वैदिक परिप्रेक्ष्य और यौनिक स्वच्छ्न्दता की तलाश में आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी कुंठा (भाग – 2) [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

इतनी व्यापक चर्चा के बाद यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ”हिन्दू नारी विमर्श के केन्द्र में ”नारी की दैहिक एवं भावात्मक संतुष्टि” है। हमारा नारी विमर्श कैसे नारी की यौन संतुष्टि एवं संतान प्राप्ति (विशेषत: पुत्र) की उसकी इच्छा को लेकर केन्द्रित है। इसे आगे के प्रसंग से समझना चाहिए।इस चर्चा से उन लोगों को उत्तर मिल जाना चाहिए जो यह मानते हैं कि – ”कामसूत्र की व्याख्या भारत में हुई। अजन्ता एलोरा तथा खजुराहों की जगहों में मूर्तिकला के विभिन्न यौनिक स्वरूप मिलते हैं। पर वैदिक संस्कृति का स्त्रीविरोध सैमेटिक धर्मों के व्यापन के दौरान भी बरकरार रहा।” (स्त्री – यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता : प्रमीला, के.पी. – अ0 4 पृ0 38) . 

आचार्य वात्सात्यन ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में लिखा है – ”धर्मार्थकमेभ्य नम:” अर्थात धर्म अर्थ और काम को नमस्कार है।” ‘धर्म’ की वैशेषिक दर्शन की परिभाषा देखें – ”यतोsभ्यदुय नि:श्रेयस सिध्दिस: धर्म:।” अर्थात इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण करने वाला तत्व ही धर्म है इस लोक में अर्थात भौतिक संसार में सुख क्या है ?
चाणक्य का कथन है –


”भोज्यं भोजन शक्तिष्च रतिषक्तिर्वरागंनां
विभवो दान शक्तिष्च नाल्पस्यतपस: कलम॥”

अर्थात भोज्य पदार्थ और भोजन करने शक्ति, रति अर्थात सैक्स शक्ति एवं सुन्दर स्त्री का मिलना, वैभव और दानशक्ति का प्राप्त होना ‘कम तपस्या’ का फल नहीं है। (चा0नी0अ02/2)

स्पष्ट है कि भारतीय हिन्दू परम्परा में ”स्त्री और सेक्स” सांसारिक सुखों का आधार है। ‘काम’ या सैक्स को लेकर कतिपय अन्य उदाहरण देखें –

कामो जज्ञे प्रथमे (अथर्ववेद – 9/12/19) कामस्तेदग्रे समवर्तत (अथर्ववेद – 19/15/17) (ऋग्वेद 10/12/18)

वृहदारव्यक में विषय-सुख की अनुभूति के लिए मिथनु अर्थात स्त्री पुरूष जोड़े की अनिवार्यता को वाणी दी गई है – ”स नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते। स द्वितीयमैच्छत।”

अर्थात किसी का अकेले में मन नहीं लगता ब्रहमा का भी नहीं। रमण के लिए उसे दूसरे की चाहना होती है।


मानव मन की मूलवासनाओं अथवा प्रवृत्तियों को हमारे आचार्यों ने इस प्रकार चिन्हित किया – ”वित्तैषणा, पुत्रषवणा तथ लोकेषणा” इनको वर्गो में रखते हुए इनके मूल में ”आनन्द के उपभोग” की प्रवृत्ति को माना है – ब्रहदारण्यक उपनिषद का कथन है – ”सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम्” अर्थात सभी सुख एकमात्र ”उपस्थ” (योनिक एवं लिंग) के आधीन हैं। (उपस्थ – योनि एवं लिंग संस्कृत हिन्दी शब्द कोष – वा0शि0आप्टे – पृ0 213)

[इस चर्चा से यह भारतीय हिन्दू दृष्टिकोण स्वत: स्पष्ट है कि भौतिक सुखों के केन्द्र में है – ”नारी और यौन सुख अर्थात सेक्स है। इस प्रकार ”हिन्दू नारी विमर्श” के लिए नारी की यौन संतुष्टि, उसके यौनाधिकार और उसकी संतानोत्पत्ति का अधिकार केन्द्र में आ जाता है। वेदों, उपनिषदों, आरण्यकों एवं नीति ग्रंथो में इसकी चर्चा है। अथर्ववेद में तो इस पर विस्तृत चर्चा देखी जा सकती है जिसे इस चार्ट से समझ सकते हैं। ]

