चक्रव्यूह में … अभिमन्यु …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

घिर गया है फिर…..
चक्रव्यूह में …
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
‘शोणित पत्र’ करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
 इस राष्ट्र के गर्भ से

अन्ना ! आपको वंदेमातरम किंतु आपत्तियों के साथ ….[आलेख ]- शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….. पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं।

….. अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

…… देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

आज हमने अपनी आंखो से देखा, अनुभव किया कि एक व्यक्ति का आत्मिक बल कैसे जनसमुद्र में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उठा देता है। सत्ताएं झुकती हैं और सिंहासन कांपने लगते हैं। अस्तु: आपने सिद्ध कर दिया कि – दिल दिया है जान भी देंगे ऐ! वतन तेरे लिए केवल एक बालीवुडिया गीत नहीं है। कोर्इ देश का दीवाना इसे मंत्र भी बना देता है। यह हमने आज जाना। हमने आज यह भी जाना कि कैसे व्यवस्थाएं लोकचेतना को अपने लिए खतरा मान लेती है और भयग्रस्त हो आपसी मतभेद भुलाकर व्यवस्था के स्तम्भ जनचेतना के विरोध में एक हो जाते हैं। हमें यह भी पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं। ऐसे आंदोलनों को जाति और मजहब के नाम पर अथवा आर०एस०एस० का भय दिखाकर तोड़ने की कोशिश करने वाले सियासतदां, बुद्धिजीवी और पत्रकारों के चेहरे भी देखे तो जनचेतना द्वारा इनको दिया गया मौन जवाब भी। ऐसे चैनलों पर भी निगाह गर्इ जो जन सरोकारों से पर्याप्त दूरी बनाये रहे। पर अंत भला तो जग भला। अन्तत: अण्णा जीत गए। भारत की जनता अर्थात भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हम भारत के लोग विजयी हुए और विजयी हुर्इ संविधान में वर्णित व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, अखण्डता व पंथनिरपेक्षता। 



अन्ना..!   राष्ट्र का प्रणाम आप स्वीकार करें जयहिन्द ! वंदेमातरम। 

पर अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

1- संस्था बनाम लोकतंत्र :- कतिपय संस्थाएं संवैधानिक होती हैं और लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। किंतु संस्थाएं बड़ी आसानी से चुनिन्दा मस्तिष्कों की साजिश का शिकार हो जाती हैं और फिर उनके स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम। यह बात भारतीय जनतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं को लेकर अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं। आखिर लोकतंत्र का मंदिर संसद भी किस तरह से जनचेतना के बहाव को समझने में इतना वक्त लगाता रहा। यह बात इसी से स्पष्ट हो जाती है। आपका लोकपाल भी कलावती वाले राहुल बाबा की कृपा से निर्वाचन आयोग की तरह संवैधानिक संस्था बनने वाला है। शेषन जी… ! हैं तो सावधान। राहुल जी को लगता है कि निर्वाचन आयोग की तरह लोकपाल के संवैधानिक संस्था बनाने पर कसबल ढीले किए जा सकते हैं। अत: कृपया भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में ग्राम संसद जैसा कि आप कहते हैं (ग्राम सभा) को भी अधिकार प्रदान किए जायें।

2- ग्राम संसद (सभा) और भ्रष्टाचार :- आप ग्राम सभा को ग्राम संसद कहते हैं और देश की संसद से बड़ा मानते हैं, तो भ्रष्टाचार से निपटने में ग्राम सभा के खुले सत्र के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को जनतंत्र की रक्षा का दायित्व क्यों न दिया जाए। ग्राम सभाएं अपने ग्रामों के लिए कानून बनाएं, उनका पालन कराएं। सीमित मात्रा में न्याय करें और एक ग्राम में काम करने वाले सभी सरकारी कर्मचारी ग्राम सभा के बहुमत के निर्णय के अन्तर्गत हों। यहां मतदान अनिवार्य हो।

