अन्ना ! आपको वंदेमातरम किंतु आपत्तियों के साथ ….[आलेख ]- शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….. पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं।

….. अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

…… देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

आज हमने अपनी आंखो से देखा, अनुभव किया कि एक व्यक्ति का आत्मिक बल कैसे जनसमुद्र में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उठा देता है। सत्ताएं झुकती हैं और सिंहासन कांपने लगते हैं। अस्तु: आपने सिद्ध कर दिया कि – दिल दिया है जान भी देंगे ऐ! वतन तेरे लिए केवल एक बालीवुडिया गीत नहीं है। कोर्इ देश का दीवाना इसे मंत्र भी बना देता है। यह हमने आज जाना। हमने आज यह भी जाना कि कैसे व्यवस्थाएं लोकचेतना को अपने लिए खतरा मान लेती है और भयग्रस्त हो आपसी मतभेद भुलाकर व्यवस्था के स्तम्भ जनचेतना के विरोध में एक हो जाते हैं। हमें यह भी पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं। ऐसे आंदोलनों को जाति और मजहब के नाम पर अथवा आर०एस०एस० का भय दिखाकर तोड़ने की कोशिश करने वाले सियासतदां, बुद्धिजीवी और पत्रकारों के चेहरे भी देखे तो जनचेतना द्वारा इनको दिया गया मौन जवाब भी। ऐसे चैनलों पर भी निगाह गर्इ जो जन सरोकारों से पर्याप्त दूरी बनाये रहे। पर अंत भला तो जग भला। अन्तत: अण्णा जीत गए। भारत की जनता अर्थात भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हम भारत के लोग विजयी हुए और विजयी हुर्इ संविधान में वर्णित व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, अखण्डता व पंथनिरपेक्षता। 



अन्ना..!   राष्ट्र का प्रणाम आप स्वीकार करें जयहिन्द ! वंदेमातरम। 

पर अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

1- संस्था बनाम लोकतंत्र :- कतिपय संस्थाएं संवैधानिक होती हैं और लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। किंतु संस्थाएं बड़ी आसानी से चुनिन्दा मस्तिष्कों की साजिश का शिकार हो जाती हैं और फिर उनके स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम। यह बात भारतीय जनतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं को लेकर अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं। आखिर लोकतंत्र का मंदिर संसद भी किस तरह से जनचेतना के बहाव को समझने में इतना वक्त लगाता रहा। यह बात इसी से स्पष्ट हो जाती है। आपका लोकपाल भी कलावती वाले राहुल बाबा की कृपा से निर्वाचन आयोग की तरह संवैधानिक संस्था बनने वाला है। शेषन जी… ! हैं तो सावधान। राहुल जी को लगता है कि निर्वाचन आयोग की तरह लोकपाल के संवैधानिक संस्था बनाने पर कसबल ढीले किए जा सकते हैं। अत: कृपया भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में ग्राम संसद जैसा कि आप कहते हैं (ग्राम सभा) को भी अधिकार प्रदान किए जायें।

2- ग्राम संसद (सभा) और भ्रष्टाचार :- आप ग्राम सभा को ग्राम संसद कहते हैं और देश की संसद से बड़ा मानते हैं, तो भ्रष्टाचार से निपटने में ग्राम सभा के खुले सत्र के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को जनतंत्र की रक्षा का दायित्व क्यों न दिया जाए। ग्राम सभाएं अपने ग्रामों के लिए कानून बनाएं, उनका पालन कराएं। सीमित मात्रा में न्याय करें और एक ग्राम में काम करने वाले सभी सरकारी कर्मचारी ग्राम सभा के बहुमत के निर्णय के अन्तर्गत हों। यहां मतदान अनिवार्य हो।

3- सरकारी कर्मचारी बनाम प्राइवेट संस्थाएं, एन.जी.ओ. आदि :- जो त्रि सूत्रीय प्रस्ताव संसद ने पास किया है उससे गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) कम्पनियां, फर्में, ट्रस्ट के विषय में सिथति स्पष्ट नहीं है। यदि यह संस्थाएं लोकपाल की जांच के दायरे में नहीं तो क्या मजाक है। 50रू० घूस खाने वाला लेखपाल या चपरासी की जांच लोकपाल करेगा और करोड़ो का फण्ड डकारने वाले एन. जी.ओ.ट्रस्ट कम्पनियां और उनके उच्च वेतनभेागी सी.र्इ.ओ. इसकी जांच से दूर। इनमें से तमाम खुद तो आयकर देते नहीं और चंदा लेकर दूसरों को भी टैक्स चोरी में मदद करते हैं।

4- लोकपाल कहीं वकीलों की आय का जरिया न बन जाए :- देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

5- वकीलों की सामाजिक जिम्मेदार और जूरी :- इस देश की बहुसंख्यक जनता 20 रू प्रतिदिन व्यय कर सकती है। इनमें से तमाम लोग कानूनी पचड़ो में पड़ जाते हैं। सरकारी नि:शुल्क सलाहकार संस्थाएं हैं फिर भी मुकदमा यही लोग लड़ाते हैं। न तो इनकी फीस तय न जिम्मेदारी। लाखों रू0 प्रति पेशी पर लेते हैं इनका भी कुछ किया होता और हां जब लोकपाल आरोप तय करती तो जूरी को भी जगह देते ताकि जनलोकपाल वास्तव में जनता को ताकत देता दिखार्इ देता।

अन्ना ! कहीं ऐसा न हो कि आपके लोगों की कठपुतली सरीखा हो लोकपाल। एक और संस्था। भगवान बचाए इन संस्थाओं से। समस्या भ्रष्टाचार से लड़ने में आम नागरिक की सक्षमता व सहयोग की है न कि संस्थाओं को खड़ा करने की। और हाँ सांसदों का वी.वी.आर्इ.पी. दर्जा अर्थात संसदीय दायित्वों के औचित्य पूर्ण निर्वहन के अतिरिक्त सारे कार्य जांच के दायरे में हों। ठीक बात है किंतु जन लोकप्रियता के सहारे संसद को बंधक जैसी स्थिति में पहुंचा देना, हमारे प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए कहां तक उचित है विचारणीय है। बातें और भी हैं पर अभी तो आप की यानी अपनी जीत का जश्न मनाना है।

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    अगस्त 29, 2011 @ 18:56:17

    ग्राम सभा के अधीन कर्मचारी – कैसी बात करते हैं आप. आपने कभी गांवों में जाकर कर्मचारियों की स्थिति देखी है विशेषत:अध्यापकों की जो प्रधान की मर्जी के बिना चल भी नहीं सकते.. एक बार फिर से विचार कीजिये..

    प्रतिक्रिया

  2. suneel kant
    सितम्बर 01, 2011 @ 09:03:25

    शिवेंद्र जी आपकी काफी बातो से मै सहमत हूँ , जब हमें सत्ता मिल जाती है तो उसका उन्माद आने लगता है कही यह हालत लोकपाल कि भी न हो , सभी पर अंकुश लगाना बहुत जरुरी है , डर है कि आरम्भ तो अच्छा है बाद में क्या होगा सुनील कान्त

    प्रतिक्रिया

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