यह कुछ उदाहरण हैं। ऐसे अनेकों काण्ड और सूक्त प्रस्तुत किया जा सकते हैं। हमारी परम्परा में ”वेदों” को ”ज्ञान” का ”इनसाइक्लोपीडिया” माना गया है। मनु कहते हैं – वेदो अखिलोs धर्म ज्ञान मूलम”।

उपरोक्त उदाहरणों एवं चर्चा से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हमने ”सहचर्य” जीवन की अनिवार्यता को कितना महत्व दिया और उस पर कितना विशद मनन एवं अध्ययन किया। प्रसंगत: यह चर्चा यहां यह भी समझने के लिए पर्याप्त है कि क्यों भारत में ही और हिन्दुओं द्वारा ही यौन रत् मूर्तियों के मन्दिर बनाये गए और क्यों ”कामसूत्र” जैसी रचना का सृजन हमारे ही देश में हुआ। प्रसंगत: बता दूं कि महर्षि वात्सायन अपनी परम्परा के अकेले ऋषि नहीं है – ”इस परम्परा में भगवान ब्रहमा, बृहस्पति, महादेव के गण नन्दी, महर्षि उददालक पुत्र श्वेतकेतु, ब्रभु के पुत्र, पाटलिपुत्र के आचार्य दत्तक, आचार्य सुवर्णनाम्, आचार्य घोटकमुख, गोनर्दीय, गोणिका पुत्र, आचार्य कुचुमार आदि। प्रारम्भ में यह ग्रंथ एक लाख अध्यायों वाला था।”

यद्यपि सुधी जन इसे विषयान्तर मान सकते हैं तदापि हिन्दुओं में कामशास्त्र (सैक्स को एक विषय के रूप में मानना) की महत्ता, परम्परा एवं विशाल साहित्य का अनुमान लगाने के लिए यह जानकारी आवश्यक है।

इतनी व्यापक चर्चा के बाद यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ”हिन्दू नारी विमर्श के केन्द्र में ”नारी की दैहिक एवं भावात्मक संतुष्टि” है। हमारा नारी विमर्श कैसे नारी की यौन संतुष्टि एवं संतान प्राप्ति (विशेषत: पुत्र) की उसकी इच्छा को लेकर केन्द्रित है। इसे आगे के प्रसंग से समझना चाहिए।

इस चर्चा से उन लोगों को उत्तर मिल जाना चाहिए जो यह मानते हैं कि – ”कामसूत्र की व्याख्या भारत में हुई। अजन्ता एलोरा तथा खजुराहों की जगहों में मूर्तिकला के विभिन्न यौनिक स्वरूप मिलते हैं। पर वैदिक संस्कृति का स्त्रीविरोध सैमेटिक धर्मों के व्यापन के दौरान भी बरकरार रहा।” (स्त्री – यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता : प्रमीला, के.पी. – अ0 4 पृ0 38) प्रमीला के.पी. जैसी नारीवादी चिन्तकों ने स्त्री-पुरूष सहचारी जीवन में आधुनिक नारी-विमर्श के सन्दर्भ में तमाम प्रश्न उठाये हैं। जिनके उत्तर स्वाभाविक रूप से इस लेख में मिल सकते हैं। जैसे उनका कथन है – ”मानव अधिकारों के नियमों की बावजूद व्यक्तिगत यौनिक चयन और प्रेम के साहस को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। क्यों ?” (इसी पु0 के इसी अ0 के पृ0 44 से) यदि आधुनिक युग की एक नारीवादी विचारिका की यह पीड़ा है तो आप समझ सकते हैं कि आधुनिक पाश्चात्य-वादी ”नारी समानता” के घाव कितने गहरे हैं।

हम सहचारी जीवन की यौनानुभूतियों की ओर चलते हैं। प्रमीला – के.पी. कामसूत्र के हवाले से लिखती हैं – ”विपरीत में कामसूत्र के अनुसार, यौनिक क्रिया में वह परम साथीवन का निभाव उपलब्ध होता है। उसके एहसास में युग्म एक स्पर्षमात्र से खुश रहते हैं। बताया जाता है कि मानव-शरीर इस तरह बनाया गया है कि उसमें यौनावयव ही नहीं किसी भी पोर में एक बार छूनेमात्र से एक नजर डाल देने मात्र से प्रेम की अथाह संवेदना जाग्रत होती है। पर यह नौबत सच्चे प्रेमियों को ही हासिल है।”

