सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    फरवरी 03, 2012 @ 04:37:58

    स्वागत बसंत…

    प्रतिक्रिया

  2. shashi purwar
    फरवरी 08, 2012 @ 08:04:28

    namaskar srikant ji finally aapke blog tak pahuch gaye . bahut sunder rachna hai basant …..aapki kavita se to pahale hi basant aa gaya tha ………..hardik badhai . ab fillow kar liya hai aapki rachnaye padhte rahenge .http://sapne-shashi.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

  3. sushila
    मार्च 07, 2012 @ 09:02:59

    बेहद सुंदर रचना ! बसंत की छ्टा बिखेरती, मन में उल्लास का संचार करती जैसे हमसे ही मुखातिब हो।हार्दिक बधाई!

    प्रतिक्रिया

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