3- सरकारी कर्मचारी बनाम प्राइवेट संस्थाएं, एन.जी.ओ. आदि :- जो त्रि सूत्रीय प्रस्ताव संसद ने पास किया है उससे गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) कम्पनियां, फर्में, ट्रस्ट के विषय में सिथति स्पष्ट नहीं है। यदि यह संस्थाएं लोकपाल की जांच के दायरे में नहीं तो क्या मजाक है। 50रू० घूस खाने वाला लेखपाल या चपरासी की जांच लोकपाल करेगा और करोड़ो का फण्ड डकारने वाले एन. जी.ओ.ट्रस्ट कम्पनियां और उनके उच्च वेतनभेागी सी.र्इ.ओ. इसकी जांच से दूर। इनमें से तमाम खुद तो आयकर देते नहीं और चंदा लेकर दूसरों को भी टैक्स चोरी में मदद करते हैं।

4- लोकपाल कहीं वकीलों की आय का जरिया न बन जाए :- देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

5- वकीलों की सामाजिक जिम्मेदार और जूरी :- इस देश की बहुसंख्यक जनता 20 रू प्रतिदिन व्यय कर सकती है। इनमें से तमाम लोग कानूनी पचड़ो में पड़ जाते हैं। सरकारी नि:शुल्क सलाहकार संस्थाएं हैं फिर भी मुकदमा यही लोग लड़ाते हैं। न तो इनकी फीस तय न जिम्मेदारी। लाखों रू0 प्रति पेशी पर लेते हैं इनका भी कुछ किया होता और हां जब लोकपाल आरोप तय करती तो जूरी को भी जगह देते ताकि जनलोकपाल वास्तव में जनता को ताकत देता दिखार्इ देता।

अन्ना ! कहीं ऐसा न हो कि आपके लोगों की कठपुतली सरीखा हो लोकपाल। एक और संस्था। भगवान बचाए इन संस्थाओं से। समस्या भ्रष्टाचार से लड़ने में आम नागरिक की सक्षमता व सहयोग की है न कि संस्थाओं को खड़ा करने की। और हाँ सांसदों का वी.वी.आर्इ.पी. दर्जा अर्थात संसदीय दायित्वों के औचित्य पूर्ण निर्वहन के अतिरिक्त सारे कार्य जांच के दायरे में हों। ठीक बात है किंतु जन लोकप्रियता के सहारे संसद को बंधक जैसी स्थिति में पहुंचा देना, हमारे प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए कहां तक उचित है विचारणीय है। बातें और भी हैं पर अभी तो आप की यानी अपनी जीत का जश्न मनाना है।

प्रणाम अन्ना प्रणाम युवाभारती … जय हिन्द [इतिहास] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

अन्ना के ऐतिहासिक जनलोकपाल आन्दोलन के लिये विगत 12 दिनों से चले आ रहे अनशन की समाप्ति की घोषणा का वह ऐतिहासिक पल अभी कुछ समय पूर्व ही भोगा है। अपार जन समूह और मेस में टी वी के सामने बैठे हुये सैनिकों के समूह जब राष्ट्रगान की टी वी पर की जाने वाली अपील पर अन्ना की सावधान की आवाज पर सावधान मुद्रा में खड़े होकर टी वी की ध्वनि के साथ साथ जनगण मन गा रहे थे तो किसी को भी रोमांच होना स्वाभाविक ही है… भोगा है पल पल इस इतिहास को और जिया भी है।

जय हो भारतीय गणतंत्र और अन्ना के अहिंसात्मक आन्दोलन की। 12 दिन ….. और कहीं कोई हुड़्दंग नहीं। वह भी तब जब कि व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर मिस्र और सीरिया सहित हमारे पड़ोस में भी निरीह जनता का रक्त सड़कों पर रक्तपात से बह रहा हो। भारतीय युवा तुम्हें नमन …… जे पी के आन्दोलन का यह सक्रिय युवा विद्यार्थी आज आप पर गर्व करता है।

नमन तुम्हारी अनथक उर्जा को और तुम्हारे धैर्य सहित भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की जिजीविषा को। 

प्रणाम अन्ना ………..  प्रणाम भारती … जय हिन्द।

अन्ना आन्दोलन के सौन्दर्यवादी तत्व [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