प्रोमिला जी सही जगह पर इस प्रसंग का पटाक्षेप करती हैं। वस्तुत: यौन जीवन में प्रेम के अतिरिक्त यौन उत्तेजना को पैदा करने, उसे बनाये रखने एवं सफल यौन व्यवहार एवं चरमसंतुष्टि प्रदान करने वाले संबंधों के लिए कामकला के ज्ञान की आवश्यकता होती है। स्त्री के लिए इसका विशेष महत्व होता है। ऐस वस्तुत: उसकी विशेष प्रकार की शरीर रचना के कारण होती है। कामग्रंथो यथा कामसूत्र, अनंगरंग, रतिरहस्य आदि में इसकी विशद चर्चा की गई है।

हमारा विषय कामशास्त्रीय चर्चा नहीं है किंतु यह प्रासंगिक होगा कि स्त्री के कामसुख की चर्चा कामशास्त्रीय दृष्टि से कर ली जाए। वात्सायन कृत कामसूत्र के ”सांप्रयोगिक नामक द्वितीय अधिकरण के रत-अवस्थापन” नामक अध्याय में इस विषय पर कामशास्त्र के विभिन्न शास्त्रीय विद्वानों के मतों की चर्चा की गई है। किंतु ”कामसुख” की व्यापकता की दृष्टि से आचार्य बाभ्रव्य के शिष्यों का मत अधिक स्वीकार्य प्रतीत होता है – ”आचार्य वाभ्रव्य के शिष्यों की मान्यता है – पुरूष के स्खलन के समय आनन्द मिलता है और उसके उपरान्त समाप्त हो जाता है। किन्तु स्त्री को संभाग में प्रवृत्त होते ही संभोगकाल तक और उसकी समाप्ति पर निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती है। यदि भोग में उसे आनन्द न आता होता तो उसकी भोगेच्छा जाग्रत ही नही होती और यदि भोगेच्छा न होती तो वह कभी गर्भधारण नही कर पाती। उसका गर्भ स्थिर नही रह पाता।” अन्तिम वाक्य से सहमति नहीं भी हो सकती है किंतु पूर्वार्ध से आचार्य बाभ्रव्य सहित वात्सायन भी सहमत नजर आते हैं।” इसी विषय पर श्री काल्याणमल्ल विरचित अनगरंग अनुवादक श्री डा0 रामसागर त्रिपाठी का मत जानना भी समीचीन होगा। कल्याणमल्ल दो महत्वपूर्ण बात करते हैं। वह स्त्री और पुरूष के यौनसुख में आनन्द के स्वरूप और काल की दृष्टि से भेद स्वीकार नही करते हैं। स्त्री इस क्रिया में आधार है और पुरूष कर्ता है। पुरूष भोक्ता है अर्थात वह इस बात से प्रसन्न है कि उसने अमुक महिला को भोगा है और महिला इस बात से प्रसन्न है कि वह अमुक पुरूष द्वारा भोगी गई है। इस प्रकार स्त्री पुरूष में उपाय तथा अभिमान में भेद होता है। अस्तु:! इस विषय पर और चर्चा न करके यह स्वीकारणीय तथ्य है कि – ”यौन क्रिया में पुरूष को सुख की प्राप्ति स्खलन पर होती है उसके लिए शेष कार्य यहां तक पहुंचने की दौड़मात्र है जबकि स्त्री प्रथम प्रहार से आनन्दित होती है और अन्तिम् बिन्दु पर चरमानन्द को प्राप्त करती है।” वार्ता करने पर कुछ महिलाओं ने इस तथ्य की पुष्टि की है किंतु शालीनता साक्ष्य के प्रकटीकरण की सहमति नहीं देती।

अब जरा इस बात पर ध्यान दें कि यदि नारी असंतुष्ट छूट जाए तो क्या होता है। मेरा मानना है कि वह शनै: शनै: इस प्रवृत्ति को दबाये रखने की आदत डाल लेती हैं इसके कारण उसका शरीर और भावजगत अनेक प्रतिक्रियायें उत्पन्न करता है जिसमे ंउसकी यह गूढ़ प्रवृत्ति भी शामिल है। जो स्वंय के अन्तरमन को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं देती। हिन्दू नारी विमर्श का मूल आधार उसके शरीरगत और भावगत यौनानुभूतियों का वैषम्य है। इसे किस प्रकार हिन्दू नारी विषयक वैदिक चिंतन अभिव्यक्त करता है। उन्हें इन शीर्षकों में देखना उचित होगा।

