प्रणमामि शारदे् प्रणमामि ..[कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
हे! आर्यावृत हे! भरत् पुत्र
हे! बाल्मीकि हे! कालिदास
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
 प्रणमामि ताण्डव सिंहनाद
प्रणमामि महाकाली निनाद

प्रणमामि शारदे् सप्तनाद
प्रणमामि काव्यरस सिन्धुनाद
प्रणमामि भरत् भू परम्परा
ॠषियों की पावन महाधरा
षट्ॠतुओं ने पाँखें खोलीं
मेघों ने अद्भुत रूप धरा
प्रणमामि प्रेरणे! प्रकृतिदेव्
तन्त्री के तार छेडते हो
‘सम्मोहित’ सिन्धु मनीषा से
हे! शारदेय शत् शत् प्रणाम
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
©तृषा’कान्त’

यह देश मेरा जल रहा .. [कविता] – श्रीकान्त ,मिश्र ’कान्त’

आतंक के अंगार बरसे
आज अम्बर जल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

भ्रमित अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल जो
अब युद्द में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े हैं
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम
मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

कुटिल अरि ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
युव धमनि में जल रहा
शीष लेकर हाथ में हर
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा
©तृषा’कान्त’

पाकिस्तान की दुखद हकीकत .. [ समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

आज पाकिस्तान फिर से ज़म्हूरियत और सैन्य शासन के दोराहे पर खड़ा है। उसकी इस स्थिति के लिये एक राष्ट्र के तौर पर खुद पाकिस्तान की मानसिकता के अतिरिक्त कोई अन्य वजह जिम्मेदार भी नहीं है। जिस देश के राष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति से लेकर प्रधान मंत्री तक को अपनी सत्ता और कई बार अपने जीवन के अभयदान हेतु सऊदी जाकर भीख जैसी मांगनी पड़ती है वहां किसी भी सार्थक लोकतन्त्र के लिये कभी कोई स्थान हो भी नहीं सकता।

पाकिस्तान में जम्हूरियत का अर्थ सिर्फ़ हिन्दुस्तान के प्रति नफरत है .. वो पाकिस्तान जो अपने जन्म से पूर्व मात्र कूछ दशक पहले तक हिन्दुस्तान हुआ करता था। दुर्भाग्य से अपने सहोदर भारत के साथ शांति तथा सहअस्तिव को निरन्तर नकारते हुये कल तक अमेरिका और आज चीन सहित वह किसी भी अन्य देश के आगे बेशर्मी से गिड़गिड़ाने को तैयार है। भारत के साथ घृणा को ज़िन्दा रखने के लिये .. उसे सम्भवत: आने वाले दिनों में इसकी और भी भारी कीमत चुकाने के लिये तैयार रहना होगा। बदनसीब है पाक .. जो आज तक इस साधारण सी बात को समझ कर भी नज़रअन्दाज करता रहता है।

खुदा खैर करे .. !!
©तृषा’कान्त’

पुरू …… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

घना है कुहासा
भोर है कि साँझ
डूब गया है
सब कुछ इस तरह
तमस के जाले से
छूटने को मारे हैं
जितने हाथ पाँव
और फंस गया हूँ
बुरी तरह…
वक्त का मकड़ा
घूरता है हर पल
अपना दंश मुझमें
धंसाने से पहले

याद है मुझे
‘पुरू’ हूँ
किन्तु ‘पौरूष’ खो गया है
भटक रहा हूँ युगों से
तलाश में …
उस शमी वृक्ष की
टांगा था मैनें
जिस पर कभी गाँडीव

अज्ञातवास की वेदना
अंधकार में अदृश्य घाव
डूबी नही है चाह अब तक
एक नये सूरज की

उबारो …
उबारो तो मुझे
ओ ! मेरी ‘सोयी हुयी चेतना’
इस अन्धकार से
चीखता रहूँगा मैं
निस्तेज होने तक
शायद इसी आशा में
कि आओगे एक दिन ‘तुम’
जो बिछड़ ग़ये थे मुझसे
अतीत के अनजाने मोड़ पर
©तृषा’कान्त’

स्वागत हे नववर्ष … [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


उर उमंग की किरण संजोये
ऊषा से आशा ले आया
कोहरे की चादर में सिमटा
द्वारे यह नववर्ष
स्वागत हे नववर्ष

शीतल सूरज की आहट से
अम्बर पनघट नींद उनींदी
रजनी तम आलस तजती है
भोर किरण से हर्ष
स्वागत हे नववर्ष

काल चक्र पर कुछ हिचकोले
सहमे जीवन मन भी डोले
विगत विचार पुष्प बीने हैं
अभिनव से उत्कर्ष
स्वागत हे नववर्ष

आगत की आशा में भूले
उत्साहित मानव मन झूले
विगत विदा सर्वदा हुआ है
अद्भुत ये निष्कर्ष
स्वागत हे नववर्ष
©तृषा’कान्त’