सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है …… [कविता] – अमिता मिश्र ‘नीर’

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या ‘नीर’ हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen
    फरवरी 16, 2012 @ 14:56:59

    बहुत अच्छे भाव हैं कविता में…

    प्रतिक्रिया

  2. shashi purwar
    फरवरी 19, 2012 @ 09:00:38

    बहुत सुंदर ………… कितने ही जीवन के पथ मेंहरिताभ मरूस्थल भी आयेसूरज डूब गया लेकिनचन्द्रोदय की कुछ आस नहींलो पीडा कण बरसाती हैसन्ध्या सिन्दूर लुटाती है………..कल्पना कुसुम क्या 'नीर' हुयेहैं सत्य कभी मन उपवन केकुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन मेंयुग युग से छोडे ज़ाती है……बेहद खुबसूरत रचना .जीवन के यक्ष -प्रश्न , धुप -छाँव. पीड़ा को भी इतने खुबसूरत तरीके से प्रस्तुत किया है कि …एःसास ही नहीं होता . पढने से मन ही नहीं भरा . जीवन का अलख जगाती हुई , सत्य को दर्शाती हुई बेहतरीन पोस्ट ……..आभार श्रीकांत कि प्रस्तुत करने के लिए . बहुत गहराई है रचनाकार कि रचना में …..उन्हें हमारा सलाम ………..हार्दिक शुभकामनाये .

    प्रतिक्रिया

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