वर चयन की स्वतंत्रता एवं विवाह :- यदि वैदिक साहित्य का अनुशीलन किया जाए तो यह स्वत: स्पष्ट हो जायेगा कि स्त्रियों को वर-चयन में स्वतंत्रता प्राप्त थी। डा0 राजबली पाण्डेय अपनी पुस्तक हिन्दू संस्कार के अध्याय आठ ”विवाह संस्कार” में विवाह के उद्भव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं – ”प्रसवावस्था के कठिन समय में अपने व असहाय शिशु के समुचित संरक्षण के लिए स्त्री का चिन्तित होना स्वाभाविक ही था। जिसने उसे स्थायी जीवन सहयोगी चुनने के लिए प्रेरित किया। इस चुनाव में वह अत्यन्त सतर्क थी तथा किसी पुरूष को अपने आत्म समर्पण के पूर्व उसकी योग्यता, क्षमता व सामर्थ्य का विचार तथा सावधानीपूर्वक अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंचना उसके लिए अत्यन्त आवश्यक था।” इस विषय को महाभारत में वर्णित ”प्राग् विवाह स्थिति से भी समझा जा सकता है, ”अनावृता: किल् पुरा स्त्रिय: आसन वरानने कामाचार: विहारिण्य: स्वतंत्राश्चारूहासिनि॥ 1.128

अर्थात अति प्राचीन काल में स्त्रियां स्वतंत्र तथा अनावृत थीं और वे किसी भी पुरूष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित कर सकती थी।”
इस स्थिति से समझौता कर उन्होने विवाह संस्था को स्वीकार किया होगा तो यह तो संभव नही कि पूर्णत: पुंस आधिपत्य स्वीकार कर लिया हो अर्थात पुरूष जिससे चाहें विवाह कर ले और स्त्री की इच्छा का कोई सम्मान न हो। वर चयन की स्वतंत्रता के समर्थन में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि ”औछालकि पुत्र श्वेतकेतु” को विवाह संस्था की स्थापना का श्रेय जाता है और यह कि इन महर्षि की गणना ”कामशास्त्र” के श्रेष्ठ आचार्यों में की जाती है। अत: विवाह संस्था की स्थापना करते समय इस ऋषि ने स्त्री की यौन प्रवृत्तियों का ध्यान न रखा हो, यह संभव नही।

एक अन्य उदाहरण के रूप में इस पुराकथा को प्रमाणरूप ग्रहण किया जा सकता है। – ”मद्रदेश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत रूपवती थी। उसने अपने लिए स्वंय पर खोजना प्रारम्भ किया और अन्त में शाल्व नरेश सत्यवान का चयन कर विवाह किया।” यह वही सावित्री है जिसने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे और हिन्दू मानस में जो सती सावित्री के नाम से प्रसिध्द हुई। डा0 राधा कुमुद मुखर्जी ”हिन्दू सभ्यता” अध्याय 7 भारत में ऋग्वेदीय ”आर्य – समाज – विवाह और परिवार” पृ0 91 में यह स्वीकार करते हैं कि – ”विवाह में वर वधू को स्वंयवर की अनुमति थी (10/27/12 ऋग्वेद) गुप्त काल में ”कौमुदी महोत्सव” मनाये जाने के प्रमाण मिलते हैं कौमुदी महोत्सव वस्तुत: मदनोत्सव या कामदेव की पूजा का ही उत्सव था। ऐसे उत्सव जहां बच्चो, प्रौढ़ो तथा वृध्दों के लिए सामान्य मनोरंजन ही प्रदान करते हैं वही युवक-युवतियों के लिए पारस्परिक चयन की स्वतंत्रता प्रदान करते थे। आज भी ”बसन्त पंचमी” का त्यौहार मनाया जाता है जो कामदेव की पूजा ही है। ”बसन्तपंचमी” से होली का महोत्सव या फाल्गुनी मस्ती और हंसी ठिठोली छा जाती है। इस मदनोत्सव का समापन ”होलिका दाह” पर होता है और होली के पश्चात ”नवदुर्गो” के पश्चात लगनों से विवाह कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं।
 …….  ( क्रमश:)

