वैदिक परिप्रेक्ष्य और यौनिक स्वच्छ्न्दता की तलाश में आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी कुंठा (भाग – 1) [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

इस चर्चा से यह भारतीय हिन्दू दृष्टिकोण स्वत: स्पष्ट है कि भौतिक सुखों के केन्द्र में है – ”नारी और यौन सुख अर्थात सेक्स है। इस प्रकार ”हिन्दू नारी विमर्श” के लिए नारी की यौन संतुष्टि, उसके यौनाधिकार और उसकी संतानोत्पत्ति का अधिकार केन्द्र में आ जाता है। वेदों, उपनिषदों, आरण्यकों एवं नीति ग्रंथो में इसकी चर्चा है। अथर्ववेद में तो इस पर विस्तृत चर्चा देखी जा सकती है ….

हम जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा करते हैं तो यह चर्चा स्त्री-पुरूष समानता के चौराहे से चलकर स्त्री की देह पर समाप्त हो जाती है। लैंगिक समानता का अभिप्राय जहां एक ओर पुरूष के साथ काम के अवसरों की समानता से लगाया जाता है वहीं दूसरी ओर उसकी यौनिक आजादी से भी। मेरा मानना है कि स्वतंत्रता की अन्य विधाओं की तरह यौन संबंधी आजादी दिए जाने में भी कोई परहेज नहीं होना चाहिए बशर्तें इस बात का ध्यान रखा जाए कि जहां से मेरी नाक शुरू होती है वहीं से आप की आजादी समाप्त हो जाती है। किंतु महिलाओं के क्षेत्र में यही पेंच है। मसलन अगर कोई महिला शार्ट नेकर या माइक्रो मिनी स्कर्ट के साथ स्पोटर्स ब्रा पहन कर सार्वजनिक मार्ग पर घूमना चाहे तो उस पर अश्लीलता के आरोप में कानूनी कार्यवाही हो सकती है। यह देश आज भी किसी युवा स्त्री के सार्वजनिक स्थान पर नग्न होने की धमकी मात्र से सहम जाता है और फिर रूपहले पर्दे पर देख-देखकर अपने सपनों में ”चेयर खींचने के 

बाद (दीपिका की) स्कर्ट खींचने” को बेताब तमाम, बेटा, बाप और बाबा की उम्र के पुरूष एक साथ अपने-अपने मन में ख्बाब सजाने लगते हैं। नारीवादी महिलाएं इस तथ्य को नारीवादी अधिकारो में शामिल किए जाने पर बहस कर सकती हैं।

इस संस्कृति से एक ओर जहां ”सोशलाइट नारी” निकलती है वहीं दूसरी ओर वह नारी दिखाई देती है जिसकी ”देह” साम्राज्यवादी – बाजार वाद में स्वंय के नित नए रूप प्रदर्शित करती है। एक शब्द ”ग्लैमर” ने ”नारी-बाजार-वाद और वस्त्र-वातायन से झांकते नारी देह दर्शन को” पर्यायवाची बना दिया है। अभी थोड़े दिनों पूर्व महिला टेनिस में ग्लैमर के नाम पर खिलाड़ियों को ”माइक्रो टाइप” स्कर्ट को टेनिस प्रबंधन द्वारा अनिवार्य करने पर मीडिया में बहस छिड़ी थी सामान्यत: महिला खिलाड़ी शार्ट्स (छोटे नेकर) पहन कर ही खेलती है जिनमें जांघो का पर्याप्त हिस्सा खुला ही रहता है तो फिर और ”ग्लैमर” क्या ? बाजार बाद देखिए इस प्रश्न पर कोई बहस नहीं। मैं बताता हूं कि ”मिनी स्कर्ट” खेल के दौरान जब उडेग़ी तो कैमरों की ”फ्लश लाइटस” के बीच खिलाड़ी की ”पेन्टी दर्शना” तस्वीरें भी एक बड़े ब्राण्ड के रूप में बिकेंगी। इस मायावी दुनिया को ”पूनम पाण्डेय” के सार्वजनिक रूप से नंगे होने से डर नहीं लगता अपितु अपनी नंगई चौराहे पर खुलने का डर सताने लगता है। ”पूनम” के ”नंगा” होने का तो ”ड्रेसिंग रूम” में स्वागत है इसीलिए एक बयान के बाद ही उसे करोड़ो के शो आफर हो जाते हैं।

