अन्ना आन्दोलन के सौन्दर्यवादी तत्व [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

पिछले कुछ दिनों से अन्ना के आन्दोलन की हर तरफ धूम है। पिछले दिनों अन्ना तिहाड़ में थे और लोग सड़कों पर। ऐसे ही समय एक सुबह आपने शायद अपने टी0वी0 स्क्रीन पर सड़क पर अखबार बिछाकर अपने पिता की गोद में सर रखकर निशिचन्तता से सोर्इ हुर्इ एक 14-15 वर्षीया मासूम सी बालिका को देखा होगा। उसके पिता ने टी0वी0 संवाददाता को शायद बताया था कि उसके तीन बच्चे है। वह उन्हें इस आन्दोलन में इसलिए लाया था ताकि वह स्वयं देख सके। और महसूस कर सके कि उनके भविष्य की बुनियाद ऐसे ही आन्दोलनों से मजबूती से रखी जा सकेगी। कुछ ऐसा हो।

आपने उस सोती हुर्इ मासूम बालिका के चेहरे को गौर से देखा? क्या लगा? मुझे तो लगा जैसे कोर्इ योद्धा युद्ध के कुछ समय के लिए थम जाने के कारण सो गया हों। चलो कुछ देर थकान उतार लें ” लेकिन जैसे ही कोर्इ आहट होगी अपनी बन्दूक थामें उठ जायेगा और चीखेगा”थम। पिता की गोदरूपी बैरक उसकी सुरक्षित चाहर दीवारी है जहा दुश्मन की गोलियां असर नही कर सकती।

दृश्य:-2 इस आन्दोलन ने संसद की सर्वोच्चता को बहस के दायरे में ला दिया। किसी ने कहा संसद सर्वोच्च नहीं है किन्तु जनता ने अपनी सर्वोच्चता सांसदों के माध्यम से संसद में निहित की है। भले ही टी0वी0 बहस में उठी यह आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हो किन्तु हाब्स लाक रूसो का राज्योत्पति का सिद्धान्त भी तो यही कहता है कि लोगों ने अपनी सम्प्रभुता पारस्परिक सहमति से राज्य को हस्तान्तरित की। भारतीय संविधान तो अपने होने की वजह ही भारत के लोगों को स्वीकारता है:- ” हम भारत के लोग

एतदद्वारा इस संविधान को आत्मार्पित एवं समर्पित करते है। इसे माने तो संविधान ने संसद और उसकी सर्वोच्चता को जन्म दिया और संविधान की यह शक्ति ” हम भारत के लोगो” द्वारा उसे स्वीकार करने पर उसको प्राप्त हुर्इ। चलो हम भारत के लोग बहस का विषय तो बने।
दृश्य:-3 आन स्क्रीन बहस में कुछ लोगों को इस आन्दोलन में दलित भागीदारी नजर नहीं आर्इ और यह आन्दोलन मध्य मवर्गीय एवं उच्चजातियों का नजर आया। पूज्य डा० अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने के कारण उसकी सुरक्षा की ठेकदारी का अहसास भी उन्हें अपना नितान्त निजी लगा। आन्दोलन के मध्य मवर्गीय होने से तो हमें भी कोर्इ एतराज नहीं किन्तु भैय्या …! स्वत: स्फूर्त आन्दोलन में भागीदारों की जाति पूछना कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? क्या पाकिस्तान की गोली से शहीद होने वाले सैनिक को भी अल्पसंख्यक, दलित, पिछडा और सामान्य में बाटोंगे। अब बस भी करो यारों।

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अगस्त 25, 2011 @ 18:42:23

    सही कहा मिश्र जी, जाति पूछकर गोली थोड़े ही न मारते हैं आतंकवादी..

    प्रतिक्रिया

  2. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अगस्त 25, 2011 @ 18:42:47

    यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

    प्रतिक्रिया

  3. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अगस्त 25, 2011 @ 18:42:47

    यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

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