आओ अलाव जलायें …. [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

नये वर्ष की नयी उमंगे
नवसंचार जगायें
बीनें दुर्गुण मानवता से
आओ अलाव जलायें

कोहरे की चादर से लिपटा
सूरज शीतल आया
पुरइन पात चमकते मोती
पाला भूतल छाया
धुनी कपास उठायें नभ से
जग ओढ़ाव बनायें
आओ अलाव जलायें

हिम शीतल बयार जब बहती
हिम खण्डों से गोले
धूप दुशाला ओढ़ निकलती
जब पड़ जाते ऒले
गांव गली गन्ना गुड़ महके
तिल रेवड़ी सब खायें
आओ अलाव जलायें

रीता बीता बरस गया सब
सबकी जेबें खाली
आतन्कित महंगाई करती
ज्यों डरपाये काली
ग्राम नगरवासी सब मिलकर
नया साल चमकायें
आओ अलाव जलायें
©तृषा’कान्त’

आत्याचारम् प्रणमामि …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

लो स्वीकारो साधुवाद
कोटिश धन्यवाद
सादर प्रणाम
ओ मेरे वैचारिक आक्रान्ता

विश्वासघात
झूठ और फ़रेब तुम्हारा
हैं मेरी अनमोल निधि
और श्वास ..
चिर अक्षुण अक्षय
आत्याचार तुम्हारे

है अस्तिव तुम्हारा
मेरे कवि जीवन की थाती
तुमने ही तो दिया जन्म
कागज पर ‘कान्त’ बनाकर

कभी किया निष्काषन
घर से गाँव से
नैसर्गिक अधिकार से
स्तम्भित मत हो
प्रभो, प्रणाम स्वीकारो
ये जो पीछे भीड़ खड़ी है
उसे मत चकित निहारो
ये सब तो हैं आज
हमारे मीत…
किन्तु तुम ….
विगत कटु अतीत
आज आये हैं
यह सब मेरे साथ
आपका अभिनन्दन ..!

क्योंकि आपके
सत्ता और शोषण से
अनृत के पोषण से
तर्क पर कुतर्क से
शास्त्र पर शस्त्र से
विजयाभियान ने
स्रजित किया है
निरा निरीह करूण क्रन्दन

मत संकोच करो हे तात
जन्मदाता तुम कवि के
क्योंकि
तुम अटूट बेशर्म
तुम्हीं से युग चलता है
‘ विघटन’ का हर सूत्र
स्रजित तुमसे होता है

हे.! महाभ्रष्ट. पथ दिग्भ्रामक
बढ़ाना थोड़ा सा कुछ और
झूठ …… पाखण्ड …..
जन उपेक्षा और स्वार्थ
होगा तभी अमर शायद
युग-युग तक नाम तुम्हारा.

अतः हे श्रद्धेय या जाने हेय
तुमको प्रणाम तुमको प्रणाम
त्राहिमाम् त्राहिमाम्
©तृषा’कान्त’