पिछले कुछ दिनों से अन्ना के आन्दोलन की हर तरफ धूम है। पिछले दिनों अन्ना तिहाड़ में थे और लोग सड़कों पर। ऐसे ही समय एक सुबह आपने शायद अपने टी0वी0 स्क्रीन पर सड़क पर अखबार बिछाकर अपने पिता की गोद में सर रखकर निशिचन्तता से सोर्इ हुर्इ एक 14-15 वर्षीया मासूम सी बालिका को देखा होगा। उसके पिता ने टी0वी0 संवाददाता को शायद बताया था कि उसके तीन बच्चे है। वह उन्हें इस आन्दोलन में इसलिए लाया था ताकि वह स्वयं देख सके। और महसूस कर सके कि उनके भविष्य की बुनियाद ऐसे ही आन्दोलनों से मजबूती से रखी जा सकेगी। कुछ ऐसा हो।

आपने उस सोती हुर्इ मासूम बालिका के चेहरे को गौर से देखा? क्या लगा? मुझे तो लगा जैसे कोर्इ योद्धा युद्ध के कुछ समय के लिए थम जाने के कारण सो गया हों। चलो कुछ देर थकान उतार लें ” लेकिन जैसे ही कोर्इ आहट होगी अपनी बन्दूक थामें उठ जायेगा और चीखेगा”थम। पिता की गोदरूपी बैरक उसकी सुरक्षित चाहर दीवारी है जहा दुश्मन की गोलियां असर नही कर सकती।

दृश्य:-2 इस आन्दोलन ने संसद की सर्वोच्चता को बहस के दायरे में ला दिया। किसी ने कहा संसद सर्वोच्च नहीं है किन्तु जनता ने अपनी सर्वोच्चता सांसदों के माध्यम से संसद में निहित की है। भले ही टी0वी0 बहस में उठी यह आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हो किन्तु हाब्स लाक रूसो का राज्योत्पति का सिद्धान्त भी तो यही कहता है कि लोगों ने अपनी सम्प्रभुता पारस्परिक सहमति से राज्य को हस्तान्तरित की। भारतीय संविधान तो अपने होने की वजह ही भारत के लोगों को स्वीकारता है:- ” हम भारत के लोग

एतदद्वारा इस संविधान को आत्मार्पित एवं समर्पित करते है। इसे माने तो संविधान ने संसद और उसकी सर्वोच्चता को जन्म दिया और संविधान की यह शक्ति ” हम भारत के लोगो” द्वारा उसे स्वीकार करने पर उसको प्राप्त हुर्इ। चलो हम भारत के लोग बहस का विषय तो बने।
दृश्य:-3 आन स्क्रीन बहस में कुछ लोगों को इस आन्दोलन में दलित भागीदारी नजर नहीं आर्इ और यह आन्दोलन मध्य मवर्गीय एवं उच्चजातियों का नजर आया। पूज्य डा० अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने के कारण उसकी सुरक्षा की ठेकदारी का अहसास भी उन्हें अपना नितान्त निजी लगा। आन्दोलन के मध्य मवर्गीय होने से तो हमें भी कोर्इ एतराज नहीं किन्तु भैय्या …! स्वत: स्फूर्त आन्दोलन में भागीदारों की जाति पूछना कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? क्या पाकिस्तान की गोली से शहीद होने वाले सैनिक को भी अल्पसंख्यक, दलित, पिछडा और सामान्य में बाटोंगे। अब बस भी करो यारों।

अन्ना आंदोलन और…….लोकतंत्र [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

अन्ना के आंदोलन से इधर कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। उन सबकी सराहना नहीं की जा सकती। निस्सन्देह उनके साथ जो व्यवहार हुआ वह कदापि प्रशंसनीय नहीं था किन्तु यह तो मानना पडेगा कि उनके प्रति कटु व्यवहार ने ही उन्हें अपार जनसमर्थन प्रदान किया और आज ”अण्णा शायद अपने जीवन की अप्रतिम लोकप्रियता का आनन्द उठा रहे है। अन्ना का रास्ता हर तरह से गांधीवादी रास्ता है। अत: गाँधी की लोकप्रियता पर सत्ता का सुख भोगने वालों को उनसे कोर्इ शिकायत नहीं होनी चाहिए।