सम्पादन – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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वैदिक परिप्रेक्ष्य और यौनिक स्वच्छ्न्दता की तलाश में आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी कुंठा (भाग – 1) [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

इस चर्चा से यह भारतीय हिन्दू दृष्टिकोण स्वत: स्पष्ट है कि भौतिक सुखों के केन्द्र में है – ”नारी और यौन सुख अर्थात सेक्स है। इस प्रकार ”हिन्दू नारी विमर्श” के लिए नारी की यौन संतुष्टि, उसके यौनाधिकार और उसकी संतानोत्पत्ति का अधिकार केन्द्र में आ जाता है। वेदों, उपनिषदों, आरण्यकों एवं नीति ग्रंथो में इसकी चर्चा है। अथर्ववेद में तो इस पर विस्तृत चर्चा देखी जा सकती है ….

हम जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा करते हैं तो यह चर्चा स्त्री-पुरूष समानता के चौराहे से चलकर स्त्री की देह पर समाप्त हो जाती है। लैंगिक समानता का अभिप्राय जहां एक ओर पुरूष के साथ काम के अवसरों की समानता से लगाया जाता है वहीं दूसरी ओर उसकी यौनिक आजादी से भी। मेरा मानना है कि स्वतंत्रता की अन्य विधाओं की तरह यौन संबंधी आजादी दिए जाने में भी कोई परहेज नहीं होना चाहिए बशर्तें इस बात का ध्यान रखा जाए कि जहां से मेरी नाक शुरू होती है वहीं से आप की आजादी समाप्त हो जाती है। किंतु महिलाओं के क्षेत्र में यही पेंच है। मसलन अगर कोई महिला शार्ट नेकर या माइक्रो मिनी स्कर्ट के साथ स्पोटर्स ब्रा पहन कर सार्वजनिक मार्ग पर घूमना चाहे तो उस पर अश्लीलता के आरोप में कानूनी कार्यवाही हो सकती है। यह देश आज भी किसी युवा स्त्री के सार्वजनिक स्थान पर नग्न होने की धमकी मात्र से सहम जाता है और फिर रूपहले पर्दे पर देख-देखकर अपने सपनों में ”चेयर खींचने के 

बाद (दीपिका की) स्कर्ट खींचने” को बेताब तमाम, बेटा, बाप और बाबा की उम्र के पुरूष एक साथ अपने-अपने मन में ख्बाब सजाने लगते हैं। नारीवादी महिलाएं इस तथ्य को नारीवादी अधिकारो में शामिल किए जाने पर बहस कर सकती हैं।

इस संस्कृति से एक ओर जहां ”सोशलाइट नारी” निकलती है वहीं दूसरी ओर वह नारी दिखाई देती है जिसकी ”देह” साम्राज्यवादी – बाजार वाद में स्वंय के नित नए रूप प्रदर्शित करती है। एक शब्द ”ग्लैमर” ने ”नारी-बाजार-वाद और वस्त्र-वातायन से झांकते नारी देह दर्शन को” पर्यायवाची बना दिया है। अभी थोड़े दिनों पूर्व महिला टेनिस में ग्लैमर के नाम पर खिलाड़ियों को ”माइक्रो टाइप” स्कर्ट को टेनिस प्रबंधन द्वारा अनिवार्य करने पर मीडिया में बहस छिड़ी थी सामान्यत: महिला खिलाड़ी शार्ट्स (छोटे नेकर) पहन कर ही खेलती है जिनमें जांघो का पर्याप्त हिस्सा खुला ही रहता है तो फिर और ”ग्लैमर” क्या ? बाजार बाद देखिए इस प्रश्न पर कोई बहस नहीं। मैं बताता हूं कि ”मिनी स्कर्ट” खेल के दौरान जब उडेग़ी तो कैमरों की ”फ्लश लाइटस” के बीच खिलाड़ी की ”पेन्टी दर्शना” तस्वीरें भी एक बड़े ब्राण्ड के रूप में बिकेंगी। इस मायावी दुनिया को ”पूनम पाण्डेय” के सार्वजनिक रूप से नंगे होने से डर नहीं लगता अपितु अपनी नंगई चौराहे पर खुलने का डर सताने लगता है। ”पूनम” के ”नंगा” होने का तो ”ड्रेसिंग रूम” में स्वागत है इसीलिए एक बयान के बाद ही उसे करोड़ो के शो आफर हो जाते हैं।

