पुरू …… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

घना है कुहासा
भोर है कि साँझ
डूब गया है
सब कुछ इस तरह
तमस के जाले से
छूटने को मारे हैं
जितने हाथ पाँव
और फंस गया हूँ
बुरी तरह…
वक्त का मकड़ा
घूरता है हर पल
अपना दंश मुझमें
धंसाने से पहले

याद है मुझे
‘पुरू’ हूँ
किन्तु ‘पौरूष’ खो गया है
भटक रहा हूँ युगों से
तलाश में …
उस शमी वृक्ष की
टांगा था मैनें
जिस पर कभी गाँडीव

अज्ञातवास की वेदना
अंधकार में अदृश्य घाव
डूबी नही है चाह अब तक
एक नये सूरज की

उबारो …
उबारो तो मुझे
ओ ! मेरी ‘सोयी हुयी चेतना’
इस अन्धकार से
चीखता रहूँगा मैं
निस्तेज होने तक
शायद इसी आशा में
कि आओगे एक दिन ‘तुम’
जो बिछड़ ग़ये थे मुझसे
अतीत के अनजाने मोड़ पर
©तृषा’कान्त’

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6 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Abnish Singh Chauhan
    जनवरी 10, 2012 @ 09:05:24

    bahut achchhee rachana

    प्रतिक्रिया

  2. shikha varshney
    जनवरी 10, 2012 @ 10:05:53

    उम्मीद पर दुनिया टिकी है.सुन्दर शब्दों की खूबसूरत बयानगी है.

    प्रतिक्रिया

  3. Pallavi
    जनवरी 10, 2012 @ 10:09:03

    आओगे एक दिन तुम जो बिछड़ ग़ये थे मुझ से अतीत के अनजाने मोड़ पर…वाह बहुत खूब॥सार्थक अभिव्यक्ति

    प्रतिक्रिया

  4. Rachana
    जनवरी 10, 2012 @ 14:49:01

    उबारो …उबारो तो मुझेओ ! मेरी ‘सोयी हुयी चेतना’इस अन्धकार सेचीखता रहूँगा मैंनिस्तेज होने तकbahut sunder bhav badhairachana

    प्रतिक्रिया

  5. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    जनवरी 10, 2012 @ 16:26:15

    अंतस का सम्बोधन..

    प्रतिक्रिया

  6. shashi purwar
    जनवरी 22, 2012 @ 04:06:12

    नमस्कार श्रीकांत जी घना है कुहासा भोर है कि साँझ……. पुरू बहुत सुंदर प्रस्तुति ..मन के तार….मकड़जाल , वक़्त का ………अपना ही दंश …..ह़र बात की मार्मिक ठंग से सवालो के साथ प्रस्तुत किया .बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आ पाई …आपके ब्लॉग को follow करने के लिए आप्शन बताईये जिससे आसानी से आपके ब्लॉग तक पहुच सकें

    प्रतिक्रिया

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