अन्ना की अपार लोकप्रियता ने ”अण्णा के हौसलों को भी बाबा रामदेव की तरह परवान चढा दिया है। उनकी मांगों का दायरा भी रामदेव की तरह बढ़ा दिया है किन्तु ”अण्णा” की बढती मांगों ने एक प्रश्न अवश्य खडा कर दिया है। क्या किसी को भी लोकप्रियता के कंधो पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। हांलाकि यह भी गाधीवादी तरीका है। मैने ऊपर कहा कि कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। एक यक्ष प्रश्न जो अभी नेपथ्य में है किन्तु उसकी अनुभूति की जा सकती है। प्रश्न यह है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता के बहाने विधि-निर्माण के संसदीय कार्य में जनता का भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष सहयोग नहीं लिया जाना चाहिए। तकनीकी और प्रौद्योगिकी के युग में जनता का सहयोग विधि निर्माण में लिया जाना सम्भव है। इसमें बुरार्इ भी क्या है आखिर सांसद जिस संसदीय सर्वोच्चता का उपयोग कर समाज के शीर्ष पर स्थापित हो जाते है संसद को वह सर्वोच्चता वस्तुत: जनता ने ही प्रदान की है। विधि निर्माण में जनसहयोग से ही ”अण्णा” जैसे लोगों द्वारा लोकप्रियता के कंधों पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को रोका जा सकता है।

हम एक व्यकितपूजक एवं वीरपूजक समाज हैं। ऐसे समाज प्राय: अपने नायकों के अंधसमर्थक होते हैं और नायकों की गलतियों को छिपाने में ही अपना बड़प्पन समझ ते हैं। ऐसे में नायक को जब कोर्इ आर्इना दिखाने वाला नही रहता तो वह एक तानाशाह की तरह व्यवहार करता है और स्वयं को सर्वज्ञ एवं सम्प्रभु मान लेता है। समाज उसकी स्वयंभू संप्रभुता उसके व्यकितत्व के आभामण्डल एवं लोभी उपनायकों के कारण स्वीकार भी कर लेता है। भारत ऐसे ही स्वयंभू सम्प्रभु नायकों की गलतियों का खामियाजा आज तक भुगत रहा है जो इतिहास का हिस्सा है। कमजोर प्रतिद्वन्दी ऐसे नायकों के हौसले को सातवें आसमान पर चढ़ा देते हैं। यदा-कदा इतिहास ऐसे नायकों के प्रति हिंसात्मक प्रतिक्रिया दोहरा देता है। यह भी इतिहास में खोजा जा सकता हैं।

यह एक विशेष प्रकार का मनोविज्ञान है। भारत आज इसी मनोविज्ञान के दोराहे पर है। यदि हम इतिहास की गलतियां दोहराने से बचना चाहते है तो संसदीय सर्वोच्चता में जनता की सहभागिता बढ़ानी होगी। सुरक्षा सम्बन्धी बहस को छोड़कर प्रत्येक संसदीय एवं उसकी समितियों की बहस सार्वजनिक करनी होगी। कम्प्यूटर, इण्टरनेट, टी०वी० आदि के उपयोग से जनता को विधि निर्माण से जोड़ना होगा। प्रत्येक बिल का मसौदा कम से कम 6 माह पूर्व सार्वजनिक करना होगा। शायद यह व्यवस्था एक ” समूह को व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को खारिज कर सके। यह आगे की सोच है किन्तु जब आप यह याद करेगें कि हिटलर जैसा तानाशाह भी लोकप्रियता के कंधों पर ही वहां तक पहुंचा था तो आपको इस पर विचार करना पड़ेगा।

ईद और रामलीला के वो पुराने दिन ..[ डायरी का एक पन्ना] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

वर्षों बीत गए हैं बचपन की उन गलियों को छोड़े हुए जहाँ रामलीला और नवरात्रों के साथ सहरी के लिए उद्घोषकों की आवाज कानों में पड़ने के साथ ही जागा करता था. शाहजहांपुर के वो दिन और बचपन में लखीमपुर में अपने गाँव की वो ढेर सारी यादों के बीच कोई ईद ऐसी नहीं गुज़री जब पिता जी का यह पूंछना आज ….. अपने बटाईदार बाशिद चाचा के घर कब जाओगे … और मेरा यह जबाब कि चच्ची ने आपके लिए सेवइयां रखी हैं ….. अरे ! तुम कब हो आए, उनका स्तंभित होकर यह पूंछना …. और साथ ही उनकी आंखों में यह संतोष उभरता कि उनके दिए संस्कार सही दिशा में हैं.