किंतु आश्चर्य यह है कि प्रगतिशीलता का लेबल चिपकाए नारीवादी संगठनो की विचारक और नेत्रियां स्वंय को ”फेमिनिस्ट” या नारीवादी कहे जाने के डर से नारी हितों के मुद्दों पर खुलकर बहस करने से बचना चाहती हैं।

इस तरह के बाजार वाद में नारी की स्वतंत्र अस्मिता, पहचान और जरूरतें कहीं शोरगुल में दब जाती हैं और पुरूष के समान अधिकार दिए जाने की धुन में ”पुरूष टाइप महिला” का चित्र उभर आता है। यह महिला बड़ी आसानी से बाजारवादी साम्राज्य वाद की भेंट चढ़ जाती है। यही तथा कथित आधुनिक महिला है जो उच्च वर्गीय पार्टियों में अल्प वस्त्रों और शराब की चुस्कियों के साथ पुरूष के साथ डांस पार्टियों का मजा उठाते हुए पुरूष के समान अधिकार प्राप्त करने, उसके साथ बराबरी में खड़ा होने और आधुनिक होने का दम भरती है और आसानी से बिना जाने बाजार वाद और पुरूष शोषण का शिकार हो जाती है।

यही है आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी-विमर्श। हम वैदिक धर्मानुयायियों अर्थात हिन्दुओं पर ”पिछड़ा” होने के आरोप युगों से चस्पा है और नारी के मामले में हमारी सोच को विदेशी ही नहीं हम भी दकियानूसी मानते हैं। ऐसे में ”नारी की आजादी” को मैंने इस चश्मे से ही देखने का प्रयास किया है।

आधुनिक ”नारी-विमर्श” जहां ”पुरूषों के साथ काम की समानता” और ”नारी देह” पर पुंस वर्चस्व” को तोड़ने के मिथ से ग्रसित है वहीं हिन्दू नारी विमर्श ”नारी देह एवं भाव जगत” की मूलभूत आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर रचा गया है। पुरूष दोनो ही जगह लाभ की स्थिति में है किंतु वैदिक व्यवस्था में नारी बाजार वाद की होड़ से थोड़ा दूर है। अपनी यौनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक हद तक समाज का समर्थन प्राप्त करती है तो वहीं पुरूष भी समाज में एकाधिकारीवादी वर्चस्व का एकमात्र केन्द्र बन कर नहीं उभर पाता। वस्तुत: यह स्थिति एक ”आदर्श” है जो इतिहास के थपेड़ो से शनै: शनै: टूटते हुए इस हद तक जा पहुंची कि इस विषय पर हम दकियानूसी सोच वाले लोग सिध्द किए जाने लगे।

इस विषय पर नारी की चर्चा बिना उसकी ”देह और यौन” की चर्चा के नही हो सकती। आधुनिक ”बोल्ड नारी” के युग मे मै समझता हूं मेरा आलेख मेरी इतनी ”बोल्डनेस” स्वीकार कर लेगा और मेरे पाठक भी।

नारी की गूढ़ता और पुरूष की स्वाभाविक गंभीरता एवं उच्छंखलता के मध्य उनके यौनागों की बनावट एवं तज्जन्य उसकी अनुभूतियों में कहीं कोई संबंध तो नहीं। इस प्रश्न ने मेरे मन को अनेक बार मथा है। मैं समझता हूं कि भारत संवभत: पहला देश और ”हिन्दू” पहली संस्कृति रही होगी जिसने ”काम” सेक्स को देवता कहा और इस विषय पर विस्तृत शोध ग्रंथो की रचना की। इसकी चर्चा यहां हमारा उद्देश्य नहीं है किन्तु ‘काम’ या ‘सेक्स’ की भारतीयों की दृष्टि में महत्ता को स्पष्ट करना चाहूंगा।

आचार्य वात्सात्यन ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में लिखा है – ”धर्मार्थकमेभ्य नम:” अर्थात धर्म अर्थ और काम को नमस्कार है।” ‘धर्म’ की वैशेषिक दर्शन की परिभाषा देखें – ”यतोsभ्यदुय नि:श्रेयस सिध्दिस: धर्म:।” अर्थात इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण करने वाला तत्व ही धर्म है इस लोक में अर्थात भौतिक संसार में सुख क्या है ?   …….  ( क्रमश:)

