फिर भी बहता जीवन ….. [गीत] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,


कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप धूप चलते चलते सब
झुलस चुकी है काया
फूट चूके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
चलता तू हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

 एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणीं का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर ऑंखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू वावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन

रेखाकार – पायल बत्रा

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    सितम्बर 14, 2011 @ 14:26:30

    geet ke saath chitra bhi behad sundar hain.

    प्रतिक्रिया

  2. गीता पंडित
    सितम्बर 15, 2011 @ 14:56:13

    अति-सुंदर.. सुंदर भाव , सुंदर भाषा और शैली भी बहुत सुंदर..मन को भाया आपका गीत ..इस शैली में मैंने पहली बार आपको पढा अच्छा लगा..बधाई आपको ..

    प्रतिक्रिया

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