आज सब बहुत याद आ रहा है. विगत तीस वर्षों में प्रायः ऐसा ही संयोग रहा कि कोई न कोई मित्र मेरे सामने इस प्रकार रहा है कि हर ईद पर मुझे मेरी सेवैयाँ मिल सकें. सिर्फ़ इस बार मेरा पड़ोस खाली है और मैं डायरी में हाफिज, शकील, इकबाल दादा सहित …. अपने मित्रों के वर्षों पहले के नंबर डायरी में खोज रहा हूँ …..

यह भी संयोग है कि आज ईद के साथ ही पूज्य बापू और शास्त्री जी की जयंती भी है. चारो तरफ़ विस्फोटों की गूँज, गलियों बाज़ारों की अफरातफरी, हाहाकार और अस्पतालों में मची चीख पुकार के बीच मन बहुत ही उद्विग्न है. किस से शिकायत करें और क्या कहें …. दिल के बहुत करीब यह बातें आज किसी से करने का मन है और आँखे नम हैं.

चलो दुआ करें की यह धुंआ जो आंखों में भरता जा रहा है जल्दी ही छंटे. और हर बार की तरह बुराई के रावण पर अच्छाई की विजय हो….. आज के दिन अपनी अवधी संस्कृति की सुरभित स्मृति के साथ मेरे यह विचार मुठ्ठी भर बीज की तरह सब शांतिप्रिय मित्रों को सप्रेम भेंट.

दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल .. हाय रे द्विवेदी तूने क्या कर दिया [गीत] – शिवेन्द कुमार मिश्र

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सम्मान में एक गीत लिखा गया। “दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ” किन्तु यह अर्ध सत्य पूर्णतया राजनीति से प्रेरित है। हमें देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में पूज्य बापू के चमत्कारी नेतृत्व पर कोई एतराज है नहीं है। और न ही आजादी के आन्दोलन में उनके योगदान पर हमारे मन में कोई संशय है। हमें आपत्ति मात्र यह है कि यह गीत अथवा इसके जैसे अन्य गीत, आख्यान, उपाख्यान अथवा इसके जैसे अन्य गीत, जो इतिहास को कल्पना में बदल देते है। स्वतन्त्रता संग्राम के महान इतिहास के पटल से यतार्थ संघर्ष को खत्म सा कर देते है। और तमाम स्वतंत्रता इतिहास में अजर अमर हुतात्माओं की अमरगाथा अनगिनत नायकों को बेगाना कर देते है। शिवेन्द्र कुमार मिश्र का प्रस्तुत गीत कविवर श्री सोहनलाल द्विवेदी के उसी गीत की पृष्ठ्भूमि मे प्रत्युत्तर स्वरूप लिखा गया है। और इतिहास के हमारे अनगिनत अनजाने क्रान्तिकारी नायकों को विनम्र श्रद्धाजंलि है। गीत बडा हो गया है:- किन्तु बलिदान की गाथा और उसका इतिहास भी छोटा नहीं है। – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

  हाय रे ! द्ववेदी तूने क्या कर दिया,
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।
कहा पढ लिया था तूने यह रास-रंग,
दे दी हमे आजादी,तलवार बिना जंग।
रक्त के भी बिना कही जन्म होता है,
प्रसव वेदना ही मा को गर्व होता है।
हाय रे। तूने क्या कमाल कर दिया,
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।

530बी0सी0 जरा याद तो करो
डेमासित्र्रयस आक्रमण याद तो करो
पंजाब तक भारत को बरबाद कर दिया।
व्यर्थ सब हमारा बलिदान कर दिया
326 बी0सी0 भूले न होगें
सिकंदरी आतंक भूले न होगें
झेलम ने उसका शौर्य सब बरबाद कर दिया।
भारत ने उसे जीवन से आजाद कर दिया।
हाय रे द्वि वेदी तूने क्या कर दिया।

युवा बाल वृद्ध सभी शस्त्रपाणि थे
वापसी में उसके सभी महाकाल थे
बेटियों ने देश की कमाल कर दिया
तीर से सिकन्दर का प्राणान्त कर दिया।
हाय रें। द्वि वेदी तूने क्या कर दिया
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।