किंतु आश्चर्य यह है कि प्रगतिशीलता का लेबल चिपकाए नारीवादी संगठनो की विचारक और नेत्रियां स्वंय को ”फेमिनिस्ट” या नारीवादी कहे जाने के डर से नारी हितों के मुद्दों पर खुलकर बहस करने से बचना चाहती हैं।

इस तरह के बाजार वाद में नारी की स्वतंत्र अस्मिता, पहचान और जरूरतें कहीं शोरगुल में दब जाती हैं और पुरूष के समान अधिकार दिए जाने की धुन में ”पुरूष टाइप महिला” का चित्र उभर आता है। यह महिला बड़ी आसानी से बाजारवादी साम्राज्य वाद की भेंट चढ़ जाती है। यही तथा कथित आधुनिक महिला है जो उच्च वर्गीय पार्टियों में अल्प वस्त्रों और शराब की चुस्कियों के साथ पुरूष के साथ डांस पार्टियों का मजा उठाते हुए पुरूष के समान अधिकार प्राप्त करने, उसके साथ बराबरी में खड़ा होने और आधुनिक होने का दम भरती है और आसानी से बिना जाने बाजार वाद और पुरूष शोषण का शिकार हो जाती है।

यही है आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी-विमर्श। हम वैदिक धर्मानुयायियों अर्थात हिन्दुओं पर ”पिछड़ा” होने के आरोप युगों से चस्पा है और नारी के मामले में हमारी सोच को विदेशी ही नहीं हम भी दकियानूसी मानते हैं। ऐसे में ”नारी की आजादी” को मैंने इस चश्मे से ही देखने का प्रयास किया है।

आधुनिक ”नारी-विमर्श” जहां ”पुरूषों के साथ काम की समानता” और ”नारी देह” पर पुंस वर्चस्व” को तोड़ने के मिथ से ग्रसित है वहीं हिन्दू नारी विमर्श ”नारी देह एवं भाव जगत” की मूलभूत आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर रचा गया है। पुरूष दोनो ही जगह लाभ की स्थिति में है किंतु वैदिक व्यवस्था में नारी बाजार वाद की होड़ से थोड़ा दूर है। अपनी यौनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक हद तक समाज का समर्थन प्राप्त करती है तो वहीं पुरूष भी समाज में एकाधिकारीवादी वर्चस्व का एकमात्र केन्द्र बन कर नहीं उभर पाता। वस्तुत: यह स्थिति एक ”आदर्श” है जो इतिहास के थपेड़ो से शनै: शनै: टूटते हुए इस हद तक जा पहुंची कि इस विषय पर हम दकियानूसी सोच वाले लोग सिध्द किए जाने लगे।

इस विषय पर नारी की चर्चा बिना उसकी ”देह और यौन” की चर्चा के नही हो सकती। आधुनिक ”बोल्ड नारी” के युग मे मै समझता हूं मेरा आलेख मेरी इतनी ”बोल्डनेस” स्वीकार कर लेगा और मेरे पाठक भी।

नारी की गूढ़ता और पुरूष की स्वाभाविक गंभीरता एवं उच्छंखलता के मध्य उनके यौनागों की बनावट एवं तज्जन्य उसकी अनुभूतियों में कहीं कोई संबंध तो नहीं। इस प्रश्न ने मेरे मन को अनेक बार मथा है। मैं समझता हूं कि भारत संवभत: पहला देश और ”हिन्दू” पहली संस्कृति रही होगी जिसने ”काम” सेक्स को देवता कहा और इस विषय पर विस्तृत शोध ग्रंथो की रचना की। इसकी चर्चा यहां हमारा उद्देश्य नहीं है किन्तु ‘काम’ या ‘सेक्स’ की भारतीयों की दृष्टि में महत्ता को स्पष्ट करना चाहूंगा।

आचार्य वात्सात्यन ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में लिखा है – ”धर्मार्थकमेभ्य नम:” अर्थात धर्म अर्थ और काम को नमस्कार है।” ‘धर्म’ की वैशेषिक दर्शन की परिभाषा देखें – ”यतोsभ्यदुय नि:श्रेयस सिध्दिस: धर्म:।” अर्थात इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण करने वाला तत्व ही धर्म है इस लोक में अर्थात भौतिक संसार में सुख क्या है ?   …….  ( क्रमश:)

सम्पादन – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
Advertisements

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. DR. ANWER JAMAL
    जून 18, 2011 @ 04:48:57

    आपकी सीरीज़ दिलचस्प लगी ।

    प्रतिक्रिया

  2. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    जून 18, 2011 @ 18:08:33

    दूसरा भाग?

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: