अन्ना आंदोलन और…….लोकतंत्र [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

अन्ना के आंदोलन से इधर कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। उन सबकी सराहना नहीं की जा सकती। निस्सन्देह उनके साथ जो व्यवहार हुआ वह कदापि प्रशंसनीय नहीं था किन्तु यह तो मानना पडेगा कि उनके प्रति कटु व्यवहार ने ही उन्हें अपार जनसमर्थन प्रदान किया और आज ”अण्णा शायद अपने जीवन की अप्रतिम लोकप्रियता का आनन्द उठा रहे है। अन्ना का रास्ता हर तरह से गांधीवादी रास्ता है। अत: गाँधी की लोकप्रियता पर सत्ता का सुख भोगने वालों को उनसे कोर्इ शिकायत नहीं होनी चाहिए।

अन्ना की अपार लोकप्रियता ने ”अण्णा के हौसलों को भी बाबा रामदेव की तरह परवान चढा दिया है। उनकी मांगों का दायरा भी रामदेव की तरह बढ़ा दिया है किन्तु ”अण्णा” की बढती मांगों ने एक प्रश्न अवश्य खडा कर दिया है। क्या किसी को भी लोकप्रियता के कंधो पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। हांलाकि यह भी गाधीवादी तरीका है। मैने ऊपर कहा कि कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। एक यक्ष प्रश्न जो अभी नेपथ्य में है किन्तु उसकी अनुभूति की जा सकती है। प्रश्न यह है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता के बहाने विधि-निर्माण के संसदीय कार्य में जनता का भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष सहयोग नहीं लिया जाना चाहिए। तकनीकी और प्रौद्योगिकी के युग में जनता का सहयोग विधि निर्माण में लिया जाना सम्भव है। इसमें बुरार्इ भी क्या है आखिर सांसद जिस संसदीय सर्वोच्चता का उपयोग कर समाज के शीर्ष पर स्थापित हो जाते है संसद को वह सर्वोच्चता वस्तुत: जनता ने ही प्रदान की है। विधि निर्माण में जनसहयोग से ही ”अण्णा” जैसे लोगों द्वारा लोकप्रियता के कंधों पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को रोका जा सकता है।

हम एक व्यकितपूजक एवं वीरपूजक समाज हैं। ऐसे समाज प्राय: अपने नायकों के अंधसमर्थक होते हैं और नायकों की गलतियों को छिपाने में ही अपना बड़प्पन समझ ते हैं। ऐसे में नायक को जब कोर्इ आर्इना दिखाने वाला नही रहता तो वह एक तानाशाह की तरह व्यवहार करता है और स्वयं को सर्वज्ञ एवं सम्प्रभु मान लेता है। समाज उसकी स्वयंभू संप्रभुता उसके व्यकितत्व के आभामण्डल एवं लोभी उपनायकों के कारण स्वीकार भी कर लेता है। भारत ऐसे ही स्वयंभू सम्प्रभु नायकों की गलतियों का खामियाजा आज तक भुगत रहा है जो इतिहास का हिस्सा है। कमजोर प्रतिद्वन्दी ऐसे नायकों के हौसले को सातवें आसमान पर चढ़ा देते हैं। यदा-कदा इतिहास ऐसे नायकों के प्रति हिंसात्मक प्रतिक्रिया दोहरा देता है। यह भी इतिहास में खोजा जा सकता हैं।

यह एक विशेष प्रकार का मनोविज्ञान है। भारत आज इसी मनोविज्ञान के दोराहे पर है। यदि हम इतिहास की गलतियां दोहराने से बचना चाहते है तो संसदीय सर्वोच्चता में जनता की सहभागिता बढ़ानी होगी। सुरक्षा सम्बन्धी बहस को छोड़कर प्रत्येक संसदीय एवं उसकी समितियों की बहस सार्वजनिक करनी होगी। कम्प्यूटर, इण्टरनेट, टी०वी० आदि के उपयोग से जनता को विधि निर्माण से जोड़ना होगा। प्रत्येक बिल का मसौदा कम से कम 6 माह पूर्व सार्वजनिक करना होगा। शायद यह व्यवस्था एक ” समूह को व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को खारिज कर सके। यह आगे की सोच है किन्तु जब आप यह याद करेगें कि हिटलर जैसा तानाशाह भी लोकप्रियता के कंधों पर ही वहां तक पहुंचा था तो आपको इस पर विचार करना पड़ेगा।

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. suneel kant
    सितम्बर 01, 2011 @ 09:08:51

    शिवेंद्र जी , मै आपकी बातो से सहमत हूँ , कारण उस दिन जीत के बाद कि कुछ संभ्रांत लोगो कि मच से टिप्पणी , कल ये लोग क्या मद मस्त नहीं होगे , सोचने का विषय है सुनील कान्त

    प्रतिक्रिया

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