सम्पादन – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

तब अन्ना अब रामदेव …. [राजनीतिक विश्लेषण] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन पर आपत्ति में फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और पत्रकार भी थे… उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता।

…… इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। …. जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर।

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता।

रामलीला मैदान,नई दिल्ली। इतिहास के पन्नो पर दर्ज हुई तारीख 4/5.06.2011 रात्रि 1.30 AM बजे लगभग। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट एवं पंतजलि योगपीठ के स्रष्टा, योग उद्धारक महान योगगुरू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अपराध देश की लाखों करोड़ सम्पति विदेशी बैंको में जमा करने वाले भ्रष्टाचारियों को मौत की सजा की माँग, अवैध काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने की माँग, शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं में देने की माँग इत्यादि।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब-जब निर्लिप्त, अनासक्त सन्यासियों, त्यागी वीतरागी, महापुरूषों ने मदान्ध सत्ताओं को राष्ट्रहित, मानवहित, समझानें का प्रयास किया है, तब-तब सत्ताओं ने, सत्ताशीर्ष पर बैठे मदान्धों ने उन्हें ऐसे ही दुत्कारा है, प्रताडित किया है। अपमानित किया है।

आप ईसा से लगभग 325 वर्ष पूर्व का महापदम नन्द का पाटलिपुत्र का वह राजदरबार याद करिये जब वीतरागी विचारक आचार्य चाणक्य विदेशी आक्रान्ताओं से राष्ट्रहित में राजा को सावधान करने जाते है और अपमानित होकर नन्दों के समूल विनाश की भीष्म प्रतिज्ञा करते है। ऐसी ही मदान्ध सत्ता सहस्त्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन की त्रेतायुग की याद करिए। जब तपस्यारत सन्यासी जमदग्नि के आश्रम को नष्ट भ्रष्ट कर हत्याएं की जाती है। और वीतरागी ‘राम’ परशुराम बन जाते है। उसी युग के वह दृष्य भी याद करिए जब अपनी तरह से अपनी जीवन पध्दति जीने वाले आर्यो को रावण की राक्षसी सत्ता जीने नही देती। दमन हत्याओं और रक्तपात से आर्यो की जीवन पध्दति ही संकट में पड जाती है। और इस सत्ता के विरूध्द संघर्ष का बिगुल बजाते हैं दो वीतरागी सन्यासी महान गाधितनय विश्वामित्र जो राम और लक्ष्मण को लेकर देश की आन्तरिक शक्तियों को संगठित करके एक सूत्र में राम के नेतृत्व में खडा करते हैं और दूसरे महान अगस्त जो दुश्मन की सीमा पर बैठकर राम के लिए शक्ति का संगठन करते है। इस देश में यह परम्परा कभी टूटी ही नहीं। गुरूगोविन्द सिंह, वीर वन्दा वैरागी, सन्यासी क्रान्ति, स्वामी दयानन्द एवं विवेकानन्द का जागरण, स्वामी श्रध्दानन्द का बलिदान, सावरकर बंधु महात्मा गाँधी से लेकर विनोवा और जयप्रकाश नारायण तक। और अब पूज्य अन्ना हजारे एवं संत श्री योगगुरू बाबा रामदेव।

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन में लोगों ने बाबा के आन्दोलन करने पर आपत्ति जताई। इनमें फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और ऐसे पत्रकार भी थे जो स्वयं को हिन्दू दर्शन का मर्मज्ञ मानते है। उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता। कुछ ने कहा…. वह व्यवसायी है। तो कुछ ने कहा बाबा संप्रदायिक ताकतों के साथ है। इत्यादि। इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। किसी ने यह भी नही बताया कि बाबा कौन सा मिलावट का व्यापार कर रहा है। अस्तु । जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता। बाबा इसलिए तो निशाने पर नही कि वह हिन्दु पुन: जागरण के प्रतीक न बन जाएं। आपको याद होगा राहत फतेह अली खान पाकिस्तानी गायक का फेरा में गिरफतारी का मामला। सारे नियम कानून ताक पर रखकर उसे छोड़ दिया गया किन्तु उसका भारत स्थित हिन्दू सचिव शायद आज तक जेल में है। सैकडों आतंकवादियों को फांसी देने की फाईल प्रधानमंत्री कार्यालय से राष्ट्रपति कार्यालय तक नही सरकती चाहे लोग आतंकियो को फांसी देने के लिए आत्मदाह ही क्यो न करें किन्तु बाबा का तम्बू आम नागरिक अधिकारों को कुचलते हुए रात्रि 1:30 बजे उखाड़ने का निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय और सोनिया जी ले लेती हैं और पुलिस के वीर सफलता भी हासिल कर लेते है।

