाती।

कष्ट इतना ही होता तो शायद सहन भी कर लेता किंतु ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म की बेंच पर बैठे हुए अथवा एक प्लेटफार्म से दूसरे पर जाते हुए आपकी अवारा नजर बरबस भटक ही जाती है। सामने प्लेटफार्म के फर्श पर एक बुजुर्ग, भिखारी एक टांग पर दूसरी टांग चढ़ाये हुए लेटा है। तहमद से उसकी टांगो के बीच से उसके अंग खास अंग ताजी हवा का लुत्फ उठा रहे हैं तो गुजरती हुई महिलाओं और बच्चियों को किस तरह की शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता होगा : आप समझ सकते हैं। लेकिन यह सब कुछ कम है।

हद तो तब हो गई जब अनायास आंखो के सामने वह मादरजात नंगी और आ गई। हमारी हजारों जोड़ा आंखो में शर्म थी सो वह इधर-उधर नजर घुमाकर चली गईं। लेकिन कोई हाथ नहीं उठा एक कपड़ा लेकर जो उसे उठा देता और आंखो की शर्मिन्दगी को कम कर देता। मेरा भी नहीं आखिर मैं भी उस मुर्दा इन्सानियत का जीवित पुतला ही हूं। घर आकर पत्नी से जिक्र किया तो उन्होने कहा ”पगली होगी” मुझे तो लगता है शायद हम वह पागलों की भीड़ में एक वही अक्ल वाली थी जो हमें हमारी पहचान करा रही थी।

मालमू नहीं ऐसी चीजें मुझे ही दिखाई देती है या कभी रेलवे के अधिकारियों, कर्मचारियों, जी0आर0पी0 और आर0पी0एफ0 के पुलिस कर्मियों को भी। प्लेटफार्म पर आने वाले रेलवे बोर्ड के सदस्यों से लेकर माननीय एम0पी0, एम0एलेज0 और मन्त्रियों की नजर क्यों नही जाती। हमारे देश में नगर विकास मंत्रालय नाम की चीज भी काम करती है। तो नगरों में ऐसे लोगों के आवासन हेतु कोई नीति क्यों नही होती ? हो सकता है इनका कोई मसीहा न हो। न ये दलित हो न अल्पसंख्यक। संभव है ये ओ0बी0सी0 और सामान्य सवर्णो के दायरे में न आते हो। पर इनकी नस्ल को इन्सानी कहा ही जा सकता है। हो सकता है रेलवे यार्ड में आबादी से थोड़ी दूरी पर खड़े डिब्बों में कभी इस आबादी के बीज पड़ जाते हों। हो सकता है पटरियों के किनारे के झुरमटे ऐसी ही किसी पगली की घुटी-घुटी आवाजों से सिसकने लगते हों। हो सकता है दो प्रेमी क्षणिक प्रेम का ज्वार यहीं कहीं उतार जाते हों और तयशुदा वक्त पर लगे फूलों को नोंचकर यहीं फेंक जाते हों। और इन फूलों की जिन्दगी इन्ही पटरियों के किनारे कांटा बनकर चुभने लगती हो। मुझे ऐसे वक्त याद आते हैं – ‘मनु’। हां महान संहिताकार मनु जिस पर कभी इस दृष्टि से देखने की किसी ने कोशिश नहीं की। हम सभ्यता के आसमान पर खड़े मानवता के पुतले यह क्यों नही तय कर पाए कि सभ्य मानवीय बस्तियों में ऐसी आबादी के लिए भी कोई निश्चित स्थान होना चाहिए। आखिर क्यों ?

काश मै मनु होता। तो घृणा और विद्रूपता के इन पुतलों को सभ्य नागरिक समाज से दूर रहने को बाहय कर देता। मै जानता हूं कि मानवतावादी-जनतंत्रवादी और सुधारवादी चीखेगें। मेरी मनुवादी सोच पर स्यापा करेगे। लेकिन अगर आप इन्सानी बस्ती को इंसानों के रहने योग्य नही बना सकते तो बीमारों और स्वस्थ लोगों के अलग-2 रहने की व्यवस्था तो कर ही सकते है। तो ऐसे लोगों की सार्वजनिक नागरिक जीवन में आजादी से घूमने-फिरने देने के बजाय क्या ही अच्छा होता कि उन्हे सम्भ्रान्त नागरिक बनाने और पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता । इसके लिए उन्हे अलग बस्तियों में भी रखना पडे ता कोई बुरा आईडिया नही। आखिर इनकी फिक्र न तो बाबा रामदेव हो है और न ही अन्ना हजारे को। मानवतावादियों पुरातंत्रवादी सुधारवादी संस्थाओं अथवा सरकारें इनकी चिन्ता कर पातीं तो ये दृश्य दिखाई ही नहीं देते। और हॉ ये किसी एक जगह के दृश्य नही है अपितु भारत वही में ऐसे दृश्य आम है।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।
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