और क्या कहू मैं सेल्यूकस का शौर्य
बेटी दी प्राण बचा,रहा कही और
नन्द का निरकुंष राज्य नष्ट कर दिया
विश्व को सम्राट प्रथम चन्द्रगुप्त दिया।
हाय रे द्वि वेदी तूने क्या कर दिया
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया

देश के दुर्भाग्य ने डाका दिया डाल
कासिम के इस्लाम ने कर दिया बबाल
नृशंसता का उसने नंगा नाच वो किया
25000 एक दिन में कत्ल कर दिया
मा बेटियों का शील भंग दुष्ट ने किया
पहली बार देश में जौहर तब हुआ
कासिम को खलीफा से मरवा कर दम लिया
बेटियों ने देश की कमाल कर दिया।
हाय रें। द्वि वेदी तूने क्या कर दिया
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।

16 बार हमने गौरी को हराया
दया क्षमा करके उसने प्राण बचाया
एक बार धोखे से दुष्ट वो जीता
आखे फोड पृथिवी का प्राण ले लिया
दुष्टों के संग दुष्टता जब हमने भुलाया
पृथिवीराज चौहान सा हाल करवाया।
हाय रे। द्वि वेदी तूने क्या कर दिया।
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।

तुम जैसे कायर ही थे सोमनाथ में,
करते कापुरूष भरोसा चमत्कार में।
शिव देगें दण्ड कहकर भीम को रोका
दुष्ट गजनवी ने सोमनाथ तब तोडा
कैसे भूल गए तुम,राणा,शिवा,प्रताप
छत्रसाल,गुरूगोविन्द,वन्दा का प्रताप
पदमनी का जौहर कैसे तुमने भुलाया
अजुर्न,गुरू तेग का बलिदान भुलाया
भूषण की वाणी को बदनाम कर दिया
हाय रें। द्वि वेदी तूने क्या कर दिया।

1757 में प्लासी का मैदान
लिख गया अग्रेजों को भारत का विधान
1857 प्रथम स्वतंत्र ता संग्राम
रक्त से तब लिख दिया आजादी का पैगाम
पलासी से भी अब दिन तक
हम चुप्प न बैठे
कदम-कदम छिडके हमने
रक्त के छीटें।
रक्त के इतिहास को गुमनाम कर दिया।
देश के इतिहास को बदनाम कर दिया।

आजादी के संग्राम को कुछ वक्त न बीता
सन्यासियों ने युद्ध का आवाहन कर दिया
श्री बंकिम चन्द्र ने लिखा आनन्द मठ
वन्दे मातरम राष्ट्रगीत देश को दिया
मैडम कामा श्यामवर्मा और अजीत सिंह
ब्रिटिश इण्डिया हाउस बना क्रानितयों का गढ
धींगडा,भगतसिंह या बटुकेश्वर दत्त
राजगुरू,सुखदेव,अरविन्द सा या संत
सावरकर ने शौर्य का इतिहास नव रचा
चटगाव काण्ड तभी सूर्यसेन कर गया
हाय रे द्वि वेदी तूने ये क्या कर दिया।

बंगभंग से भी उपजा जो आक्रोश
स्वदेशी बना तब क्रानितयों का जोश
भारतीय टमटम मैडम ए नीबेसेन्ट
श्री तिलक ने आंदोलनों का कर दिया प्रारम्भ
काकोरी हो या साण्डर्स या आजाद हिन्द
असेम्बली के बम से गूजा सर्वत्र जय हिन्द
46 में नेवी ने भी विद्रोह कर दिया
अंग्रेजो का बिस्तर तब गोल कर दिया
हाय रे द्वि वेदी तूने ये क्या कर दिया।
ूने क्या लिख दिया
साबरमती के संत तुझको है मेरा नमन
किन्तु बलिदानों का न करों अवनमन
रक्त की भवानी ने मूल्य बहु लिया
तब जाकर देश यह आजाद है हुआ
आप सबको है हमारा कोटिश नमन
वंदे मातरम बोलो वंदे मातरम।।

शिवेन्द्र कुमार मिश्र

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