एक और मजाक देखें। सोनिया जी के नेतृत्व में सरकार एवं काग्रेस के नुमाइन्दों की उच्चस्तरीय बैठक होती है और उसके बाद के काग्रेसी बयानों से स्पष्ट है छवि मलीनीकरण की राजनीति उच्च पदस्थ काग्रेसियों एवं सरकार की शह पर हो रही है। 1993 के बाद से जो सरकार दाउद को नही पकड़ सकी वह आधी रात में शान्ति प्रिय नागरिकों को पुलिसिया अन्दाज से भगा देती है। जन्तर-मन्तर जहाँ 8 तारीख को अन्ना हजारे को अनशन करना था वहॉ दफा 144 लगा देती है। और मोदी का मर्सिया पढ़ने वाले नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वाले, राजनेता, बुध्दिजीवी राजनीतिक दल, मीडिया चैनल कुम्भकर्णी नींद में सोते रहते है। इतना ही नहीं कुछ चैनल तो सरकार की छवि-दूषक संस्कृति के ध्वजा वाहक बन जाते है। न ऐसा पहली बार हुआ है और न आखिरी बार।

ऐसा क्यो होता है? …

वस्तुत यह देश 712 ए0डी0 के बाद से ही निरन्तर दबाया गया है … कुचला गया है। फिर भी भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं जरा सा खाद पानी मिलता है तो अमर बेल की तरह बढ़ने लगती हैं। कांग्रेस को बस यही दर्द है। भारतीय राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद तक जाता है जिससे गैर हिन्दू राष्ट्रवादी संस्थाओं को अपनी सत्ता, सुख-चैन सब … छिनता दिखाई देता है। ऐसा कोई भी आंदोलन जिससे भारत मजबूत होगा चाहे वह अन्ना करे या बाबा रामदेव। अगर वह व्यवस्था परिवर्तन से जुड़ा है तो सरकारें उसे कुचलेंगी ही क्योंकि वह भारतीय/हिन्दू राष्ट्रवाद का जनक बन सकता है। अन्यथा यह मजाक नही तो क्या है। कि पिछले दो दशक से बाबा रामदेव, उनके सहयोगी और उनकी संस्थाए काम कर रही है किन्तु सरकार को आज उनमें कोई नेपाली गुण्डा नजर आता है तो संस्थाए करचोर। विडम्बना देखिये …. आज बाबा को व्यापारी कहकर वह सरकार निन्दा कर रही है जिसने विशुध्द भारतीय व्यापारी संत सिंह चटवाल (अमेरिका-प्रवासी) को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया है। क्या सरकार बता सकती है कि श्री चटवाल का देश के विकास में कितना अमूल्य योगदान है?

अब आगे क्या?

बाबा अनशन पर हैं और अन्ना ने लोकपाल बैठकों का बहिष्कार कर दिया है। जनता स्तब्ध है। भगवा ब्रिगेड जो स्वयं को भारतीय राष्ट्रवाद का स्वयंभू लम्बरदार मानती है मौके को भुनाने की कोशिश में हैं/ऐसे में आगे क्या? भारतीय राष्ट्र के लिए आगे के दिन उथल-पुथल भरे हैं और सरकार के लिए मुश्किल पैदा करने वाले। ऎसे में यदि सर्वोच्च न्यायालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है तो शायद बाबा और हजारे को भी अनशन नहीं अपितु जनान्दोलन करना पडेगा। अनशन भी जनान्दोलन का ही एक तरीका है किन्तु यहाँ कारागर होगा कहना मुश्किल है। संभव है कि उच्चतम् न्यायालय के निर्देश और निगरानी में बाबा का डेरा फिर दिल्ली में ही जम जाए।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।