फिर भी बहता जीवन ….. [गीत] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,


कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप धूप चलते चलते सब
झुलस चुकी है काया
फूट चूके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
चलता तू हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

 एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणीं का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर ऑंखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू वावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन

रेखाकार – पायल बत्रा

अन्ना आन्दोलन बनाम भ्रष्टाचार …….. [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

पूज्य अन्ना का जनान्दोलन भ्रष्टाचार के विरूद्ध सशक्त विधायी संस्था लोकपाल की माग के साथ प्रारम्भ हुआ। देखते ही देखते लगातार की गर्इ रणनीतिक त्रुटियों के कारण यह आन्दोलन तीव्र गति पकड़ गया। जिन्हें जेoपीo के आन्दोलन की याद थी वह इससे तुलना करने लगे। लोकपाल का स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।रामलीला मैदान का जनसैलाब न उन लोगों का हे जिन्हें भ्रष्टाचार की पर्याप्त समझ है और न ही उन लोगों का जो अण्णा की तरह शुचिता का दम भर सकें और अण्णा की ही तरह यह दावा कर सकें कि उनके दामन पर एक छोटा सा भी दाग नहीं है। मेरे एक मित्र का मानना है कि यह लोग जो भ्रष्टाचार किए हैं अथवा करते हैं वह तंत्र का दबाब है न कि उनकी स्वेच्छा। क्या अण्णा के सहयोगी भी ऐसा ही मानते हें। लगता तो नहीं। वह लोग टीoवीo चैनलों पर जो दावे कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह एक ऐसा तंत्र चाहते हैं जो चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की जाच कर सके। वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक को इसकी परिधि से मुक्त नहीं करना चाहतें। राजनेताओं के साथ साथ राजकीय कर्मचारी विशेष रूप से उनके निशाने पर है। जहा तक राजकीय कर्मचारियों का प्रश्न हैं तो वह बलि का बकरा बन चुका है। उसकी साख का जनता के बीच समाप्त होने की बडी वजह उसके राजनैतिक और आर्इoएoएसo सम्प्रभु है। मित्र की बात का यदि समर्थन करें तो उसके भ्रष्टाचार की एक बडी वजह तंत्र का दबाब उसके विरूद्ध अपनी सम्पूर्ण र्इमानदारी के साथ न लड़ पाने की उसकी अक्षमता जिसके पीछे प्राय: उसका परिवार और कभी-कभी जनदबाव भी रहता है। जनदबाब ऐसे भ्रष्टाचार का समर्थन,प्रोत्साहन अपने निजी समूहगत कारणों से करता है। यानी कि कह सकते हैं कि जनसंस्थाएं भी ऐसे भ्रष्टाचार का बडा कारण हैं।


तथाकथित सिविल सोसाइटी इन जनसंस्थाओं द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी नहीं कहती। मसलन अण्णा कहते हैं कि उन्होने अपनी संस्थाओं के लिए करोडों के प्रोजेक्ट लिए किन्तु कभी भी एक भी पैसा रिश्वत नहीं दी तो क्या सभी और उनके कर्ता धर्ता ऐसा ही दावा करता हैं। सब लोग जानते है कि एनoजीoओo अपनी संस्थाओं के लिए फण्ड लेने के लिए कैसी मारकाट करते हैं और क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं। तो सारे एनoजीoओo लोकपाल के दायरें में क्यो नहीं आने चाहिए?

आप सभी जानते हैं कि भारत की लगभग 70प्रतिशत जनता वह है जिसकी दैनिक व्यय क्षमता 20रूo मात्र है। देश की अदालतों में करोडों मामले जो लमिबत है वह अधिकांशत: इसी जनता के है। प्रशान्त भूषण और शान्तिभूषण जैसे लोग भली भांति जानते हैं कि हमारे वकील मित्र अपने क्लाइण्ट से फीस की वसूली कितना चेक के माध्यम से करते हैं या कर सकते हैं। उनकी ऊँची-ऊची फीसे और कानूनों के मकडजाल से खुद को सुरक्षित रखने की उनकी काबिलियत किस तरह से सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी तथा कथित न्यायिक भ्रष्टाचार को बढावा देने में सहायक होती है और वह स्वयं इसमें लिप्त रहते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं हैं। इनको लोकपाल या किसी के कठोर नियंत्रण में लाए जाने की आवश्यकता क्यो नही है। चेरेटी के नाम पर चलाए जाने वाले अस्पताल एवं विभिन्न संस्थाए किस प्रकार की चेरिटी कर रही हैं। यह छिपी हुर्इ बात नहीं है। 

शायद आप सहमत हों कि यह संस्थाएं स्वयं तो आयकर मुक्त जीवन बिताती ही हैं दूसरों को भी आयकर चोरी में सहायता करती हैं। इन्हें लोकपाल या उससे भी सख्त संस्था के दायरे में क्यो नहीं आना चाहिए।

अण्णा की र्इमानदारी या सत्यनिष्ठा पर कोर्इ दाग नहीं है। क्या ऐसा ही अण्णा के बाकी सहयोगी भी कर सकते हैं अथवा उनके दावे पर भरोसा किया जा सकता है। मैगसेस पुरस्कार विजेताओं को विभिन्न मानवीय मनोवैज्ञानिक कारणों से हताशा एवं अवसाद ग्रस्त ऐसे लोगों की आड में जो वहा पर अपनी अपनी समझ के भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए इकटठा हैं जैसे महगार्इ,गलत भूमि कानूनों के शिकार,आदि क्या लोकतांत्रिक विधि मूल्यों से खिलवाड की इजाजत दी जानी चाहिए।

अब हम जे0पी0 आन्दोलन के आर्इने में भी जरा झांक लें। जे0पी0 ने सत्ता को एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों को बंधक बनाने का आन्दोलन नहीं चलाया। उन्होने सत्ता परिवर्तन कर प्रजातांत्रिक मूल्यों की पुर्नस्थापना का आन्दोलन चलाया किन्तु अण्णा के शूरवीर ऐसी कोर्इ माग नहीं करते। इतना ही नहीं जनता के नाम पर पारदर्शिता की कोर्इ बडी लकीर भी वो खींचना नहीं चाहते। उदाहरणार्थ वह लोग सरकार पर तो यह आरोप लगा रहे हैं कि वह एक लचर बिल प्रस्तुत कर रही है और जनलोकपाल बिल के प्राविधानों को जा ज्यादा भ्रष्टाचार विरोधी हैं संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्ताव में शामिल नहीं कर रहे। अब वह अपना ही जन लोकपाल बिल प्रस्तुत करने पर अडे हैं। क्या यह उचित समय नहीं है कि हम अपने प्रजातंत्र को अधिक पारदर्शी बनाएं और लोकपाल के विभिन्न ड्राफ्ट जनता की रायशुमारी के आधार पर तैयार करें और फिर जनमत संग्रह के आधार पर उसको पारित कराएं। मैं मानता हू यह रास्ता लम्बा है किन्तु प्रजातंत्र को भीड द्वारा बन्धक बनाए जाने के तरीके से कहीं बेहतर। देश गांधीवादी अंहिसात्मक आमरण अनशन जो प्रजातांत्रिक मूल्यों के नाम पर किए गए थे कर्इ दुष्परिणाम आज तक भोग रहा हैं। कहीं ऐसा न हो अण्णा अनशन से उत्पन्न दुष्परिणामों से भावी पीढि़या कराहती रहें।